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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

अयोध्यकाण्ड २१७

के लिए ) अविलंब जाओ, तो आपकी वही ( आज्ञा ) हमारी सहायता करनेवाली होगी ।
तब सुमित्रा ने लक्ष्मण के प्रति ये वचन कहे—वन तुम्हारे जाने के लिए अयोग्य नहीं है । वह वन ही तुम्हारे लिए अयोध्यानगर होगा । तुम पर गाढ अनुराग रखनेवाले ये राम ही तुम्हारे लिए दशरथ हैं । पुष्पालंकृत केशोंवाली सीता ही तुम्हारे लिए वे माताएँ हैं, जिन्होंने राम के राज्य त्याग कर वन जाने पर भी अपने प्राण नही त्यागे । इस प्रकार का विचार रखकर तुम राम के संग वन में जाओ । अब तुम्हारा यहाँ रहना अपराध होगा ।
पुनः सुमित्रा ने उससे कहा—हे पुत्र । इन ( राम ) के पीछे-पीछे जाओ । उनका भाई होकर नही, किन्तु उनका दास होकर जाओ । उनकी सेवा करना । यदि ये राम नगर को लौट आयेगे, तो तुम भी लौटकर आना , यदि नही आयेगे तो तुम उनसे पूर्व अपने प्राण त्याग देना । यह कहकर वह देवी ( सुमित्रा ) आँखों से अश्रु वहाती हुई खड़ी रही ।
फिर, दोनो ने सुमित्रा को नमस्कार किया । सुमित्रा, अपने दो वछड़ों से वियुक्त होकर पीडित होनेवाली गाय के समान व्याकुल हो रो पड़ी । उपमाहीन कुमार भी अपनी सुन्दर कटि के रेशमी वस्त्रो को हटाकर वल्कल पहनकर वाहर निकले ।
भ्रमरो से गुंजरित पुष्पमाला धारण करनेवाले राम ने लक्ष्मण को अपने जैसे ही वल्कल पहने हुए देखकर कहा—हे स्वर्ग को अलंकृत करनेवाली कीर्त्ति से शोभित ! मेरी इस बात को सुनो और उसका निरादर मत करो ।
हमारी सब माताएँ तथा चक्रवर्त्ती पूर्व दशा मे नही हैं । वे दारुण दुःख मे निमग्न हैं। मुझसे वियुक्त हैं। अतः, तुम मेरे लिए यहाँ रहकर उनकी विपदा दूर करो ।
पौरुषवान् राम के यह बात कहने पर भक्तिपूर्ण लक्ष्मण ऐसे भयभीत हुए कि उनके स्तम्भ-समान पुष्ट कंधे काँप उठे । उनके जो प्राण ( राम के संग वन जाने की उमंग मे ) लौट आये थे, वे बीच मे ही व्याकुल हो उठे । यो रोते हुए लक्ष्मण ने ( राम् से ) कहा—आपके प्रति कौन-सा अपराध मैने किया है ?
हे ज्या-युक्त कोदंड धारण करनेवाले ! विचार करके देखने पर विदित होगा कि जहाँ जल है, वही मीन हैं और नील उत्पल होते हैं । यह पृथ्वी है, इसीलिए तो सब प्राणिजात हैं । उसी प्रकार आपके न रहने पर मै तथा आपकी देवी कैसे रह सकते हैं ? आप ही बतावे ?
स्वर्णकंकणधारिणी एक ( पत्नी ) के कहने से, रक्षा करनेवाले चक्रवर्त्ती, भूमि देवी के कातर होकर व्याकुल होते हुए, आपको यह आदेश देकर कि वन को जाओ, स्वय जीवित हैं। क्या उन चक्रवर्त्ती का मुझे पुत्र मानकर ही आप यह वचन कह रहे हैं ?
हे मेरे स्वामिन् । आपके वन-गमन के कारण मेरे मन मे जो क्रोध उत्पन्न हुआ, उसे मैने शान्त कर लिया । अब मुझसे आप जो कह रहे हैं, उससे अधिक पीडाजनक मेरे लिए और क्या हो सकता हैं ?
तेल से सिक्त शत्रु-नारियो की आँखो के काजल को पोछनेवाले तथा शत्रुहीन

२१८ | कम्ब रामायण

होने से कोश में रखे हुए भाले से युक्त हे प्रभो ! आप पूर्वजों से प्राप्त अपना समस्त स्वत्व खोकर जा रहे हैं; तो क्या हमें भी छोड़ जाना चाहते हैं ?

