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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 549 में से

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पृष्ठ 226

२१६ | कंब रामायण

कभी पीछे न हटनेवाले प्रभु (राम) की आज्ञा से लक्ष्मण ने अपना क्रोध शांत किया और प्रभु के सम्मुख खड़े होकर चार वेदों के समान ही अपने विवेक से कुछ वचन कहना छोड़ दिया। अपनी वेला का अतिक्रमण न करनेवाले समुद्र के समान लक्ष्मण अपने में उपशांत हो गया।

(भाव यह है—वेद भी जिस भगवान् के सम्मुख मौन हो जाते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मण भी उनके सम्मुख हारकर निरुत्तर खड़े रहे।)

तब प्रभु ने लक्ष्मण का ऐसे आलिंगन किया, जैसे वे (राम) स्वयं जिसका आदि और अन्त नहीं पहचान सकते, वं उन्ही (राम) के स्वरूप (अर्थात् विष्णु), स्वर्णवर्ण मृगचर्म को पहननेवाले शिवजी का आलिंगन कर रहे हों। फिर, मधुर वचनों से युक्त सुमित्रा देवी के प्रासाद मे (लक्ष्मण के साथ) जा पहुँचे।

सुमित्रा ने, अपने दो नेत्रों-जैसे उन दोनों (राम और लक्ष्मण) को देखा, जो दंडकारण्य में जाने का निश्चय करके आये थे, तो उसका हृदय विदीर्ण होगया। वह शोक-समुद्र का पार न देखती हुई धरती पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।

तब रामचन्द्र दुःखी सुमित्रा के, उसके काटनेवाले दुःख-रूपी करवाल से उसको बचाने के लिए, उसके चरणो को नमस्कार करके मन को सान्त्वना देनेवाले वचन बोले—युद्ध मे निपुण शस्त्रधारी चक्रवर्त्ती को मैं असत्यवादी नही बनाऊँगा। काले मेघों से युक्त विशाल वन को थोड़ा देखकर मैं यहाँ लौट आऊँगा।

मैं वन मे जाऊँ, समुद्र मे जाऊँ, कोलाहल से भरे देवलोक मे जाऊँ, मेरे लिए कोई भी स्थान महिमामय अयोध्या के समान ही होगा। मुझे दुःख देनेवाला कौन है? अतः आप व्याकुलप्राण और कृशगात्र होकर मूर्च्छित न हों।

जब वे (राम-लक्ष्मण) सुमित्रा के दुःख को ऐसे शांत कर रहे थे, जैसे वे अग्नि को बुझा रहे हों, तब रोग की पीड़ा को न सहनेवाले जीव के जैसे लचीली कटिवाली कुछ स्त्रियाँ अमिट अपयशवाली कैकेयी के द्वारा दिये गये वल्कल लेकर उनके निकट आईं।

(कैकेयी की दासियों) कालमेघ-सदृश राम को ज्यों-ज्यों देखती थी, त्यों-त्यों उनकी आँखों से भी अधिक उनका मन पिघलकर पानी हो रहा था। उन्होंने राम से कहा—विपदा में पड़े हुए अन्य लोगों को पीड़ित देखकर भी अपने निश्चय से न डिगने-वाली कठोरहृदया (कैकेयी) के भेजने से हम ये वल्कल (आपके लिए) लाईं हैं।

तब अनुज (लक्ष्मण) ने उज्ज्वल मुक्तांतुल्य दाँतोंवाली उन दासियों को देखकर कहा—नवीन तथा वैभवमय राज्य को जिन कैकेयी ने (राम से) छीन लिया है, उनके दिये हुए सब प्रसाधनों को पहनने के लिए उत्पन्न ये मेरे भाई खड़े हैं। हाथ मे युद्ध के योग्य धनुष को रखे हुए मैं भी निष्क्रिय होकर यह सब देखने के लिए उत्पन्न हुआ हूँ। उन प्रसाधनों को दिखाओ।

फिर, राम ने उन दासियों के दिये वल्कलों को आदर के साथ लेकर पवित्र सुमित्रा देवी के स्वर्ण-आभरणों से भूषित चरणों को यह कहकर प्रणाम किया कि हे हमारी स्वामिनी, यदि आप हमें यह आज्ञा दें कि पीड़ाजनक कष्टों से मुक्त होकर तुम (वनवास