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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
२०४कंब रामायण

चक्रवर्त्ती मूर्च्छित हैं। इसका कारण क्या है, कहो। तब कैकेयी ने अपने कारण निष्पन्न वृत्तांत को स्वयं कह सुनाया।

उसके सारा वृत्तांत कह सुनाने के पूर्व ही वसिष्ठ ने, चमकते करवाल को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती को अपने सुन्दर कमल-सदृश करों से धूलि-भरी पृथ्वी से उठाया और यह कहते हुए कि—'हे शास्त्रज्ञ ! चिंतित मत होओ, कैकेयी स्वयं तुम्हारे पुत्र राम को राज्य दे देगी। तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम अपना दुःख दूर करो', बार-बार प्रार्थना करते हुए खड़े रहे।

फिर, मुनिवर वसिष्ठ ने (दशरथ पर) शीतल जल छिड़का, पंखा डुलाकर हवा की और धीरे-धीरे उन्हें प्रज्ञा में लाकर मधुर वचन कहे। तब उन (मुनि) ने, शीतल समुद्र से उत्पन्न विष-समान कैकेयी के हलाहल-समान वचन के कुछ शांत होने पर, अपने प्यारे पुत्र का नाम-स्मरण करनेवाले चक्रवर्त्ती को होश में आते देखा।

चक्रवर्त्ती के प्राण लौटते देखकर वसिष्ठ ने कहा-- हे नायक ! अब तुम अपनी गंभीर वेदना को दूर करो। अब पुरुषोत्तम (राम) ही राज्य करेंगे। उसमें कोई विघ्न नहीं होगा! गरिमाहीन वचनवाली कैकेयी स्वयं उनको राज्य देगी। यदि घनश्याम राम राज्याभिषिक्त न होकर वन में जायेंगे, तो क्या हम यहीं रहेंगे ?--(अर्थात्, हम भी देश छोड़कर चले जायेंगे), तुम दुःखी मत होओ।

यों विचार कर कहनेवाले मुनि के वचन सुनकर दशरथ बोले--इस दशा में रहनेवाले मेरे प्राणों के निकलने के पूर्व ही आप राम को सुन्दर राजमुकुट पहना दें और वन जाने से उसे रोक दें तथा मेरे वचन को भी असत्य होने से बचावें। हे प्रभु ! आप यह कार्य करें।

तब मुनिवर ने गर्हित कार्य करनेवाली कैकेयी को देखकर कहा--हे लक्ष्मी-सदृश देवी ! अब तुम अपने पुत्र (राम) को राज्य, अन्य लोगों को उनके प्यारे प्राण तथा (वैवस्वत) मनु के वंश में उत्पन्न अपने पति को प्राण देकर निष्कलंक कीर्त्ति प्राप्त करो।

बड़ी महिमावाले कर्मों को समूल नाश करके शक्तिशाली बने हुए वसिष्ठ के इस प्रकार कहने के पूर्व ही कैकेयी सिसक-सिसककर रोती हुई कह उठी—यदि चक्रवर्त्ती अपने वचन से विचलित हो जायेंगे, तो मैं इस विशाल धरती में अपने प्राणों के साथ नहीं रहूँगी। अपनी बात सच्ची करने के लिए अभी मर जाऊँगी।

तब मुनिवर ने कहा—तुम यह नहीं सोचती कि तुम्हारा पति मर जायगा, तुम्हारा अपयश दिन-दिन बढ़ता रहेगा, और इससे पाप उत्पन्न होगा। तुम अपना हठ छोड़ती नहीं। तुम कुछ नहीं समझती हो। इससे अधिक मैं और क्या कह सकता हूँ ? यह कहकर पुनः कैकेयी को वे समझाने लगे।

किंचित् भी करुणा से हीन, त्वरित गति से निकलनेवाले चक्रवर्त्ती के प्राणों का भी विचार न करनेवाली, छत में घूमनेवाला अग्निकण है या विष, ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले वचन को कहनेवाली, हे नारी ! तुम मानव-स्त्री हो या अग्नि या मायाविनी पिशाचिनी हो ? हे निष्ठुरे ! अब दशरथ का तुमसे और इस मिट्टी से (अर्थात्, पृथ्वी से) क्या संबंध है ? तुम्हें प्राप्त होनेवाला अपयश बहुत बलवान् है।

अयोध्याकाण्ड २०५

चक्रवर्त्ती अपने मुँह से रामचन्द्र को वन जाने को कहे, इसके पूर्व ही तुमने (राम को वन जाने को) कह दिया। वह वन के दुस्तर मार्ग मे गये बिना नही रहेगा। तुम वह कठोर अग्नि हो, जो कीर्त्ति तथा अपने पति के प्राणो को जला रही हो। तुम्हारे सदृश कठोर और कौन होगा ? इससे बढ़कर क्रूर कार्य और क्या हो सकता है ?

निष्कलक मुनि के ये वचन सुनकर व्याकुल होनेवाले चक्रवर्त्ती ने जिह्वा मे विष रखनेवाली उस स्त्री को देखकर कहा-हे पापिन। क्या 'कठोर वन मे जाओ', कहकर मेरे प्राण (-सदृश राम) को तुमने भेज दिया ? क्या वह चला भी गया ?

हे पापिन ! तुम्हारे मनोभाव को अब मैने स्पष्ट जान लिया। तुम्हारे विंवाधर के विष को अनेक दिनो तक मैने पिया है। अतः, तुमने मेरे प्राणों को समूल खा लिया। मैने अग्नि समझ तुमको पत्नी के रूप मे नही अपनाया। किंतु अपने जीवन का अत करने के लिए एक यम को ही खोजकर अपनाया था।

मेरे नयन-समान राम को तुमने छल से वन मे भेज दिया। उससे मुझे तुम निहत कर रही हो। तुम अपयश से लज्जित नही होती हो। अब अनेक वचन कहने से क्या लाभ ? हे अधम क्रूरे ! तुम्हारे कठ का मगल-सूत्र¹ ही तुम्हारे पुत्र भरत का रक्षा-बंधन होगा।

इस प्रकार अनेक वचन कहने पर भी कैकेयी का मन पिघला न देखकर चक्रवर्त्ती मुनि से बोले-हे मुनिवर ! मै अभी कहे देता हूँ, यह (कैकेयी) मेरी पत्नी नही है। इसे मैने त्याग दिया। राजा बननेवाले उस भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता। वह पुत्रोचित कार्य (अर्थात्, पिता का मृत्यु-संस्कार) करने की योग्यता नही रखता।

अत्यन्त वेदना से पीडित चक्रवर्त्ती ने उत्तम कौशल्या को देखकर पूछा-क्या राम (वन जाने के पूर्व) जैसे मुझसे नही मिला, वैसे तुमसे भी मिले बिना ही चला गया ? तब कौशल्या, राम के विरह मे चक्रवर्त्ती की उस पीड़ा को देखकर अपने पूर्व विचार को (अर्थात्, दशरथ से यह प्रार्थना करनी है कि राम को वन मे न भेजें) छोड़कर स्वयं व्याकुल हो उठी।

अब कौशल्या को भी यह ज्ञात हो गया कि यह सब सपत्नी का कार्य है, चक्रवर्त्ती पहले वर देकर फिर पश्चात्ताप से मूर्च्छित हुए। यद्यपि वह (कौशल्या) अपने पति को सान्त्वना देने के लिए यह कहती रही कि हे राम ! तुम वन मे न जाओ, किंतु यह सोचकर मन मे चिंतित हुई कि यदि दशरथ के वचन सत्य न हो, तो संसार मे उन्हे अपयश उत्पन्न होगा।

अपने पति के दुःख से दुःखी होनेवाली कौशल्या ने (चक्रवर्त्ती से) कहा-हे बलवान् ! दृढ सत्य को अपनाकर, उस पर स्थिर रहकर, फिर यदि आप अपने अभिन्न


१ अंतिम वाक्य का यह भाव है कि 'मंगल-सूत्र' सुहाग का चिह्न है। कैकेयी का सुहाग अब अधिक काल तक नही रहेगा। उसके मिटने से भरत की रक्षा भी समाप्त होगी। अर्थात्, दशरथ के मर जाने पर भरत अनाथ हो जायगा और उसे दुःखी होना पड़ेगा।—अनु०

२०६कम्ब रामायण

प्रेमवाले पुत्र पर प्रेम से व्याकुल हो और आपका अनिन्दनीय गौरव निंदास्पद हो जाय, तो संसार के लोग उस सत्य को स्वीकार नही करेंगे।'

उत्तम कौशल्या-रूपी हंसिनी ने सोचा कि मेरा पुत्र वन को गये बिना नही रहेगा। वह बार-बार यह आशंका करती हुई कि पुत्र-विरह में चक्रवर्त्ती जीवित नही रहेंगे, अत्यन्त शोक-मग्न हुई। वह फिर सोचती कि यदि पुत्र पिता की प्राण-रक्षा के लिए देश में ही रहेगा, तो उससे पति का यश मिट जायगा। यह विचार कर चिंतित होती। अतः, वह अपने पुत्र से भी यह नही कह सकी कि तुम वन मे मत जाओ। अहो। अहो। कौशल्या कैसे शोक से संतप्त हुई थी।

पुष्पमालांलंकृत दशरथ ने उस (कौशल्या) के वचनो से जान लिया कि उत्तम कीर्त्तिवाला राम नगर में नही रहेगा। अवश्य वन मे जायगा। उससे वे शोकोद्विग्न हुए और बोले—हे मुझ पापी के अवलंब। आओ। हे पुत्र ! मेरे सम्मुख आओ।

पुनः दशरथ अपने पुत्र के प्रति कहने लगे—हे पुत्र। मेरे नयनो से मेरे प्राण भी द्रवित होकर बह रहे हैं। मेरी मृत्यु अब निश्चित है। चतुर्वेदी के ज्ञाता ब्राह्मण अग्नि के सम्मुख तुम्हारा अभिषेक करने के लिए जो तीर्थ-जल लाये हैं, उनको मेरे मुँह मे डालकर (अर्थात्, मेरी मृत्यु के इस समय मे मेरे मुँह में गंगाजल डालकर) फिर तुम विशाल वन में जाकर रहो।

