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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 549 में से

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पृष्ठ 227

अयोध्यकाण्ड २१७

के लिए ) अविलंब जाओ, तो आपकी वही ( आज्ञा ) हमारी सहायता करनेवाली होगी ।
तब सुमित्रा ने लक्ष्मण के प्रति ये वचन कहे—वन तुम्हारे जाने के लिए अयोग्य नहीं है । वह वन ही तुम्हारे लिए अयोध्यानगर होगा । तुम पर गाढ अनुराग रखनेवाले ये राम ही तुम्हारे लिए दशरथ हैं । पुष्पालंकृत केशोंवाली सीता ही तुम्हारे लिए वे माताएँ हैं, जिन्होंने राम के राज्य त्याग कर वन जाने पर भी अपने प्राण नही त्यागे । इस प्रकार का विचार रखकर तुम राम के संग वन में जाओ । अब तुम्हारा यहाँ रहना अपराध होगा ।
पुनः सुमित्रा ने उससे कहा—हे पुत्र । इन ( राम ) के पीछे-पीछे जाओ । उनका भाई होकर नही, किन्तु उनका दास होकर जाओ । उनकी सेवा करना । यदि ये राम नगर को लौट आयेगे, तो तुम भी लौटकर आना , यदि नही आयेगे तो तुम उनसे पूर्व अपने प्राण त्याग देना । यह कहकर वह देवी ( सुमित्रा ) आँखों से अश्रु वहाती हुई खड़ी रही ।
फिर, दोनो ने सुमित्रा को नमस्कार किया । सुमित्रा, अपने दो वछड़ों से वियुक्त होकर पीडित होनेवाली गाय के समान व्याकुल हो रो पड़ी । उपमाहीन कुमार भी अपनी सुन्दर कटि के रेशमी वस्त्रो को हटाकर वल्कल पहनकर वाहर निकले ।
भ्रमरो से गुंजरित पुष्पमाला धारण करनेवाले राम ने लक्ष्मण को अपने जैसे ही वल्कल पहने हुए देखकर कहा—हे स्वर्ग को अलंकृत करनेवाली कीर्त्ति से शोभित ! मेरी इस बात को सुनो और उसका निरादर मत करो ।
हमारी सब माताएँ तथा चक्रवर्त्ती पूर्व दशा मे नही हैं । वे दारुण दुःख मे निमग्न हैं। मुझसे वियुक्त हैं। अतः, तुम मेरे लिए यहाँ रहकर उनकी विपदा दूर करो ।
पौरुषवान् राम के यह बात कहने पर भक्तिपूर्ण लक्ष्मण ऐसे भयभीत हुए कि उनके स्तम्भ-समान पुष्ट कंधे काँप उठे । उनके जो प्राण ( राम के संग वन जाने की उमंग मे ) लौट आये थे, वे बीच मे ही व्याकुल हो उठे । यो रोते हुए लक्ष्मण ने ( राम् से ) कहा—आपके प्रति कौन-सा अपराध मैने किया है ?
हे ज्या-युक्त कोदंड धारण करनेवाले ! विचार करके देखने पर विदित होगा कि जहाँ जल है, वही मीन हैं और नील उत्पल होते हैं । यह पृथ्वी है, इसीलिए तो सब प्राणिजात हैं । उसी प्रकार आपके न रहने पर मै तथा आपकी देवी कैसे रह सकते हैं ? आप ही बतावे ?
स्वर्णकंकणधारिणी एक ( पत्नी ) के कहने से, रक्षा करनेवाले चक्रवर्त्ती, भूमि देवी के कातर होकर व्याकुल होते हुए, आपको यह आदेश देकर कि वन को जाओ, स्वय जीवित हैं। क्या उन चक्रवर्त्ती का मुझे पुत्र मानकर ही आप यह वचन कह रहे हैं ?
हे मेरे स्वामिन् । आपके वन-गमन के कारण मेरे मन मे जो क्रोध उत्पन्न हुआ, उसे मैने शान्त कर लिया । अब मुझसे आप जो कह रहे हैं, उससे अधिक पीडाजनक मेरे लिए और क्या हो सकता हैं ?
तेल से सिक्त शत्रु-नारियो की आँखो के काजल को पोछनेवाले तथा शत्रुहीन