लक्ष्मण के यह कहने पर रामचन्द्र कुछ नहीं कह सके और पर्वत-सदृश कंधोंवाले लक्ष्मण का वदन देखते रहे। लक्ष्मण के मन की पीडा को जानकर अपने सुगन्धित विशाल कमल जैसे नयनों से अश्रुधार बहाते हुए खड़े रहे।

उसी समय प्रेम-भरे तथा पवित्र तप से संपन्न मुनिवर (वसिष्ठ) राजसभा से वहाँ आये। दोनो मनोहर राजकुमारों ने उनके प्रति सिर झुकाया। (उन्हें देखकर) मुनिवर दुःखनामक महासमुद्र में डूब गये।

तत्त्वज्ञान से संपन्न मुनिवर ने उन (राम-लक्ष्मण) के वदन को तथा उनके मन को भी देखा। उनकी कटि में बंधे वल्कल की शोभा को देखा। फिर क्या कहना है ! उस समय उत्पन्न मनोवेदना के कारण मुनिवर अपने को भी भूल गये।

जो दिन (रामचन्द्र के) राजतिलक के उत्सव के लिए निश्चित हुआ था; उस सुखदायक दिन में राम ने, दुःखदायक विधि के प्रभाव से; वल्कल धारण किया। स्वयं चतुर्मुख ही नियति को बदलने का प्रयत्न क्यों न करे, तो भी नियति का विधान आकर घेर ही लेता है। ऐसी नियति को कौन मिटा सकता है ?

यह उत्पात, केवल कठोर कैकेयी के कारण ही उत्पन्न नहीं हुआ है। यह पुण्य-स्वरूप (राम) ऐसा दुःख पाने के योग्य भी नहीं हैं; तो किस कारण से यह सब संघटित हुआ ? यह किसका षड्यन्त्र है ? यह सब भविष्य में प्रकट होगा। इस प्रकार वसिष्ठ ने सोचा।

कोदण्ड तथा विशाल कमल-सदृश नयनों से शोभित वीर (राम) के समीप आकर वसिष्ठ ने कहा—हे वत्स ! तुम यहाँ से जाकर उन्नत पर्वतों से युक्त वन को देखोगे। किन्तु, अति विशाल सेना से युक्त चक्रवर्त्ती को जीवित नहीं पाओगे।

तब आदिशेष के पर्यंक से हटकर पृथ्वी पर अवतीर्ण (श्रीराम) ने वसिष्ठ से कहा—चक्रवर्त्ती की आज्ञा को शिर पर धारण कर उसका पालन करना मेरा कर्त्तव्य है। उनके शोक को दूर करना आपका कर्त्तव्य है। यही न्याय है ।

तब वसिष्ठ ने कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा नहीं दी है कि तुम 'कंटकपूर्ण अरण्य में जाओ। हाँ, शत्रुओं के शर के समान वचन कहनेवाली क्रूर कैकेयी की ओर से पैनाये गये भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती ने उनको वर दिये हैं।

उज्ज्वल धर्म की रक्षा के लिए उत्पन्न राम ने कहा—मेरे पिता ने मेरी माता को वर दिये। मेरी माता ने मुझे (वन जाने की) आज्ञा दी। मैंने वह आज्ञा शिरोधार्य की। सबके साक्षी बने हुए आप क्या हमको रोकने का विचार कर रहे हैं ?