हे पुत्र। बड़ी सेना के बल से संपन्न राजाओ को इक्कीस बार अपने फरसे से मारनेवाले, शक्ति में अपना उपमान स्वय ही बने हुए (परशुराम) को भी तुमने धनुष से परास्त कर दिया था। किन्तु मै (पापी) ने, 'कुलक्रम से प्राप्त मुकुट को धारण करो,' ऐसा कहकर तुरन्त ही तुमको जटामय ऊँचा मुकुट दिया।

हे श्याम ! हे स्वच्छ मन ! हे अरुण नयनो तथा करो से शोभायमान ! हे क्षमा-गुण से पूर्ण ! त्रिपुर-दाह के समय शिव के उपयोग में आनेवाले धनुष को तोड़नेवाले ! मै एकाकी हो गया हूँ। इस बुढ़ापे की अवस्था मे तुम मुझे छोड़ चले। अब मै जीवित रहना नही चाहता।

स्वर्ण से भी अधिक उज्ज्वल स्वर्ण। यश के भी यश ! बिजली से भी अधिक कान्तिपूर्ण धनुष को धारण करनेवाले। सत्य के सत्य ! मै इतना क्षुद्र नही हूँ कि अपनी आँखों के सामने ही तुमको वन जाने दूँ। तुम्हारे वन जाने के पूर्व ही मै स्वर्गलोक को चला जाऊँगा।

मेरा मन प्रेम से पिघलनेवाला है। मेरा शरीर प्रेम के कारण प्राण छोड़नेवाला है। मै तुम्हारे समान (कठोरहृदय) नही हूँ। मैने अपनी जिन आँखों से तुमको जानकी का पाणि-ग्रहण करके अयोध्या में प्रवेश करते हुए देखा था, उनसे अब तुमको नगर छोड़कर जाते हुए नही देख सकता।


१. भाव यह है—जिस सत्य को आपने स्वीकार किया है, उसके परिणामो को दृढता के साथ सहने में ही गौरव है। उसके परिणामभूत दुःख को देखकर व्याकुल होने में अगौरव ही है। —अनु०

अयोध्याकाण्ड २०७

तुम्हारे विरह को नगर के लोग भले ही सह ले, देवतालोग भले ही दुःखी न हों, तो भी हे स्वर्णमय रथवाले ! हे मेरे यशकारक ! हे मेरे प्राण ! तुमको जन्म देनेवाला, मैं तुम्हारे महत्त्व को जानता हूँ। अब अपनी दशा के बारे मे मैं क्या कहूँ ? मैं नहीं जिऊँगा । मैं नहीं जिऊँगा ।

मृदु सिकता से पूर्ण गम्भीर समुद्र से घिरी हुई विशाल पृथ्वी को, इस राज्य को, अक्षय संपत्ति को और अन्य सब वस्तुयो को छलनामयी कैकेयी को ही देकर यश पानेवाला मेरा उदार मन अब मेरे प्राण मिटा देगा, मेरे प्राण मिटा देगा ।

शब्दायमान समुद्र से आवृत्त इस पृथ्वी के निवासियो मे, देवताओ मे तथा पाताल के निवासियो मे तुम्हारे सदृश सद्गुणो से भूषित कौन हैं ? हे स्वर्णतुल्य ! जब परशुराम यह कहता हुआ आया था कि मेरे सामने खड़े रह सकनेवाला वीर कौन है ? तब दृढ़ चित्त के साथ तुमने उसका सामना करके उसे परास्त किया था। ऐसे तुमको छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?

तुम वन को जानेवाले हो, यह सुनकर भी मैं जीवित रहा। फिर भी, यदि अब मैं उत्तम स्वर्गलोक को नही जाऊँ, तो कठोरहृदय कहला सकता हूँ ? हे पुत्र ! यदि तुम वन में निवास करोगे और मैं इस कैकेयी को देखता हुआ इस नगर में रहूँगा, तो मेरा स्वभाव नीच ही तो कहा जायगा ।

लक्ष्मी तथा भू-देवी बड़ी तपस्या करके ही तुम्हारे बलवान् वक्ष का आलिंगन कर सकीं। तुम से वियुक्त होकर वे नहीं रहेंगी, नही रहेंगी। मैं पापी, तुम से वियुक्त होकर मर जाऊँगा । हे वत्स ! तुम्हारे विरह मे भी यदि मैं जीवित रहा, तो क्या मैं भी कैकेयी के समान नही हो जाऊँगा ?

तुमको उत्तम आभरणो, किरीट, स्वर्ण-आसन, श्वेतच्छत्र तथा विशाल वक्ष पर आसीन जयलक्ष्मी के साथ शोभायमान होते हुए देखना चाहता था, किन्तु इसके विपरीत वल्कल, कृष्णाजिन आदि से युक्त रहते हुए तुमको कैसे देख सकता हूँ ? ऐसी अवस्था में प्राण छोड़ देना ही मेरे लिए अच्छा है ।

इस प्रकार विविध वचन कहते हुए चक्रवर्ती यों व्याकुल हुए, जैसे उनके जीवन का अन्त आ पहुँचा हो । तब मृदुल कृष्णाजिनधारी मुनिवर (वसिष्ठ) ने उनसे कहा— हे राजन् ! चिंतित मत होओ। मैं उस राम को आज वन जाने से रोक लूँगा ।

मुनिवर के वचन सुनकर मनुष्य-रूप मे स्थित (वैवस्वत) मनु-सदृश चक्रवर्ती, ऐसे लगते थे, जैसे तुरत प्राण छोड़नेवाले हों, यह विचार कर कि यदि ये विशुद्ध स्वभाववाले मुनिवर कहेगे, तो राम वन-गमन न करेगा, किंचित् स्वस्थ हुए और एकाकी हो अत्यन्त विकल होनेवाले अपने प्राणो को रोके रहे ।

चक्रवर्ती को व्याकुलप्राण तथा प्रज्ञाहीन देखकर तथा यह सोचकर कि उनकी मृत्यु हो गई है, कौशल्या अत्यन्त व्याकुल हुई और कहा—हे पुत्र ! इस नगर के साथ हमको भी तुमने छोड़ दिया । फिर कहा—हे प्रभो ! क्या गृहस्थ-जीवन में आप इसी

२०८ कब रामायण

प्रकार मेरा साथ देनेवाले हैं ? -- ( अर्थात्, आप गृहस्थ-जीवन मे मेरा सहारा देनेवाले हैं ; अब वैसा न करके मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं--यह क्या धर्म है ? ) कौशल्या ने फिर कहा—हे सत्यस्वरूप ! हे ससार के राजाओ के राजाधिराज । यदि आप अपने प्राणो को इस प्रकार पीडित करेंगे, तो सारा ससार इससे दुःखी होगा । मुनिवर के साथ कदाचित् हमारा पुत्र लौट आयगा । इसलिए, हे राजन् ! आप चितित न हो । इस प्रकार के विविध वचन कहकर कौशल्या, चक्रवर्ती के शरीर पर, पैरों पर और मुँह पर अपने अरुण करों को फेरती हुई राजा को सात्वना देने लगी । तब चक्रवर्ती धीरे-धीरे प्रज्ञावान् होकर बोले--क्या दृढ धनुर्धारी मेरा पुत्र लौट आयगा ? लौट आयगा ? चक्रवर्ती बोले--क्रूर तथा छलनामयी कैकेयी ने कुबड़ी की बातो को सुनकर मेरे पूर्व दिये वरों के द्वारा मेरे प्राण लेने का निश्चय कर लिया । अपने महिमा-पूर्ण सुत तथा स्वयं ( अपने लिए ) पृथ्वी का राज्य पाने के अतिरिक्त हाय ! मेरे ज्येष्ठ पुत्र को वन में जाने को कहा--वन में जाने को कहा । फिर चक्रवर्ती ने कौशल्या से कहा--हे कौशल्ये ! स्वर्ण अगद-धारी राम वन- गमन से नही रुकेगा, मेरे प्यारे प्राण भी गये बिना नही रहेगे । इसका एक और कारण भी है सुनो, पूर्व मे एक मुनि ने मुझे एक शाप दिया था । यों कहकर पूर्व घटित सारा वृत्तात सुनाने लगे । चक्रवर्ती ने कहा--पूर्वकाल मे एक दिन मैं आखेट की उमंग मे बड़े वन मे गया था और हाथियो और सिंहो को ढूँढ़ रहा था । फिर, एक सुन्दर नदी-तट पर जा पहुँचा, जहाँ हाथी सचरण करते थे । वहाँ हाथ मे धनुष-बाण लिये हुए छिपकर खड़ा रहा । उसी वन में एक अंधा तपस्वी, अपनी अंधी पत्नी-सहित रहता था। उनका प्रिय पुत्र ही उन मुनि-दंपति का एकमात्र सहारा था । वह मुनि-पुत्र नदी मे जल भरने के लिए आया । यह न जानकर, बल्कि कोई आगत आखेट समझकर मैने शर-संधान किया । तब वह मुनिकुमार आहत होकर धरती पर लोट गया और विलाप करने लगा । मैने उस मुनिकुमार द्वारा नदी मे जल भरने के शब्द को सुन, यह समझकर शर छोड़ा था कि कोई हाथी जल पी रहा है । मैने आँखो से देखकर शर-संधान नही किया । किंतु, हाथी की ध्वनि के बदले नर की ध्वनि सुनकर आशकित होकर मैं उस स्थान पर जा पहुँचा । वहाँ मैने उस कुमार को शर से विद्ध होकर छटपटाते हुए देखा । उसके हाथ से कमडलु लुढ़क गया था । तब मेरे शरीर, मन तथा धनुष शिथिल हो गये । उस मुनि- बालक पर गिरकर मैंने दुःख के साथ पूछा--हे वत्स ! हाय ! तू कौन है ? कह । किंचित् भी असत्य से परिचय न रखनेवाले उस ( अबोध ) बालक ने कहा— मत्स्यावतार लेनेवाले (वेदो को चुरानेवाले राक्षस को मारकर वेदो की रक्षा करनेवाले ) भगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न चतुर्मुख ने वेदोक्त प्रकार से जिन अनेक प्राणियो की सृष्टि की, उनमें मनुष्यों के चातुर्वण्यों में से प्रथम वर्ण में मेरा जन्म हुआ । चतुर्मुख की वंश-परंपरा में उत्पन्न काश्यप का पुत्र था विद्युत्-समान यज्ञोपवीत

