कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०४ | कंब रामायण |
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चक्रवर्त्ती मूर्च्छित हैं। इसका कारण क्या है, कहो। तब कैकेयी ने अपने कारण निष्पन्न वृत्तांत को स्वयं कह सुनाया।
उसके सारा वृत्तांत कह सुनाने के पूर्व ही वसिष्ठ ने, चमकते करवाल को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती को अपने सुन्दर कमल-सदृश करों से धूलि-भरी पृथ्वी से उठाया और यह कहते हुए कि—'हे शास्त्रज्ञ ! चिंतित मत होओ, कैकेयी स्वयं तुम्हारे पुत्र राम को राज्य दे देगी। तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम अपना दुःख दूर करो', बार-बार प्रार्थना करते हुए खड़े रहे।
फिर, मुनिवर वसिष्ठ ने (दशरथ पर) शीतल जल छिड़का, पंखा डुलाकर हवा की और धीरे-धीरे उन्हें प्रज्ञा में लाकर मधुर वचन कहे। तब उन (मुनि) ने, शीतल समुद्र से उत्पन्न विष-समान कैकेयी के हलाहल-समान वचन के कुछ शांत होने पर, अपने प्यारे पुत्र का नाम-स्मरण करनेवाले चक्रवर्त्ती को होश में आते देखा।
चक्रवर्त्ती के प्राण लौटते देखकर वसिष्ठ ने कहा-- हे नायक ! अब तुम अपनी गंभीर वेदना को दूर करो। अब पुरुषोत्तम (राम) ही राज्य करेंगे। उसमें कोई विघ्न नहीं होगा! गरिमाहीन वचनवाली कैकेयी स्वयं उनको राज्य देगी। यदि घनश्याम राम राज्याभिषिक्त न होकर वन में जायेंगे, तो क्या हम यहीं रहेंगे ?--(अर्थात्, हम भी देश छोड़कर चले जायेंगे), तुम दुःखी मत होओ।
यों विचार कर कहनेवाले मुनि के वचन सुनकर दशरथ बोले--इस दशा में रहनेवाले मेरे प्राणों के निकलने के पूर्व ही आप राम को सुन्दर राजमुकुट पहना दें और वन जाने से उसे रोक दें तथा मेरे वचन को भी असत्य होने से बचावें। हे प्रभु ! आप यह कार्य करें।
तब मुनिवर ने गर्हित कार्य करनेवाली कैकेयी को देखकर कहा--हे लक्ष्मी-सदृश देवी ! अब तुम अपने पुत्र (राम) को राज्य, अन्य लोगों को उनके प्यारे प्राण तथा (वैवस्वत) मनु के वंश में उत्पन्न अपने पति को प्राण देकर निष्कलंक कीर्त्ति प्राप्त करो।
बड़ी महिमावाले कर्मों को समूल नाश करके शक्तिशाली बने हुए वसिष्ठ के इस प्रकार कहने के पूर्व ही कैकेयी सिसक-सिसककर रोती हुई कह उठी—यदि चक्रवर्त्ती अपने वचन से विचलित हो जायेंगे, तो मैं इस विशाल धरती में अपने प्राणों के साथ नहीं रहूँगी। अपनी बात सच्ची करने के लिए अभी मर जाऊँगी।
तब मुनिवर ने कहा—तुम यह नहीं सोचती कि तुम्हारा पति मर जायगा, तुम्हारा अपयश दिन-दिन बढ़ता रहेगा, और इससे पाप उत्पन्न होगा। तुम अपना हठ छोड़ती नहीं। तुम कुछ नहीं समझती हो। इससे अधिक मैं और क्या कह सकता हूँ ? यह कहकर पुनः कैकेयी को वे समझाने लगे।
किंचित् भी करुणा से हीन, त्वरित गति से निकलनेवाले चक्रवर्त्ती के प्राणों का भी विचार न करनेवाली, छत में घूमनेवाला अग्निकण है या विष, ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले वचन को कहनेवाली, हे नारी ! तुम मानव-स्त्री हो या अग्नि या मायाविनी पिशाचिनी हो ? हे निष्ठुरे ! अब दशरथ का तुमसे और इस मिट्टी से (अर्थात्, पृथ्वी से) क्या संबंध है ? तुम्हें प्राप्त होनेवाला अपयश बहुत बलवान् है।