तब वसिष्ठ अवाक् होकर, धरती पर अश्रु बहाते हुए खड़े रहे। पर्वताकार कंधों-वाले राम, मुनिवर को प्रणाम करके चक्रवर्त्ती के स्वर्णमय प्राचीरों से युक्त प्रासाद के द्वार पर जा पहुँचे।

वल्कलों से शोभायमान, लक्ष्मण से अनुसृत, प्रभूत आनन्द से भरित और कमल से

अयोध्याकाण्ड २१६

भी अधिक सुन्दर वदन से युक्त राम के निश्चय को जानकर उस नगर के लोगो को जो दुःख हुआ, अब हम उसका वर्णन किसी प्रकार से करेगे ।

ब्राह्मणो, अपूर्व तपस्या से युक्त मुनियो, राजाओ तथा उस देश के निवासियो के हृदय की दशा के बारे मे हम क्या कहे ? (इस घटना से) देवता लोग भी इतने दुःखी हुए कि उन्होने भविष्य मे उत्पन्न होनेवाले सुख को भी त्याग दिया ।

देव-रमणियो की समता करनेवाली नारियाँ ( वल्कलधारी ) राम को देखकर अपने करो से अपनी मदभरी आँखो पर इस प्रकार प्रहार करने लगी, जैसे कमलपुष्प पर मँडरानेवाले मत्त भ्रमरो को घने पल्लवो से उड़ा रही हो ।

कुछ लोग ( राम के प्रति ) अछीण अनुराग के कारण राम के पिता के पूर्व ही स्वर्ग मे जा पहुँचे। क्या इसका कारण उनका द्विविध कर्म-बन्धन को तोड़ देना था ? या उनके व्याकुल प्राणो का लौटकर नही आना था ?

कुछ गिर पड़े। कुछ सिसक-सिसककर रो उठे। कुछ अपनी आँखो से बहनेवाले अश्रुओ से ढक गये ! कुछ इस प्रकार कातर हो उठे, मानो उनके केशो में आग लग गई हो ।

कुछ लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे, जैसे प्रभूत संपत्ति को खो बैठे हो और जो इक्षुरस-समान ( मधुर ) वचनवाले थे, आँखो से आँसू न बहाते हुए लौह-सदृश हृदयो के साथ स्तम्भ हो खड़े रहे। कदाचित् अपार दुःख से उनकी बुद्धि भ्रात हो गई थी ।

कुछ लोगो के शरीर से निकले हुए प्राण एक दशा में स्थिर नही रहे और ऐसे हो गये कि अभी चले, अभी चले। कुछ के प्राण बाहर निकलकर पुनः शरीर में लौट आये। कुछ लोगो की आँखो से, अश्रुओं के सूख जाने से, रक्त ऐसे बहने लगा, जैसे घाव से बहता है।

दो सूँडोवाले हाथी-जैसे ( भुजाओवाले ) अनेक वीरो ने अपने बड़े करवाल से अपने शिर को काट डाला और एक हाथ में ( अपना शिर ) रखकर उसे उछालने लगे और कुछ वीरो ने अपने कमल-नेत्रो को कटार से भोककर निकाल दिया ।

उनके ( स्त्रियों के ) आभरण बिखर पड़े। आभरणो के रत्न बिखर पड़े। पुष्पहार-जैसी मेखलाएँ बिखर गई । रमणियो के उज्ज्वल मंदहास अदृश्य हो गये। उनके सुन्दर वदन ( जो पहले कभी चन्द्रमा से परास्त नही होते थे, अब ) चन्द्रमा से परास्त हो गये ।

चक्रवर्त्ती की पवित्र पातिव्रत्यवाली साठ सहस्र पत्नियाँ अश्रु बहाती हुई राम के पीछे-पीछे चली ओर अपने मुँह खोलकर वीची-भरे समुद्र के समान शब्द करती हुई रो पड़ीं।

वे स्त्रियाँ, जिनके राम के अतिरिक्त अन्य कोई पुत्र नही था, इस प्रकार ( भूमि पर ) गिरकर रोती थी, जैसे मयूर, कोकिल और हस पंखो से हीन होकर धरती पर आ गिरे हो ।