अयोध्याकाण्ड २०६

से शोभित वक्षवाला वृत्तेश, उसका पुत्र था चतुर्वेण्टज शलभांशन ( शलभोजन ? ), उसी का मैं पुत्र हूँ । मेरा नाम सुरेचन है ।

इस समय, अपने नेत्रहीन माता-पिता के लिए जल लेने यहाँ आया था, यहाँ यह विपदा उत्पन्न हुई । हे पर्वत-समान कधोंवाले ! तुमने ( मनुष्य ) न जानकर हाथी के भ्रम से बाण प्रयुक्त किया । यह नियति का कार्य है। अतः, तुम दुःखी मत होओ ।

तीव्र पिपासा से मेरे माता-पिता दुःखी हो रहे हैं। हे अनुपम ! तुम जल ले जाकर मेरे माता-पिता को दो और मेरी मृत्यु का समाचार देकर उनसे कहो कि स्वर्गलोक को जाते हुए तुम्हारे पुत्र ने तुमको प्रणाम किया है। यह कहकर वह मुनि-कुमार स्वर्गलोक में देवों के स्वागत का पात्र बनकर चला गया ।

अपने पुत्र की प्रतीक्षा में ही बैठे हुए उन वृद्ध तपस्वी-दंपतियों के निकट मैं उस उनके पुत्र को और जल को लेकर पहुँचा। तब वे बोले—हे वत्स ! तू इतना विलंब करके लौटा है । हम यह सोचकर दुःखी हो रहे थे कि तुझ पर कोई विपदा तो नहीं आई । हे चन्दन-गन्ध से युक्त भुजावाले ! आओ, हम तेरा आलिंगन करेंगे ।

तब मैंने कहा—हे स्वामिन् ! मैं अयोध्या का रहनेवाला एक राजा हूँ । मैं शिकार की खोज में अँधेरे में बैठा हुआ था। उसी समय आपका सत्यभाषी पुत्र कमण्डलु में जल भरने लगा । तब आँखों से देखे विना, केवल शब्द को सुनकर मैंने बाण चलाया ।

शर के लगने पर (आपके पुत्र ने ) जब शब्द किया, तब यह जानकर कि यह हाथी नहीं, किन्तु कोई मनुष्य है, दौड़कर वहाँ गया और उससे पूछा कि तुम कौन हो ? सब वृत्तान्त कहकर वह शान्त हो गया और देवों के द्वारा स्वागत पाकर स्वर्गलोक में जा पहुँचा ।

मैंने बाण से (आपके पुत्र को ) मारा, इससे आप मुझपर क्रोध न करें । उस निरपराध के जल भरने से उत्पन्न शब्द को सुनकर मैंने उस दिशा में शर छोड़ा, किंतु आँखों से उसे नहीं देखा । मेरे इस अपराध को क्षमा करें । यह कहकर मैंने उनके चरणों को अपने सिर पर रख लिया ।

( पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर ) वे मुनि-दंपति गिर पड़े, मूच्छित हुए लोटने लगे। फिर कहने लगे—आज सचमुच हमारे नयन फूट गये। वे शोक-समुद्र में डूब गये । हे तात ! हे तात ! कहकर चिल्ला उठे । कह उठे कि तुमने हमारे हृदय के टुकड़े- टुकड़े कर दिये । फिर बोले—( हे पुत्र ) तुम स्वर्गलोक में चले गये । अब हम यहाँ रह नहीं सकते । हम भी आ गये, आ गये ।

इस प्रकार शोक-मग्न मुनि-दंपति के चरणों को प्रणाम करके मैंने कहा—आज से मैं ही आपका पुत्र हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करता हुआ, मैं आपकी सेवा में निरत रहूँगा । आप किंचित् भी शिथिलमन न हों । शोक को दूर कर दें । मेरा कथन सुनकर उन्होंने कहा—हे दृढ़ धनुर्धारिन् ! सुनो, फिर वे यों बोले—

आँख का तारा जैसे पुत्र को खोकर भी प्राणी पर लालसा रखकर यदि हम भोजन करने बैठे रहेंगे, तो समाज के लोग हमारी निंदा करेंगे । हम भी स्वर्ग में जायेंगे ।

२१० कंब रामायण

हे अलंकृत अश्ववाले ! तुम भी हमारे जैसे ही अपने पुत्र के विरह में (संसार का जीवन समाप्त करके) स्वर्ग में जाओगे। हे निरंतर अमल प्रकाश से शोभित श्वेतच्छत्रवाले ! तुमने प्रार्थना की है कि मैं आपकी शरण में हूँ। आप मेरी रक्षा करें। अतः, हम तुमको भयंकर शाप नहीं दे रहे हैं। आज अपने प्यारे पुत्र से, जो आज्ञा दिये बिना ही, इंगित-मात्र से सब कुछ जानकर हमारी इच्छा पूरी करता था, वियुक्त होकर जिस प्रकार हम स्वर्ग जा रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी विशाल स्वर्गलोक में जाओगे। यह कहकर वे स्वर्गलोक को सिधार गये। मैं अपने मन में किंचित् भी व्याकुल न हुआ, किन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात्, उनके इस वचन से कि मेरे मधुर वचनवाला पुत्र होनेवाला है, आनन्दित होता हुआ नगर को लौटा। उस मुनि के कथन के अनुसार अब राम का वन-गमन और मेरा प्राण-त्याग दोनों अवश्य संघटित होनेवाले हैं। इसमें किंचित् भी परिवर्त्तन नहीं होगा- चक्रवर्ती ने यों कहा। चक्रवर्ती इस अत्यन्त दुःखदायक कथा को कहकर व्याकुल हो पड़े रहे। तब कौशल्या शोकोद्विग्न होकर मूर्च्छित हो गई। मुनिवर (वशिष्ठ) विधि के परिणाम से उत्पन्न होनेवाली दुःख-परंपरा को देखकर व्याकुल हुए और शीघ्र चलकर— प्रभूत कीर्त्तिमान्, पुण्यवान् तथा पर्वत-सदृश उन्नत मत्तगजों से युक्त चक्रवर्त्ती के मनोहर प्रासाद के सम्मुख, उत्तम सभा में जा पहुँचे, जहाँ नगाड़े बज रहे थे और राजा लोग राम के अभिषेक के लिए एकत्र थे। शस्त्रधारी राजाओं ने आये हुए मुनिवर को देखकर पूछा—हे पिता ! क्या कोई विघ्न उपस्थित हुआ है ? अपार पीड़ा से रोने की यह ध्वनि कैसी सुनाई पड़ रही है ? यह हमें बताकर हमारे मन को शान्त करें। मुनि ने उन राजाओं से कहा—कैकेयी ने चक्रवर्ती से दो वर प्राप्त किये थे। अप्रतिहत दंडनीतिवाले राजा ने भी वे वर उसे दिये थे। कैकेयी ने उन वरों में से एक से राम को वन-गमन की आज्ञा देने के लिए (राजा को) सहमत किया है, यही घटित हुआ है। चक्रवर्ती की आज्ञा से कैकेयी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र (भरत) आदिशेष पर स्थित पृथ्वी की रक्षा करेगा। ऊँचे कंधोंवाला, सीता का पति, राम वन में जाकर रहेगा। अभिन्नमत्स्यस्वभाववाले मुनिवर के वचन अपने कानों में पड़ने के पूर्व ही- अघट प्रेम से युक्त राजा लोग, मुनिगण, अन्य लोग एवं कंचुक-बद्ध स्तनोंवाली स्त्रियाँ, सब दशरथ के समान ही (मूर्च्छित हो) गिर पड़े। सबके शरीर, जैसे घाव पर आग रख दी गई हो, ऐसे ही पीड़ित होकर जलने लगे। वे निःश्वास भरते हुए और गद्गद वचन कहते हुए धरती पर गिरकर लोटने लगे। उनकी आँखों से बहनेवाला जल समुद्र के समान था। उस समय सब दिशाओं में जो बड़ी रोदन-ध्वनि निकली, वह स्वर्ग तक गूँज उठी। प्रभंजन के चलने से कंपित होनेवाली पुष्पलता के समान स्त्रियाँ अत्यंत दुःख में

अयोध्याकाण्ड २११

धरती पर गिर पड़ीं, तो उनके आभरण और मगंल-सूत्र बिखर पडे। उनके केशपाश खुल गये और उनकी यम-सदृश आँखे लाल हो गई।

राजा लोग कहते—हाय ! हाय। चक्रवर्ती करुणा-हीन हो गये। हम धर्म की रक्षा नही करके उसे छोड़ देंगे और वे आँधी से गिराये गये बडे वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिरकर रोने लगे।

'उदार ( राम ) वन को जानेवाले हैं'—इस वचन मात्र से शुक और सारिकाएँ भी रो पड़ीं। ऊँचे प्रासादो मे निवास करनेवाले मार्जार भी रो पडे। रूप को पहचानने मे असमर्थ शिशु भी रो पड़े। तो, अब बड़े लोगो के वारे मे क्या कहा जाय ?