उन स्त्रियो की अमृत से भी अधिक मधुर वाणी, अविराम रूप में निःश्वास भरते हुए रोते रहने के कारण, वंशी तथा तन्त्री से युक्त मधुर नादवाले याक्-वाद्य से हार गई ।

अहो ! क्या ( राम के ) जाने योग्य स्थान अरण्य है ! कहकर वे स्त्रियाँ विलाप कर रही थी। उनके वदनो से विशाल चहार-दिवारी से युक्त प्रासाद एक

२२० | कंब रामायण

ऐसे सरोवर के समान लगता था, जिसमे रक्त कुवलय दिन मे ही विकसित हो रहे हो ।

उनके नेत्रों से उत्पन्न अश्रु की नदियाँ, उनके वक्ष पर के प्रभूत कुंकुम-लेप और चंदनरस-रूपी कीचड़ से मिलकर मुक्ताहार को वहाती हुई, घने स्तन-रूपी पर्वतो को पार कर गईं और मेखला-युक्त कटि-तट रूपी समुद्र मे जा पहुँची ।

उद्यानो से पूर्ण कोशल देश के प्रभु (दशरथ) की पत्नियो को, उनके कमल-सदृश उज्ज्वल मुखो को आज सूर्य ने भी देखा । स्वर्ग मे रहनेवाला देवेंद्र ही क्यो न हो, जब विपदा उत्पन्न होती है, तब उसे क्या नही भोगना पड़ता है ?—(अर्थात्, असूर्यम्पश्या कही जानेवाली स्त्रियाँ भी राम के वन-गमन का समाचार सुनकर बाहर निकल आईं ।)

माताएँ, वधुजन, आश्रित जन, दूर की रहनेवाली, समीप की रहनेवाली, सब प्रकार की स्त्रियाँ प्रज्वलित अग्नि मे गिरी-सी तड़प उठी और घरो के आँगनो मे और बाहर भर गईं ।

सब लोग चिल्ला उठे । (अयोध्या की जनता) सब दिशाओ मे उमड़े हुए समुद्र के समान बड़ी ध्वनि करती हुई राम को घेरकर चल पड़ी । पर्वत-समान कंधोवाले राम, उनको क्या कहना चाहिए—यह नही जानते हुए और उनको लौटाने का कोई उपाय भी नही देखते हुए अपने प्रासाद की ओर बढ़ चले ।

जो राम उन्नत किरीट को धारण करने के लिए, उत्तम रत्नो से जटिल रथ पर सवार होकर गये थे, वही अब वल्कल पहनकर पुनः उसी सुन्दर तथा विशाल वीथी मे (पैदल) चल रहे थे ।

उनको देखकर कुछ लोग कह रहे थे—अंजन-वर्ण इस प्रभु पर जो विपदा आ पड़ी है, उसे देखकर भी जो प्राण शरीर को छोड़कर नही जा रहे हैं, उन प्राणो तथा उन हृदयो से बढ़कर कठोर वस्तु का हम अनुमान तक नही कर सकते । सचमुच मनुष्य का स्वार्थ विष से भी अधिक क्रूर होता है ।

कुछ लोग कह रहे थे—हम इस प्रतीक्षा में वीथी मे खडे थे कि रामचन्द्र राज-तिलक धारण करके इस मार्ग से लौटेगे, किन्तु अब हम उन्हें धूप से भरी धरती पर यो चलते हुए देख रहे हैं । इस देश मे, जहाँ एक स्त्री इस प्रकार का क्रूर कार्य करती है, नेत्रवान् होकर जन्म लेना ही पाप है ।

कुछ लोग कह रहे थे—क्या यह उचित है कि सारे ससार को अपना बनाने की शक्ति रखनेवाला, ज्येष्ठ पुत्र होकर उत्पन्न होनेवाला, यह राम, व्याघ्रो के निवासभूत अरण्य मे निवास करने के लिए जायें और यो उसे जाते हुए देखकर भी हम चुप रहे ? अहो ! हमारा प्रेम भी अद्भुत सुन्दर है !

कुछ लोग कह रहे थे—क्षत्रिय-कुल को मिटानेवाले परशुराम के बल को भग करनेवाले इस घनश्याम राम ने शक्तिहीन तथा विवेक-भ्रष्ट हुए चक्रवर्ती को देखकर यह नही कहा कि आप हित को छोड़कर धर्म का नाश क्यो करना चाहते हैं ? अतः, यह राम भी इस पृथ्वी के शासन से हटानेवाली उस कैकेयी के ही समान है ।

कुछ लोग कह रहे थे—अपनी सुन्दर कटि मे वल्कल पहने, बड़े दुःख मे अभिभूत

अयोध्याकाण्ड २२१

होकर राम के पीछे-पीछे चलनेवाला दो पुत्रों की जननी (सुमित्रा) का यह पुत्र (लक्ष्मण) ही इस नगर-भर में राम का अनन्य बन्धु है ।

कुछ लोग यह कहते हुए कि पत्थर से भी अधिक कठोर अपने हृदयो को हम फरसे से काट देंगे—दौड़ जाते थे और मार्ग-मध्य अपने अश्रुओं के कारण उत्पन्न कीचड़ में फिसलकर गिर पड़ते थे।

कुछ लोग अपने शरीर पर से रत्नाभरणों को उतारकर फेंक देते थे। विद्युत्-समान कांति से युक्त अपने शरीर पर से रंग-बिरंगे वस्त्रों को फाड़कर फेंक देते थे और छोटे फटे वस्त्र पहन लेते थे।

कुछ लोग कह रहे थे—संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अनेक पुत्रों के होने पर भी, यदि उनका कोई एक पुत्र किसी अवयव से हीन होकर उत्पन्न होता है, तो अपने प्राण छोड़ देते हैं। किन्तु इन चक्रवर्ती का, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र को अरण्य में भेजकर अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं, उनका मन लोहे से भी अधिक कठोर है।

कुछ लोग कह रहे थे—यह रामचन्द्र मेघ के अतिरिक्त अन्य किसी उपमान से हीन श्रेष्ठ करुणा की मूर्त्ति है, इसके अतिरिक्त इसमें दूसरी कोई कमी नहीं है। यदि नगर की सारी प्रजा इसके साथ ही अरण्य में जा बसे, तब भी क्या कैकेयी अपने प्रिय पुत्र के साथ इस पृथ्वी का शासन करती रहेगी ?

कुछ-कुछ झुकी हुई सूक्ष्म कटि को दुखानेवाले स्तन-भार से युक्त स्त्रियाँ रोदन की ध्वनि के साथ, घने 'कान्तल' पुष्प-सदृश अपने अरुण करों को सिर पर रखे हुए, लताओं के समान एक ओर खड़ी रहीं।

चन्द्र को छूनेवाले शिखरों से युक्त प्रासादों की ऊपरी मंजिलों में खड़ी हुई स्त्रियों की आँखों से निरंतर बहनेवाले आँसू उनके स्तनों को भिंगो रहे थे। वे स्त्रियाँ पर्वत-शिखरों पर स्थित मयूरों के समान दुःखी हो रही थीं।

मेघ-सदृश अगरु-धूम से भरे सौधों के विशाल वातायनों से (राम को) देखनेवाली गद्गद स्वरवाली स्त्रियों की अंजन-लगी आँखों से अश्रुजल निर्झर के समान बह रहा था। वे स्त्रियाँ पिंजरस्थ शुक के समान रो रही थीं।

सौधों की ऊपरी मंजिलों से देखनेवाले लोगों की आँखों से बड़ी-बड़ी अश्रुधाराएँ निकलकर सौधों के बाहर बह रही थीं। अतः, ऐसा लगता था, मानो वे सौध भी चक्रवर्त्ती-कुमार (राम) के प्रति दुःखी होकर रो रहे हैं।