रक्त कुवलय तथा बिंबफल की समता करनेवाले मुँह में, कुंद पुष्पो के जैसे दाँतो को प्रकट करती हुई तथा परस्पर सटे हुए (पीन) स्तनो पर जैसे मुक्ता-माला टूटकर गिरी हो, ऐसे ही अश्रुधारा वहाती हुई, जिह्वा पर ठीक-ठीक अंचित नही होनेवाली बोली से युक्त स्त्रियाँ रोईं।

चक्रवर्ती के समान ही गाये रोईं। उन गायो के बछड़े रोये। सभी विकसित पुष्प रोये। जलचर पक्षी रोये। मधु बहानेवाले उपवन रोये। गज रोये और रथो मे जुते हुए बलवान् अश्व भी रोये।

यह न सोचकर कि राम से वियुक्त होकर ज्ञानी लोग भी जीवित नही रहेगे, जिस कैकेयी ने अपने पति से राम को 'वनवास दो' यह वचन कहा था, वह ( कैकेयी ) तथा क्रूर कुबरी—इन दोनो के अतिरिक्त और कोन ऐसे कठोर हृदयवाले थे, जो इस समय रोये नही हों ? सब लोग ( दुःख की अधिकता से ) जल के समान पिघल गये।

जो प्रज्ञाहीन ( बेहोश ) हो गये, उन लोगो की गिनती ही नही रही। रथो के आवागमन से जो वीथियाँ धूलि से भर गई थी, उनमें अश्रुधाराएँ वह चलीं। हाँ, एक कमी रह गई, वह यह कि उनके मन जो अरूप थे, छिन्न होकर नही बिखर पाये।

अयोध्या के निवासियो मे कोई कहते—यह भू-देवी के पाप का फल है। कोई कहते—कमल पर आसीन लक्ष्मी देवी का पाप उससे भी बडा है। कोई कहते—विधि ने सब हृदयों को विद्धत कर दिया और कोई कहते—ससार के लोगो के नेत्रो ने जो पाप किया है, वह समुद्र से भी बड़ा है।

कोई कहते—भरत राज्य नही करेगा। कोई कहते—प्रभु (राम) अब (नगर को) नही लौटेगे। कोई कहते—यह राज्याभिषेक भी क्या आया, यह हमारे लिए काल बन गया। और कोई कहते—हम अभी तक जीवित हैं, हमसे अधिक निष्ठुर और कोन हो सकते हैं ?

कोई कहते—चक्रवर्ती ने कैकेयी पर अधिक प्रेम के कारण विवेकहीन होकर वर दिये और कोई कहते—सीता और राम के साथ हम भी घोर वन में जायेगे, अथवा अग्नि मे प्रवेश कर मरेंगे।

कोई धरती पर हाथ फेरते हुए, अपने अश्रुजल को लीप रहे थे। कोई 'कौशल्या देवी अब जीवित नही रहेगी,' कहते हुए निरन्तर निःश्वास भर रहे थे। कोई, 'हे कनिष्ठ कुमार ( लक्ष्मण ) ! क्या तुम यह सह सकोगे ?'—कहते थे। इस प्रकार उस विशाल नगर के लोग अग्नि में गिरे घृत के ममान हो रहे थे।

२१२कंब रामायण

कुछ लोग कहते—कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राज्य तो माँगा, किन्तु राम को देश से निष्कासित क्यो कर रही है ? इसका कारण इतना ही है कि इसने ऐसा पाप-कार्य करने का निश्चय कर लिया है । और, कोई यह कहकर व्याकुल होते कि यह कैकेयी रक्त अधरवाली गणिका-तुल्य है, क्योकि इसके हृदय मे पति के प्रति गाढानुरक्ति नही है ।

कुछ लोग कहते थे—क्या चक्रवर्ती ने घोर तपस्या करके अपने प्राणो को छोडने का निश्चय किया है ? नही तो, क्या इस ससार के रहनेवाले सब लोगों को मारकर इसे समूल विनष्ट करने का यह उपाय है ? अहो ! कैकेयी को दशरथ का यह वर देना भी भला है । भला है ।

रामचन्द्र, जिन्होंने प्राप्त राज्य को उस (कैकेयी) को दे दिया है, स्वय ज्येष्ठ होकर जन्म पाने के कारण त्रिलोक के राज्य के अधिकारी हैं। हम सब उनसे पृथक् न होकर वन मे जाकर उनके साथ निवास करेंगे । वैसा करने से झाड तथा वृक्षों से भरा हुआ कानन भी कुछ दिनो मे नगर बन जायगा ।

दशरथ का यह कार्य भी कैसा विचित्र है ? अपने उपमा-रहित ज्येष्ठ पुत्र को पहले राज्य देकर फिर न्याय-भ्रष्ट होकर उनके अनुज को वह राज्य दे रहे हैं। क्या यह सत्य के विरुद्ध नही है ?

नगर के लोग कहते—विजयमाला-भूषित धनुष को धारण करनेवाले राम को जो पृथ्वी प्राप्त हुई है, उसे दूसरा कोई कैसे अपना सकता है ? सीता देवी इस नगर को छोड़कर जायेंगी, तो क्या राज्यलक्ष्मी भी (उसी प्रकार वन मे न जाकर) छलनामयी कैकेयी के पुत्र को अपनायगी ?

बिना बत्ती को बढ़ाये और बिना तेल डाले ही जलनेवाले और पवन के झोंके से भी विकृत न होनेवाले दीप के सदृश (शरीर-कातिवाली) स्त्रियाँ, क्या अब काँपती हुई, अरुण कमल-समान विशाल नयनवाले प्रभु की कृपा-दृष्टि प्राप्त किये बिना, जीवित रह सकेंगी ? हाय ! यह कैसा दुर्भाग्य है ।

जब इधर ऐसा हो रहा था, तब कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) ने यह सुना कि स्वभावतः तीक्ष्ण रहनेवाले भाले की समता करनेवाली आँखों से युक्त विमाता ने क्रूरता सहित, अपने वर से पृथ्वी (के राज्य) को माँग लिया है और ज्येष्ठ भ्राता को वन दे दिया है । यह सुनते ही वह, किसी के द्वारा प्रज्वलित न होनेवाली प्रलय-काल की अग्नि के समान, क्रोध से उमड़ उठा ।

(लक्ष्मण के) नयनो की कोरो से आग बरस पड़ी । भौंहो के रोम ललाट पर चढ़ गये । उनकी उग्रता से गगन का सूर्य भी अस्त-व्यस्त होने लगा । उनकी देह से स्वेद बह चला । उनके अन्तर की प्राणवायु बाहर प्रकट हुई । यो अति ऊँचे आकारवाले लक्ष्मण अपने आदिरूप (अर्थात् आदिशेष १) की ही समता करने लगे ।

यह कैकेयी सिंह-शावक के लिए रखे हुए स्वाद-भरे मांस को, विकृत नयनों से


१ लक्ष्मण आदिशेष के अवतार हैं ।

श्रीयोध्याकाण्ड २१३

युक्त क्षुद्र श्वान को देना चाहती है। अहो ! इस नारी की बुद्धि भी अच्छी है ! इस प्रकार कहकर गंगा के अधिपति ¹ (लक्ष्मण) हाथ-पर-हाथ मारकर हँस पड़े।

लक्ष्मण ने चारो ओर रत्नो से जटित करवाल को अपने पार्श्व मे बाँध लिया, धनुष को उठा लिया। शीतल मेरु पर्वत पर स्थित वॉवी के समान तूणीर को पीठ पर बाँध लिया और रक्त स्वर्ण से निर्मित कवच से अपने उन्नत कन्धों तथा वक्ष को आवृत कर लिया।

उनके पैरो के वीर-कंकण ऐसी ध्वनि कर रहे थे कि उनसे समुद्र भी लज्जित होते थे। धरती को छूनेवाली (उनके धनुष की) डोरी की बड़ी ध्वनि युगान्त काल में सप्त समुद्रो के जल को पीकर गरजनेवाले मेघ की ध्वनि से भी तिगुनी अधिक थी।

स्वयं (अर्थात् लक्ष्मण) और उनके ज्येष्ठ भ्राता (राम) इन दोनो को छोड़कर, अन्य सब त्रिलोकवासी प्राणी 'ऐसा सोचकर कि विशाल आकाश, धरती, इत्यादि पाँचो अपार भूत ऊपर से नीचे की ओर गिर रहे हैं,' भय से काँपने लगे। ऐसा उस लक्ष्मण का वीर-वेष था।

लक्ष्मण गरजकर बोले—युद्ध में आये सब वीरो को मिटाकर मैं भूमि का भार कम करूँगा। उनकी देहो से धरती को पाट दूँगा। मेरे प्रभु (राम) को आज ही मै विजयप्रद मुकुट पहनाऊँगा। जो मुझे रोकनेवाले हो, आवे, रोके।

देव, मर्त्य, विद्याधर, नाग तथा अन्य सब स्थानो के निवासी पड़े रहे। भूमि की सृष्टि, रक्षा तथा प्रलय करनेवाले स्वय त्रिदेव भी क्यो न मेरा सामना करने आवे, तो भी मै नारी की इच्छा (अर्थात्, कैकेयी की इच्छा) पूर्ण नही होने दूँगा।

चक्रवर्त्ती-कुमार लक्ष्मण आकाश के मध्य-स्थित सूर्य के समान उग्रता दिखा रहे थे। उस नगर मे वे इस प्रकार घूम रहे थे, जैसे सुन्दर शिखरो से युक्त मन्दर-पर्वत पूर्वकाल मे क्षीरसमुद्र के मध्य घूमा था।

उस समय राम, विरोधकारी क्रूरता से पूर्ण कैकेयी के द्वारा उत्पादित उत्पात से व्याकुल होकर, सान्त्वना देने पर भी शान्ति न पानेवाली सुमित्रा के पास थे। उन्होंने अपने सहचर बलवान् अनुज (लक्ष्मण) के धनुष-रूपी मेघ से उत्पन्न, ब्रह्माण्ड को भेदनेवाले टकार- रूपी गर्जन को सुना।

तुरत वे, अन्यत्रदुर्लभ शोभा से युक्त आभरणो की कान्ति को चारो ओर बिखेरते हुए, वक्ष पर उज्ज्वल मुक्तामाला से शोभित होते हुए, किसी से शान्त न होनेवाली


१ लक्ष्मण को गंगा का अधिपति कहा गया है। इसकी विविध प्रकार से व्याख्या की गई है •
(क) कोशल देश की सीमा में गंगा बहती है, अतः कोशल के राजा गंगापति माने जाते हैं।
(ख) सरयू नदी का एक नाम है 'रामगंगा'। कोशल देश में उस नदी के बहने से वहाँ के राजा गंगापति हुए।
(ग) सब नदियों के लिए गंगा शब्द का व्यवहार साधारण है • अतः यहाँ गंगा का अर्थ सरयू है और उस देश का राजा लक्ष्मण गंगापति है।
(घ) गंगा को स्वर्ग से धरती पर लानेवाले थे भगीरथ . उनके वंश में उत्पन्न होनेवाले लोग गंगापति कहे गये हैं। —अनु०

२१२ | कंब रामायण

प्रलयकालीन अग्नि को भी शांत करनेवाले कालमेघ के समान, अनुपम और मृदुल वचन-रूपी वर्षा की बूँद बरसाते हुए आये।

उज्ज्वल स्वर्ण-समान देह तथा मेघ-समान विशाल हाथों से शोभायमान लक्ष्मण को विद्युत्-समान क्रोधाग्नि प्रकट करते हुए देखकर रामचंद्र ने कहा—हे मेरे वत्स! कभी क्रोध न करनेवाले तुम अब युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गये हो। यों धनुष उठाने का क्या कारण है?

तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया सत्य को मिटाकर, तुम्हारे असाधारण राज्य को तुम से छीननेवाली और काले मनवाली उस (कैकेयी) की आँखों के सामने ही तुमको राज-मुकुट पहना दूँगा। उसमें विघ्न डालने के लिए स्वयं देवता भी क्यों न आवें, उनको मैं तूल को जलानेवाली अग्नि के समान जला दूँगा।

जबतक यह दृढ़ धनुष मेरे हाथ में रहेगा, तबतक वे देवता भी कुछ विघ्न उत्पन्न करने का साहस नहीं कर सकते। यदि वे विघ्न उत्पन्न भी करें, तो भी मैं अपने शर का लक्ष्य बनाकर उन्हें जला दूँगा और चतुर्दश भुवन की रक्षा का भार अभी आप को सौंप दूँगा। आप उसे स्वीकार करें—यों लक्ष्मण ने कहा।

अपने अनुज की बातें सुनकर राम ने कहा—तुम्हारी बुद्धि सदा शास्त्र विहित न्याय के अनुकूल मार्ग में चलती है। किन्तु, आज नीति के विरुद्ध, अविनाश्वर धर्म को भी मिटाता हुआ, यह क्रोध तुम्हारे मन में कैसे उत्पन्न हुआ?

ज्येष्ठ भ्राता के यह कहने पर, लक्ष्मण अपने दाँतों को प्रकट करते हुए हँस पड़े और कहा—आपके पिता ने कहा कि यह विशाल पृथ्वी तुम्हारी है, तो इस पृथ्वी को स्वीकार करके, पुनः उसे खोकर आप वन को जा रहे हैं। ऐसे समय में मुझे क्रोध उत्पन्न न होकर और किस समय उत्पन्न होगा?

मेरी आँखों के सामने ही आपको राज्य देकर, फिर 'नहीं' कह देनेवाले तथा क्रूर मनवाले चक्रवर्ती के समान ही प्रेमहीन माता (कैकेयी) तुम को अरण्य भेज रही हैं, ऐसे समय में क्या मैं दुःखदायक इन्द्रियों से युक्त इस देह को धारण करके अपने प्राणों की रक्षा करता रहूँगा?

यही मेरे क्रोध का कारण है। इस प्रकार, लक्ष्मण के अपना कथन समाप्त करने के पूर्व ही, अपने बछड़े पर प्रेम रखनेवाली गाय के समान, विविध योनियों में उत्पन्न प्राणियों की रक्षा करनेवाले, अपने करों में आजानुचक्र तथा दृढ़ कोदंड धारण करनेवाले, गनु नामक उन्नत स्कंधोंवाले वीर के वंश में उत्पन्न श्रीराम ये वचन करने लगे।

विद्युत् को अपनी कांति से परास्त करनेवाला तथा सूर्य-किरण एवं अग्नि से निर्मित माला को धारण करनेवाले (हे लक्ष्मण)। मुकुटधारी चक्रवर्ती ने जब राज्य का भार मुझे देने की बात कही, तब यह विचार किये बिना ही कि यह राज्य पीछे अनेक कष्ट उत्पन्न करेगा, मैं उसे स्वीकार करने को राजी हो गया। यह मेरा ही अपराध है। इसमें चक्रवर्ती का क्या दोष है?

गङ्गा ... में, सुख पाने में नदी का कोई दोष नहीं होता। उसी प्रकार (मुझे

अयोध्याकाण्ड २१५

वन जाने की आज्ञा देने में मुझ पर अधिक प्रेम रखनेवाले) चक्रवर्त्ती का कोई दोष नहीं हैं। जन्म देकर अब मुझे वन में जाने की आज्ञा देने में, अबतक हम पर वात्सल्य रखनेवाली माता (कैकेयी) का भी दोष नहीं है। इसमें (कैकेयी) के पुत्र भरत का भी दोष नहीं है! हे वत्स ! यह विधि का ही दोष है। इसके लिए तुम क्यों क्रोध करते हो?—यों श्रीराम ने कहा।

तब लक्ष्मण ने लुहार की विशाल भट्टी की अग्नि के समान, निःश्वास भरकर उत्तर दिया—ताप से भरे अपने इस हृदय को मैं कैसे शान्त करूँ ? मेरा यह धनुष उत्पात उत्पन्न करनेवाली (कैकेयी) के मन में सन्मति उत्पन्न करेगा और त्रिदेवों के वश में भी न रहनेवाली बहुत ही बलवान् नियति के लिए भी नियति बनेगा। आप देखेंगे।

लक्ष्मण के यों कहने पर राम ने उनसे कहा—हे तात ! वेदों के तत्त्व को जाननेवाले तुम, अपने मुँह में जो कुछ बात आती है, उसे कह रहे हो। तुमने जो कहा, वह धर्म का अनुसरण करनेवाले लोगों में नहीं देखा जाता। (तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कार्य करनेवाले) जब तुम्हारे माता-पिता ही हैं, तब उनपर क्रोध कैसे कर सकते हो १

चन्द्रकला को शिर पर धारण करनेवाले रुद्र के समान रोष से भरे हुए लक्ष्मण ने कहा—दूसरों को अपना स्वत्व दान करने की भीख पाये हुए हे उदार ! मेरे उत्तम पिता आप हैं। स्वामी आप हैं। जननी आप हैं। मेरे अन्य कोई नहीं हैं। आज आप मेरे धनुष के प्रभाव को देखें। और, उसने आगे का कार्य करने के लिए अपना हाथ उठाया।

तब वरद (राम) उनसे कहने लगे—माता (कैकेयी) ही. जिसने वर प्राप्त किया है, वास्तव में इस राज्य को पाने का अधिकार रखती हैं। उनके और मेरे पिता की आज्ञा से भरत इस राज्य का अधिकार प्राप्त करेगा। अब मैं जो ऐश्वर्य प्राप्त करनेवाला हूँ, वह है तपस्या। वह इस राज्य से भी अधिक सुखदायक है। उनसे बढ़कर वस्तु और क्या हो सकती है ?

राम आगे बोले—हे भाई! तुम्हारा यह कोप कैसे शांत होगा ? क्या इस संसार की माया से पृथक् रहकर पवित्र सन्मार्ग पर जीवन व्यतीत करनेवाले भाई (भरत) को युद्ध में मारकर, या महापुरुषों के द्वारा प्रशंसित अनुपम कार्य करनेवाले पिता (दशरथ) को पीड़ा देकर, अथवा जननी को परास्त करके?—कहो, कैसे शांत होगा ?

मन को प्रभावित करनेवाले वचन कहने में समर्थ (राम) के वचनों के उत्तर में लक्ष्मण ने कहा—शत्रुओं के द्वारा भी प्रशंसा पानेवाला मैं, बढ़े हुए दो पर्वतों के समान दो भुजाओं का भार व्यर्थ ही वहन कर रहा हूँ। तूणीर एवं दृढ धनुष को भी ढोने के लिए मैं उत्पन्न हुआ हूँ। अब (मेरे) क्रोध करने से क्या लाभ ?

तब दक्षिण की भाषा (-रूपी समुद्र) के पारगत तथा संस्कृत-भाषा के शास्त्र तथा विज्ञान की सीमा तक पहुँचे हुए राम ने लक्ष्मण से कहा—अबतक जिन पिता ने मुझे मधुर वचन कहकर तथा पाल-पोसकर बड़ा किया, उनके वचन का उल्लङ्घन करके तुम यदि कुछ करोगे, तो उससे तुम्हारी क्या हानि होगी ?'


१ अन्तिम वाक्य में लक्ष्मण की आलोचना अंतर्निहित है।—अनु०

२१६ | कंब रामायण

कभी पीछे न हटनेवाले प्रभु (राम) की आज्ञा से लक्ष्मण ने अपना क्रोध शांत किया और प्रभु के सम्मुख खड़े होकर चार वेदों के समान ही अपने विवेक से कुछ वचन कहना छोड़ दिया। अपनी वेला का अतिक्रमण न करनेवाले समुद्र के समान लक्ष्मण अपने में उपशांत हो गया।

(भाव यह है—वेद भी जिस भगवान् के सम्मुख मौन हो जाते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मण भी उनके सम्मुख हारकर निरुत्तर खड़े रहे।)

तब प्रभु ने लक्ष्मण का ऐसे आलिंगन किया, जैसे वे (राम) स्वयं जिसका आदि और अन्त नहीं पहचान सकते, वं उन्ही (राम) के स्वरूप (अर्थात् विष्णु), स्वर्णवर्ण मृगचर्म को पहननेवाले शिवजी का आलिंगन कर रहे हों। फिर, मधुर वचनों से युक्त सुमित्रा देवी के प्रासाद मे (लक्ष्मण के साथ) जा पहुँचे।

सुमित्रा ने, अपने दो नेत्रों-जैसे उन दोनों (राम और लक्ष्मण) को देखा, जो दंडकारण्य में जाने का निश्चय करके आये थे, तो उसका हृदय विदीर्ण होगया। वह शोक-समुद्र का पार न देखती हुई धरती पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।

तब रामचन्द्र दुःखी सुमित्रा के, उसके काटनेवाले दुःख-रूपी करवाल से उसको बचाने के लिए, उसके चरणो को नमस्कार करके मन को सान्त्वना देनेवाले वचन बोले—युद्ध मे निपुण शस्त्रधारी चक्रवर्त्ती को मैं असत्यवादी नही बनाऊँगा। काले मेघों से युक्त विशाल वन को थोड़ा देखकर मैं यहाँ लौट आऊँगा।