स्त्रियाँ अपने शिशुओं को भूल गईं। पुत्र अपनी माता को भूल गये। इस प्रकार, उस नगर के लोग व्याकुल होकर बड़ी पीड़ा से प्रजा-रहित-से होकर बड़े शब्द के साथ रो रहे थे।

'कामर' (नामक) राग के समान मृदु स्वरवाली सब सुन्दरियाँ वीथी में एक हो गईं, जिससे धवल प्रासाद, सुन्दर दृश्य तथा सुगंधित केशोंवाली लक्ष्मी से विहीन कमल के समान लगते थे।

शर-विद्ध हरिणियों विकल हो रही हों—इस प्रकार...

२२२

कव रामायण

हुई उत्तम कर्णाभरणो से युक्त सुदरियाँ घन-पटल के समान केशपाशो को धरती पर फैलाये अपने आभरण बिखेरते हुए झुण्डो में जा रही थी।

पर्वत-समान सौधो की पताकाएँ संकुचित हो गई। उत्तम भेरियो के शब्द थम गये। विविध वाद्यो के नाद दब गये। प्रासादो के प्राचीरो से बाहर की वीथियो की धूल धरती में चारों ओर बहनेवाली अश्रुधारा से दब गई।

रसोईघर धूम-हीन हो गये। ऊँचे सौध अगरु-धूम से विहीन हो गये। शुको के पात्र दूध से विहीन हो गये और उत्तम रत्न-जटित पालने और उनमे सोनेवाले शिशु, स्त्रियो के आगमन से विहीन हो गये—(अर्थात्, पालनों में स्थित बच्चो के रोने पर भी माताएँ नही आती थी।)

सबके मुख प्राण-हीन जैसे कान्ति-रहित हो गये। मेघ-समूह वर्षा-रहित हो गये। घोडे, स्वच्छ जल से युक्त अश्व-शालाओ को छोड़कर चले गये। मत्तगज, पुष्पो के मधु को पीनेवाले भ्रमरो के जैसे, अपने आनन्द को छोड़कर चले गये।

छत्र छाया नही कर रहे थे। दीर्घ नयनोवाली रमणियो के केश पुष्पो से शोभित नही हो रहे थे। पुरुषो के पाट-युगल वीर-वलयो से युक्त नही थे। क्रोधी मन्मथ के बाण भी उष्णता-विहीन हो गये। हस अपनी इसिनी को छोड़कर चल पड़े।

वीथियाँ, अश्वो की किंकिणियो की ध्वनि, भेरियो के चर्म-आवरण की ध्वनि और मेघ-समान शब्द करनेवाले रथों की ध्वनि से रहित होकर स्वच्छ वीचियो से युक्त जल की ध्वनि से विहीन समुद्र के समान लगने लगी।

गजवीथियो मे रोदन की ध्वनियो को छोड़कर वाद्यो की ध्वनियाँ नहीं होती थी। वीणा-तन्त्रियो के क्रमबद्ध स्वरो की ध्वनि नही होती थी। अनिमेष नयनोवाले देवो के उत्सवो मे उत्पन्न होनेवाली ध्वनि भी नही हो रही थी।

स्पष्ट शब्दवाले नूपुरो से प्रतिध्वनित सौध, अब शब्द-रहित थे। मेखलाओ के सबध मे भी यही बात थी। जलचर पक्षी नही बोल रहे थे। उद्यान मे भी ऐसी ही बात थी। पुष्पों में भ्रमर शब्द नहीं कर रहे थे। हाथी भी ऐसे ही हो गये।

खेत, जल को भूल गये—(अर्थात्, किसान खेतो को सींचने की बात भूल गये।) लाल अधरवाली सुन्दरीयों के कर, नवजात शिशुओ को भूल गये। प्रज्वलित होमाग्नियाँ, घृत को भूल गईं—(अर्थात्, ब्राह्मण उनमे घृत का होम करना भूल गये।) आत्मज्ञानी आत्मतत्त्व को भूल गये। बटू, शब्द को भूल गये—(अर्थात्, वेदो का वाचन बन्द हो गया)।