मैं वन मे जाऊँ, समुद्र मे जाऊँ, कोलाहल से भरे देवलोक मे जाऊँ, मेरे लिए कोई भी स्थान महिमामय अयोध्या के समान ही होगा। मुझे दुःख देनेवाला कौन है? अतः आप व्याकुलप्राण और कृशगात्र होकर मूर्च्छित न हों।

जब वे (राम-लक्ष्मण) सुमित्रा के दुःख को ऐसे शांत कर रहे थे, जैसे वे अग्नि को बुझा रहे हों, तब रोग की पीड़ा को न सहनेवाले जीव के जैसे लचीली कटिवाली कुछ स्त्रियाँ अमिट अपयशवाली कैकेयी के द्वारा दिये गये वल्कल लेकर उनके निकट आईं।

(कैकेयी की दासियों) कालमेघ-सदृश राम को ज्यों-ज्यों देखती थी, त्यों-त्यों उनकी आँखों से भी अधिक उनका मन पिघलकर पानी हो रहा था। उन्होंने राम से कहा—विपदा में पड़े हुए अन्य लोगों को पीड़ित देखकर भी अपने निश्चय से न डिगने-वाली कठोरहृदया (कैकेयी) के भेजने से हम ये वल्कल (आपके लिए) लाईं हैं।

तब अनुज (लक्ष्मण) ने उज्ज्वल मुक्तांतुल्य दाँतोंवाली उन दासियों को देखकर कहा—नवीन तथा वैभवमय राज्य को जिन कैकेयी ने (राम से) छीन लिया है, उनके दिये हुए सब प्रसाधनों को पहनने के लिए उत्पन्न ये मेरे भाई खड़े हैं। हाथ मे युद्ध के योग्य धनुष को रखे हुए मैं भी निष्क्रिय होकर यह सब देखने के लिए उत्पन्न हुआ हूँ। उन प्रसाधनों को दिखाओ।

फिर, राम ने उन दासियों के दिये वल्कलों को आदर के साथ लेकर पवित्र सुमित्रा देवी के स्वर्ण-आभरणों से भूषित चरणों को यह कहकर प्रणाम किया कि हे हमारी स्वामिनी, यदि आप हमें यह आज्ञा दें कि पीड़ाजनक कष्टों से मुक्त होकर तुम (वनवास

अयोध्यकाण्ड २१७

के लिए ) अविलंब जाओ, तो आपकी वही ( आज्ञा ) हमारी सहायता करनेवाली होगी ।
तब सुमित्रा ने लक्ष्मण के प्रति ये वचन कहे—वन तुम्हारे जाने के लिए अयोग्य नहीं है । वह वन ही तुम्हारे लिए अयोध्यानगर होगा । तुम पर गाढ अनुराग रखनेवाले ये राम ही तुम्हारे लिए दशरथ हैं । पुष्पालंकृत केशोंवाली सीता ही तुम्हारे लिए वे माताएँ हैं, जिन्होंने राम के राज्य त्याग कर वन जाने पर भी अपने प्राण नही त्यागे । इस प्रकार का विचार रखकर तुम राम के संग वन में जाओ । अब तुम्हारा यहाँ रहना अपराध होगा ।
पुनः सुमित्रा ने उससे कहा—हे पुत्र । इन ( राम ) के पीछे-पीछे जाओ । उनका भाई होकर नही, किन्तु उनका दास होकर जाओ । उनकी सेवा करना । यदि ये राम नगर को लौट आयेगे, तो तुम भी लौटकर आना , यदि नही आयेगे तो तुम उनसे पूर्व अपने प्राण त्याग देना । यह कहकर वह देवी ( सुमित्रा ) आँखों से अश्रु वहाती हुई खड़ी रही ।
फिर, दोनो ने सुमित्रा को नमस्कार किया । सुमित्रा, अपने दो वछड़ों से वियुक्त होकर पीडित होनेवाली गाय के समान व्याकुल हो रो पड़ी । उपमाहीन कुमार भी अपनी सुन्दर कटि के रेशमी वस्त्रो को हटाकर वल्कल पहनकर वाहर निकले ।
भ्रमरो से गुंजरित पुष्पमाला धारण करनेवाले राम ने लक्ष्मण को अपने जैसे ही वल्कल पहने हुए देखकर कहा—हे स्वर्ग को अलंकृत करनेवाली कीर्त्ति से शोभित ! मेरी इस बात को सुनो और उसका निरादर मत करो ।
हमारी सब माताएँ तथा चक्रवर्त्ती पूर्व दशा मे नही हैं । वे दारुण दुःख मे निमग्न हैं। मुझसे वियुक्त हैं। अतः, तुम मेरे लिए यहाँ रहकर उनकी विपदा दूर करो ।
पौरुषवान् राम के यह बात कहने पर भक्तिपूर्ण लक्ष्मण ऐसे भयभीत हुए कि उनके स्तम्भ-समान पुष्ट कंधे काँप उठे । उनके जो प्राण ( राम के संग वन जाने की उमंग मे ) लौट आये थे, वे बीच मे ही व्याकुल हो उठे । यो रोते हुए लक्ष्मण ने ( राम् से ) कहा—आपके प्रति कौन-सा अपराध मैने किया है ?
हे ज्या-युक्त कोदंड धारण करनेवाले ! विचार करके देखने पर विदित होगा कि जहाँ जल है, वही मीन हैं और नील उत्पल होते हैं । यह पृथ्वी है, इसीलिए तो सब प्राणिजात हैं । उसी प्रकार आपके न रहने पर मै तथा आपकी देवी कैसे रह सकते हैं ? आप ही बतावे ?
स्वर्णकंकणधारिणी एक ( पत्नी ) के कहने से, रक्षा करनेवाले चक्रवर्त्ती, भूमि देवी के कातर होकर व्याकुल होते हुए, आपको यह आदेश देकर कि वन को जाओ, स्वय जीवित हैं। क्या उन चक्रवर्त्ती का मुझे पुत्र मानकर ही आप यह वचन कह रहे हैं ?
हे मेरे स्वामिन् । आपके वन-गमन के कारण मेरे मन मे जो क्रोध उत्पन्न हुआ, उसे मैने शान्त कर लिया । अब मुझसे आप जो कह रहे हैं, उससे अधिक पीडाजनक मेरे लिए और क्या हो सकता हैं ?
तेल से सिक्त शत्रु-नारियो की आँखो के काजल को पोछनेवाले तथा शत्रुहीन

२१८ | कम्ब रामायण

होने से कोश में रखे हुए भाले से युक्त हे प्रभो ! आप पूर्वजों से प्राप्त अपना समस्त स्वत्व खोकर जा रहे हैं; तो क्या हमें भी छोड़ जाना चाहते हैं ?

लक्ष्मण के यह कहने पर रामचन्द्र कुछ नहीं कह सके और पर्वत-सदृश कंधोंवाले लक्ष्मण का वदन देखते रहे। लक्ष्मण के मन की पीडा को जानकर अपने सुगन्धित विशाल कमल जैसे नयनों से अश्रुधार बहाते हुए खड़े रहे।

उसी समय प्रेम-भरे तथा पवित्र तप से संपन्न मुनिवर (वसिष्ठ) राजसभा से वहाँ आये। दोनो मनोहर राजकुमारों ने उनके प्रति सिर झुकाया। (उन्हें देखकर) मुनिवर दुःखनामक महासमुद्र में डूब गये।

तत्त्वज्ञान से संपन्न मुनिवर ने उन (राम-लक्ष्मण) के वदन को तथा उनके मन को भी देखा। उनकी कटि में बंधे वल्कल की शोभा को देखा। फिर क्या कहना है ! उस समय उत्पन्न मनोवेदना के कारण मुनिवर अपने को भी भूल गये।

जो दिन (रामचन्द्र के) राजतिलक के उत्सव के लिए निश्चित हुआ था; उस सुखदायक दिन में राम ने, दुःखदायक विधि के प्रभाव से; वल्कल धारण किया। स्वयं चतुर्मुख ही नियति को बदलने का प्रयत्न क्यों न करे, तो भी नियति का विधान आकर घेर ही लेता है। ऐसी नियति को कौन मिटा सकता है ?

यह उत्पात, केवल कठोर कैकेयी के कारण ही उत्पन्न नहीं हुआ है। यह पुण्य-स्वरूप (राम) ऐसा दुःख पाने के योग्य भी नहीं हैं; तो किस कारण से यह सब संघटित हुआ ? यह किसका षड्यन्त्र है ? यह सब भविष्य में प्रकट होगा। इस प्रकार वसिष्ठ ने सोचा।

कोदण्ड तथा विशाल कमल-सदृश नयनों से शोभित वीर (राम) के समीप आकर वसिष्ठ ने कहा—हे वत्स ! तुम यहाँ से जाकर उन्नत पर्वतों से युक्त वन को देखोगे। किन्तु, अति विशाल सेना से युक्त चक्रवर्त्ती को जीवित नहीं पाओगे।

तब आदिशेष के पर्यंक से हटकर पृथ्वी पर अवतीर्ण (श्रीराम) ने वसिष्ठ से कहा—चक्रवर्त्ती की आज्ञा को शिर पर धारण कर उसका पालन करना मेरा कर्त्तव्य है। उनके शोक को दूर करना आपका कर्त्तव्य है। यही न्याय है ।

तब वसिष्ठ ने कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा नहीं दी है कि तुम 'कंटकपूर्ण अरण्य में जाओ। हाँ, शत्रुओं के शर के समान वचन कहनेवाली क्रूर कैकेयी की ओर से पैनाये गये भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती ने उनको वर दिये हैं।

उज्ज्वल धर्म की रक्षा के लिए उत्पन्न राम ने कहा—मेरे पिता ने मेरी माता को वर दिये। मेरी माता ने मुझे (वन जाने की) आज्ञा दी। मैंने वह आज्ञा शिरोधार्य की। सबके साक्षी बने हुए आप क्या हमको रोकने का विचार कर रहे हैं ?

तब वसिष्ठ अवाक् होकर, धरती पर अश्रु बहाते हुए खड़े रहे। पर्वताकार कंधों-वाले राम, मुनिवर को प्रणाम करके चक्रवर्त्ती के स्वर्णमय प्राचीरों से युक्त प्रासाद के द्वार पर जा पहुँचे।

वल्कलों से शोभायमान, लक्ष्मण से अनुसृत, प्रभूत आनन्द से भरित और कमल से

अयोध्याकाण्ड २१६

भी अधिक सुन्दर वदन से युक्त राम के निश्चय को जानकर उस नगर के लोगो को जो दुःख हुआ, अब हम उसका वर्णन किसी प्रकार से करेगे ।

ब्राह्मणो, अपूर्व तपस्या से युक्त मुनियो, राजाओ तथा उस देश के निवासियो के हृदय की दशा के बारे मे हम क्या कहे ? (इस घटना से) देवता लोग भी इतने दुःखी हुए कि उन्होने भविष्य मे उत्पन्न होनेवाले सुख को भी त्याग दिया ।

देव-रमणियो की समता करनेवाली नारियाँ ( वल्कलधारी ) राम को देखकर अपने करो से अपनी मदभरी आँखो पर इस प्रकार प्रहार करने लगी, जैसे कमलपुष्प पर मँडरानेवाले मत्त भ्रमरो को घने पल्लवो से उड़ा रही हो ।

कुछ लोग ( राम के प्रति ) अछीण अनुराग के कारण राम के पिता के पूर्व ही स्वर्ग मे जा पहुँचे। क्या इसका कारण उनका द्विविध कर्म-बन्धन को तोड़ देना था ? या उनके व्याकुल प्राणो का लौटकर नही आना था ?

कुछ गिर पड़े। कुछ सिसक-सिसककर रो उठे। कुछ अपनी आँखो से बहनेवाले अश्रुओ से ढक गये ! कुछ इस प्रकार कातर हो उठे, मानो उनके केशो में आग लग गई हो ।

कुछ लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे, जैसे प्रभूत संपत्ति को खो बैठे हो और जो इक्षुरस-समान ( मधुर ) वचनवाले थे, आँखो से आँसू न बहाते हुए लौह-सदृश हृदयो के साथ स्तम्भ हो खड़े रहे। कदाचित् अपार दुःख से उनकी बुद्धि भ्रात हो गई थी ।

कुछ लोगो के शरीर से निकले हुए प्राण एक दशा में स्थिर नही रहे और ऐसे हो गये कि अभी चले, अभी चले। कुछ के प्राण बाहर निकलकर पुनः शरीर में लौट आये। कुछ लोगो की आँखो से, अश्रुओं के सूख जाने से, रक्त ऐसे बहने लगा, जैसे घाव से बहता है।

दो सूँडोवाले हाथी-जैसे ( भुजाओवाले ) अनेक वीरो ने अपने बड़े करवाल से अपने शिर को काट डाला और एक हाथ में ( अपना शिर ) रखकर उसे उछालने लगे और कुछ वीरो ने अपने कमल-नेत्रो को कटार से भोककर निकाल दिया ।

उनके ( स्त्रियों के ) आभरण बिखर पड़े। आभरणो के रत्न बिखर पड़े। पुष्पहार-जैसी मेखलाएँ बिखर गई । रमणियो के उज्ज्वल मंदहास अदृश्य हो गये। उनके सुन्दर वदन ( जो पहले कभी चन्द्रमा से परास्त नही होते थे, अब ) चन्द्रमा से परास्त हो गये ।

चक्रवर्त्ती की पवित्र पातिव्रत्यवाली साठ सहस्र पत्नियाँ अश्रु बहाती हुई राम के पीछे-पीछे चली ओर अपने मुँह खोलकर वीची-भरे समुद्र के समान शब्द करती हुई रो पड़ीं।

वे स्त्रियाँ, जिनके राम के अतिरिक्त अन्य कोई पुत्र नही था, इस प्रकार ( भूमि पर ) गिरकर रोती थी, जैसे मयूर, कोकिल और हस पंखो से हीन होकर धरती पर आ गिरे हो ।

उन स्त्रियो की अमृत से भी अधिक मधुर वाणी, अविराम रूप में निःश्वास भरते हुए रोते रहने के कारण, वंशी तथा तन्त्री से युक्त मधुर नादवाले याक्-वाद्य से हार गई ।

अहो ! क्या ( राम के ) जाने योग्य स्थान अरण्य है ! कहकर वे स्त्रियाँ विलाप कर रही थी। उनके वदनो से विशाल चहार-दिवारी से युक्त प्रासाद एक

२२० | कंब रामायण

ऐसे सरोवर के समान लगता था, जिसमे रक्त कुवलय दिन मे ही विकसित हो रहे हो ।

उनके नेत्रों से उत्पन्न अश्रु की नदियाँ, उनके वक्ष पर के प्रभूत कुंकुम-लेप और चंदनरस-रूपी कीचड़ से मिलकर मुक्ताहार को वहाती हुई, घने स्तन-रूपी पर्वतो को पार कर गईं और मेखला-युक्त कटि-तट रूपी समुद्र मे जा पहुँची ।

उद्यानो से पूर्ण कोशल देश के प्रभु (दशरथ) की पत्नियो को, उनके कमल-सदृश उज्ज्वल मुखो को आज सूर्य ने भी देखा । स्वर्ग मे रहनेवाला देवेंद्र ही क्यो न हो, जब विपदा उत्पन्न होती है, तब उसे क्या नही भोगना पड़ता है ?—(अर्थात्, असूर्यम्पश्या कही जानेवाली स्त्रियाँ भी राम के वन-गमन का समाचार सुनकर बाहर निकल आईं ।)

माताएँ, वधुजन, आश्रित जन, दूर की रहनेवाली, समीप की रहनेवाली, सब प्रकार की स्त्रियाँ प्रज्वलित अग्नि मे गिरी-सी तड़प उठी और घरो के आँगनो मे और बाहर भर गईं ।

सब लोग चिल्ला उठे । (अयोध्या की जनता) सब दिशाओ मे उमड़े हुए समुद्र के समान बड़ी ध्वनि करती हुई राम को घेरकर चल पड़ी । पर्वत-समान कंधोवाले राम, उनको क्या कहना चाहिए—यह नही जानते हुए और उनको लौटाने का कोई उपाय भी नही देखते हुए अपने प्रासाद की ओर बढ़ चले ।

जो राम उन्नत किरीट को धारण करने के लिए, उत्तम रत्नो से जटिल रथ पर सवार होकर गये थे, वही अब वल्कल पहनकर पुनः उसी सुन्दर तथा विशाल वीथी मे (पैदल) चल रहे थे ।

उनको देखकर कुछ लोग कह रहे थे—अंजन-वर्ण इस प्रभु पर जो विपदा आ पड़ी है, उसे देखकर भी जो प्राण शरीर को छोड़कर नही जा रहे हैं, उन प्राणो तथा उन हृदयो से बढ़कर कठोर वस्तु का हम अनुमान तक नही कर सकते । सचमुच मनुष्य का स्वार्थ विष से भी अधिक क्रूर होता है ।

कुछ लोग कह रहे थे—हम इस प्रतीक्षा में वीथी मे खडे थे कि रामचन्द्र राज-तिलक धारण करके इस मार्ग से लौटेगे, किन्तु अब हम उन्हें धूप से भरी धरती पर यो चलते हुए देख रहे हैं । इस देश मे, जहाँ एक स्त्री इस प्रकार का क्रूर कार्य करती है, नेत्रवान् होकर जन्म लेना ही पाप है ।

कुछ लोग कह रहे थे—क्या यह उचित है कि सारे ससार को अपना बनाने की शक्ति रखनेवाला, ज्येष्ठ पुत्र होकर उत्पन्न होनेवाला, यह राम, व्याघ्रो के निवासभूत अरण्य मे निवास करने के लिए जायें और यो उसे जाते हुए देखकर भी हम चुप रहे ? अहो ! हमारा प्रेम भी अद्भुत सुन्दर है !

कुछ लोग कह रहे थे—क्षत्रिय-कुल को मिटानेवाले परशुराम के बल को भग करनेवाले इस घनश्याम राम ने शक्तिहीन तथा विवेक-भ्रष्ट हुए चक्रवर्ती को देखकर यह नही कहा कि आप हित को छोड़कर धर्म का नाश क्यो करना चाहते हैं ? अतः, यह राम भी इस पृथ्वी के शासन से हटानेवाली उस कैकेयी के ही समान है ।

कुछ लोग कह रहे थे—अपनी सुन्दर कटि मे वल्कल पहने, बड़े दुःख मे अभिभूत

अयोध्याकाण्ड २२१

होकर राम के पीछे-पीछे चलनेवाला दो पुत्रों की जननी (सुमित्रा) का यह पुत्र (लक्ष्मण) ही इस नगर-भर में राम का अनन्य बन्धु है ।

कुछ लोग यह कहते हुए कि पत्थर से भी अधिक कठोर अपने हृदयो को हम फरसे से काट देंगे—दौड़ जाते थे और मार्ग-मध्य अपने अश्रुओं के कारण उत्पन्न कीचड़ में फिसलकर गिर पड़ते थे।

कुछ लोग अपने शरीर पर से रत्नाभरणों को उतारकर फेंक देते थे। विद्युत्-समान कांति से युक्त अपने शरीर पर से रंग-बिरंगे वस्त्रों को फाड़कर फेंक देते थे और छोटे फटे वस्त्र पहन लेते थे।

कुछ लोग कह रहे थे—संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अनेक पुत्रों के होने पर भी, यदि उनका कोई एक पुत्र किसी अवयव से हीन होकर उत्पन्न होता है, तो अपने प्राण छोड़ देते हैं। किन्तु इन चक्रवर्ती का, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र को अरण्य में भेजकर अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं, उनका मन लोहे से भी अधिक कठोर है।

कुछ लोग कह रहे थे—यह रामचन्द्र मेघ के अतिरिक्त अन्य किसी उपमान से हीन श्रेष्ठ करुणा की मूर्त्ति है, इसके अतिरिक्त इसमें दूसरी कोई कमी नहीं है। यदि नगर की सारी प्रजा इसके साथ ही अरण्य में जा बसे, तब भी क्या कैकेयी अपने प्रिय पुत्र के साथ इस पृथ्वी का शासन करती रहेगी ?