झुण्डों मे नृत्य करनेवाले अब रो पड़े। अमृत-समान मधुर सप्त स्वरो मे गान करनेवाले अब रो पड़े। अपने प्रियतमो के साथ प्रणय-कलह मे कुपित तथा पुष्पमालाओ से ग्रथित सुन्दरीयाँ अब रो पड़ीं। अपने प्रियतमो से मिलकर (आनन्दित) रहनेवाली सुन्दरीयाँ भी अब रो पड़ीं।

हाथी जलाशयों के पास जाकर अपनी सूँड, जल पीने के लिए नहीं बढ़ाते थे। घोड़े मुँह मे घास नहीं लेते थे। पक्षी अपने बच्चो के लिए आहार नही लाते थे। गायें अपने बछड़ों को दूध नहीं पिलाती थी और उनके थन व्याकुलता से द्रवित हो रहे थे।

अयोध्याकाण्ड २२३

पुरुषों के वक्ष पर युवतियों के स्तन-रूपी नारिकेल अंचित नहीं हो रहे थे—(अर्थात्, वे आलिंगन नहीं कर रहे थे)। पुष्प-समुदाय, चंदन-लेप करनेवाले पुरुषों के केशों को तथा उनकी युवतियों के केशों को अलंकृत नहीं कर रहे थे।

बड़े गज, मुखपट्ट और उत्तम आभरणों से घृणा करते थे। सौध-समुदाय, शिखरों में पहनने योग्य सुन्दर अलंकारों से घृणा करते थे। ध्वजाएँ, आकर्षक सौंदर्य से रहित हो गई थीं। स्वर्णमय मनोहर प्राचीर, मृदुगतिवाले कबूतरों तथा कबूतरियों की सुन्दरता से रहित हो गये।

सुख-दुःख को समान रूप से देखनेवाले योगी भी अधिक पीड़ा से दुःखी हुए। फिर, उन साधारण संसारी व्यक्तियों के बारे में क्या कहा जाय, जो दुःख के समय, अपने पाप का फल मानकर व्याकुल होते हैं और सुख प्राप्त होने पर पुण्य का फल मानकर आनंदित होते हैं।

वह अयोध्यानागर, (प्राणियों के) शरीरों से निःश्वास के साथ बाहर न निकलनेवाले प्राणों के व्याकुल होने से, मनोहर शोभा के मिट जाने से, अत्यधिक पीड़ा कारक दुःख के बढ़ने से तथा न मिटनेवाली पंचेंद्रियों के अस्त-व्यस्त होने से, उन (दशरथ) के समान ही लगते थे, जो (राम के विरह में) अपने प्राण छोड़ रहे थे।

इस प्रकार, जब उस नगर के लोग अत्यन्त कातर होकर पीड़ित हो रहे थे, कहीं झुण्ड बाँधकर खड़े थे और कहीं बुद्धिभ्रष्ट हो रोते हुए पीछे-पीछे चल रहे थे, तब राम, जो सचरणमान विविध प्राणियों की एक आत्मा के समान थे, उज्ज्वल आभरण-भूषित स्तनवती जानकी के आवास में जा पहुँचे।

ज्यों ही सीता ने वल्कलधारी राम को एवं उनके पाश्र्वों में माताओं, मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओं को रोते हुए तथा धूलि-भरे शरीरों के साथ आते हुए देखा, त्यों ही वह चित्र-प्रतिमा जैसी सुन्दरी, स्तब्ध होकर उठ खड़ी हो गई।

इस प्रकार उठकर खड़ी होनेवाली उन सीता का आलिंगन करके उनकी सासों ने उन्हें अंजन-अंचित नयनों के नूतन नीर से नहलाया। तब जानकी, जो उस परिस्थिति का कारण नहीं जानती थीं, व्याकुल चित्त के साथ अपनी विशाल आँखों से राम को देखकर अश्रु-धारा बहाती हुई—