कुछ-कुछ झुकी हुई सूक्ष्म कटि को दुखानेवाले स्तन-भार से युक्त स्त्रियाँ रोदन की ध्वनि के साथ, घने 'कान्तल' पुष्प-सदृश अपने अरुण करों को सिर पर रखे हुए, लताओं के समान एक ओर खड़ी रहीं।

चन्द्र को छूनेवाले शिखरों से युक्त प्रासादों की ऊपरी मंजिलों में खड़ी हुई स्त्रियों की आँखों से निरंतर बहनेवाले आँसू उनके स्तनों को भिंगो रहे थे। वे स्त्रियाँ पर्वत-शिखरों पर स्थित मयूरों के समान दुःखी हो रही थीं।

मेघ-सदृश अगरु-धूम से भरे सौधों के विशाल वातायनों से (राम को) देखनेवाली गद्गद स्वरवाली स्त्रियों की अंजन-लगी आँखों से अश्रुजल निर्झर के समान बह रहा था। वे स्त्रियाँ पिंजरस्थ शुक के समान रो रही थीं।

सौधों की ऊपरी मंजिलों से देखनेवाले लोगों की आँखों से बड़ी-बड़ी अश्रुधाराएँ निकलकर सौधों के बाहर बह रही थीं। अतः, ऐसा लगता था, मानो वे सौध भी चक्रवर्त्ती-कुमार (राम) के प्रति दुःखी होकर रो रहे हैं।

स्त्रियाँ अपने शिशुओं को भूल गईं। पुत्र अपनी माता को भूल गये। इस प्रकार, उस नगर के लोग व्याकुल होकर बड़ी पीड़ा से प्रजा-रहित-से होकर बड़े शब्द के साथ रो रहे थे।

'कामर' (नामक) राग के समान मृदु स्वरवाली सब सुन्दरियाँ वीथी में एक हो गईं, जिससे धवल प्रासाद, सुन्दर दृश्य तथा सुगंधित केशोंवाली लक्ष्मी से विहीन कमल के समान लगते थे।

शर-विद्ध हरिणियों विकल हो रही हों—इस प्रकार...

२२२

कव रामायण

हुई उत्तम कर्णाभरणो से युक्त सुदरियाँ घन-पटल के समान केशपाशो को धरती पर फैलाये अपने आभरण बिखेरते हुए झुण्डो में जा रही थी।

पर्वत-समान सौधो की पताकाएँ संकुचित हो गई। उत्तम भेरियो के शब्द थम गये। विविध वाद्यो के नाद दब गये। प्रासादो के प्राचीरो से बाहर की वीथियो की धूल धरती में चारों ओर बहनेवाली अश्रुधारा से दब गई।

रसोईघर धूम-हीन हो गये। ऊँचे सौध अगरु-धूम से विहीन हो गये। शुको के पात्र दूध से विहीन हो गये और उत्तम रत्न-जटित पालने और उनमे सोनेवाले शिशु, स्त्रियो के आगमन से विहीन हो गये—(अर्थात्, पालनों में स्थित बच्चो के रोने पर भी माताएँ नही आती थी।)

सबके मुख प्राण-हीन जैसे कान्ति-रहित हो गये। मेघ-समूह वर्षा-रहित हो गये। घोडे, स्वच्छ जल से युक्त अश्व-शालाओ को छोड़कर चले गये। मत्तगज, पुष्पो के मधु को पीनेवाले भ्रमरो के जैसे, अपने आनन्द को छोड़कर चले गये।

छत्र छाया नही कर रहे थे। दीर्घ नयनोवाली रमणियो के केश पुष्पो से शोभित नही हो रहे थे। पुरुषो के पाट-युगल वीर-वलयो से युक्त नही थे। क्रोधी मन्मथ के बाण भी उष्णता-विहीन हो गये। हस अपनी इसिनी को छोड़कर चल पड़े।

वीथियाँ, अश्वो की किंकिणियो की ध्वनि, भेरियो के चर्म-आवरण की ध्वनि और मेघ-समान शब्द करनेवाले रथों की ध्वनि से रहित होकर स्वच्छ वीचियो से युक्त जल की ध्वनि से विहीन समुद्र के समान लगने लगी।

गजवीथियो मे रोदन की ध्वनियो को छोड़कर वाद्यो की ध्वनियाँ नहीं होती थी। वीणा-तन्त्रियो के क्रमबद्ध स्वरो की ध्वनि नही होती थी। अनिमेष नयनोवाले देवो के उत्सवो मे उत्पन्न होनेवाली ध्वनि भी नही हो रही थी।

स्पष्ट शब्दवाले नूपुरो से प्रतिध्वनित सौध, अब शब्द-रहित थे। मेखलाओ के सबध मे भी यही बात थी। जलचर पक्षी नही बोल रहे थे। उद्यान मे भी ऐसी ही बात थी। पुष्पों में भ्रमर शब्द नहीं कर रहे थे। हाथी भी ऐसे ही हो गये।

खेत, जल को भूल गये—(अर्थात्, किसान खेतो को सींचने की बात भूल गये।) लाल अधरवाली सुन्दरीयों के कर, नवजात शिशुओ को भूल गये। प्रज्वलित होमाग्नियाँ, घृत को भूल गईं—(अर्थात्, ब्राह्मण उनमे घृत का होम करना भूल गये।) आत्मज्ञानी आत्मतत्त्व को भूल गये। बटू, शब्द को भूल गये—(अर्थात्, वेदो का वाचन बन्द हो गया)।

झुण्डों मे नृत्य करनेवाले अब रो पड़े। अमृत-समान मधुर सप्त स्वरो मे गान करनेवाले अब रो पड़े। अपने प्रियतमो के साथ प्रणय-कलह मे कुपित तथा पुष्पमालाओ से ग्रथित सुन्दरीयाँ अब रो पड़ीं। अपने प्रियतमो से मिलकर (आनन्दित) रहनेवाली सुन्दरीयाँ भी अब रो पड़ीं।

हाथी जलाशयों के पास जाकर अपनी सूँड, जल पीने के लिए नहीं बढ़ाते थे। घोड़े मुँह मे घास नहीं लेते थे। पक्षी अपने बच्चो के लिए आहार नही लाते थे। गायें अपने बछड़ों को दूध नहीं पिलाती थी और उनके थन व्याकुलता से द्रवित हो रहे थे।

अयोध्याकाण्ड २२३

पुरुषों के वक्ष पर युवतियों के स्तन-रूपी नारिकेल अंचित नहीं हो रहे थे—(अर्थात्, वे आलिंगन नहीं कर रहे थे)। पुष्प-समुदाय, चंदन-लेप करनेवाले पुरुषों के केशों को तथा उनकी युवतियों के केशों को अलंकृत नहीं कर रहे थे।

बड़े गज, मुखपट्ट और उत्तम आभरणों से घृणा करते थे। सौध-समुदाय, शिखरों में पहनने योग्य सुन्दर अलंकारों से घृणा करते थे। ध्वजाएँ, आकर्षक सौंदर्य से रहित हो गई थीं। स्वर्णमय मनोहर प्राचीर, मृदुगतिवाले कबूतरों तथा कबूतरियों की सुन्दरता से रहित हो गये।

सुख-दुःख को समान रूप से देखनेवाले योगी भी अधिक पीड़ा से दुःखी हुए। फिर, उन साधारण संसारी व्यक्तियों के बारे में क्या कहा जाय, जो दुःख के समय, अपने पाप का फल मानकर व्याकुल होते हैं और सुख प्राप्त होने पर पुण्य का फल मानकर आनंदित होते हैं।

वह अयोध्यानागर, (प्राणियों के) शरीरों से निःश्वास के साथ बाहर न निकलनेवाले प्राणों के व्याकुल होने से, मनोहर शोभा के मिट जाने से, अत्यधिक पीड़ा कारक दुःख के बढ़ने से तथा न मिटनेवाली पंचेंद्रियों के अस्त-व्यस्त होने से, उन (दशरथ) के समान ही लगते थे, जो (राम के विरह में) अपने प्राण छोड़ रहे थे।

इस प्रकार, जब उस नगर के लोग अत्यन्त कातर होकर पीड़ित हो रहे थे, कहीं झुण्ड बाँधकर खड़े थे और कहीं बुद्धिभ्रष्ट हो रोते हुए पीछे-पीछे चल रहे थे, तब राम, जो सचरणमान विविध प्राणियों की एक आत्मा के समान थे, उज्ज्वल आभरण-भूषित स्तनवती जानकी के आवास में जा पहुँचे।

ज्यों ही सीता ने वल्कलधारी राम को एवं उनके पाश्र्वों में माताओं, मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओं को रोते हुए तथा धूलि-भरे शरीरों के साथ आते हुए देखा, त्यों ही वह चित्र-प्रतिमा जैसी सुन्दरी, स्तब्ध होकर उठ खड़ी हो गई।

इस प्रकार उठकर खड़ी होनेवाली उन सीता का आलिंगन करके उनकी सासों ने उन्हें अंजन-अंचित नयनों के नूतन नीर से नहलाया। तब जानकी, जो उस परिस्थिति का कारण नहीं जानती थीं, व्याकुल चित्त के साथ अपनी विशाल आँखों से राम को देखकर अश्रु-धारा बहाती हुई—

और विद्युत् के समान काँपती हुई बोलीं—हे स्वर्णवीर-वलयधारी ! इस दुःख का कारण क्या है ? क्या कीर्तिमान् चक्रवर्ती को कुछ विपदा हुई है ? क्या हुआ ? बताइए।

राम ने सीता से कहा—मेरा उपमा-रहित भाई (भरत) राज्य करेगा। अपने आश्रयभूत गुरुजनों की आज्ञा से, मैं मेघों से भरित घने वन में जाऊँगा और उस वन को देखकर फिर लौट आऊँगा। तुम दुःखी मत होओ।

'पति राज्य के अधिकार से वंचित हो गये और वन-गमन करनेवाले हैं'—इस विचार से सीता दुःखी नहीं हुईं। किन्तु 'तुम दुःखी मत होओ, मैं जा रहा हूँ'—राम का यह कठोर वचन ही (सीता को) अत्यन्त पीड़ित कर रहा था।

जब विष्णु भगवान् 'धर्म मिट जायगा, उसकी रक्षा करनी है।'—इस विचार से क्षीरसागर में अपने पर्यंक को छोड़कर अयोध्या में अवतीर्ण हुए थे, तब लक्ष्मी देवी भी