और विद्युत् के समान काँपती हुई बोलीं—हे स्वर्णवीर-वलयधारी ! इस दुःख का कारण क्या है ? क्या कीर्तिमान् चक्रवर्ती को कुछ विपदा हुई है ? क्या हुआ ? बताइए।

राम ने सीता से कहा—मेरा उपमा-रहित भाई (भरत) राज्य करेगा। अपने आश्रयभूत गुरुजनों की आज्ञा से, मैं मेघों से भरित घने वन में जाऊँगा और उस वन को देखकर फिर लौट आऊँगा। तुम दुःखी मत होओ।

'पति राज्य के अधिकार से वंचित हो गये और वन-गमन करनेवाले हैं'—इस विचार से सीता दुःखी नहीं हुईं। किन्तु 'तुम दुःखी मत होओ, मैं जा रहा हूँ'—राम का यह कठोर वचन ही (सीता को) अत्यन्त पीड़ित कर रहा था।

जब विष्णु भगवान् 'धर्म मिट जायगा, उसकी रक्षा करनी है।'—इस विचार से क्षीरसागर में अपने पर्यंक को छोड़कर अयोध्या में अवतीर्ण हुए थे, तब लक्ष्मी देवी भी

२२४ कंब रामायण

(सीता के रूप मे) अवतीर्ण होकर उनसे वियुक्त रहने लगी थी; ऐसी वह (सीता) क्या इस वचन को सह सकती कि राम उसको छोड़कर चले जायेंगे ?

राम की उक्ति को सोच-सोचकर सीता ऐसी व्याकुल खड़ी रही, जैसे उसके प्राण ही निकल रहे हो। फिर, यह बोली कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करने का निश्चय अत्यन्त उचित ही है, किन्तु मुझे किस कारण से (अयोध्या मे ही) रहने को कह रहे हैं ?

तब राम ने कहा—शीतल अलक्तक-रस से अलंकृत तुम्हारे मृदुल चरण इस योग्य नहीं हैं कि राक्षस जैसे लगनेवाले पर्वतो मे, पिघली हुई लाख जैसे उष्ण पत्थरों पर तुम चलो।

यह सुनकर सीता ने उत्तर दिया—आप मेरे प्रति कृपाहीन और प्रेमहीन होकर मुझे छोड़कर जाने की बात कह रहे हैं, (आप के विरह में उत्पन्न होनेवाले) इस ताप के सामने प्रलयकालीन सूर्य का ताप भी कुछ नहीं होगा। वह विशाल अरण्य क्या आपके विरह से भी अधिक तापजनक है ?

प्रभु ने सीता के वचनो को सुना और साथ ही उन (सीता) के मन को भी पहचाना, वे यह भी नहीं चाहते थे कि सीता अपने नेत्रों से अश्रु-समुद्र को प्रवाहित करती रहे। इसलिए, वे सोचते खड़े रहे कि अब मेरा कर्तव्य क्या है।

उस समय, सीता अपने विशाल प्रासाद के भीतर गई। अपने योग्य वल्कल-वसन धारण करके विचार-मग्न प्रभु के निकट आकर उनके तालवृक्ष जैसे दीर्घ कर को पकड़कर खड़ी हो गई।

सीता का वह कार्य देखकर सब लोग धरती पर गिर पड़े। फिर भी मर नही गये। जब आयु के दिन अभी शेष थे, तब वे कैसे मर जाते ? जिनकी आयु समाप्त नहीं होती, वे युगान्त के समय मे भी जीवित ही रहते हैं।

सीता को देखकर, माताएँ, बहिनें, साथिनें, सखियाँ—सब जैसे अग्नि की ज्वाला मे गिर पड़ीं। तब कमलनयन रामचंद्र सीता के प्रति कहने लगे—

कुंद और मुक्ता को परास्त करनेवाले उज्ज्वल दाँतो से युक्त, हे देवि ! वन-गमन से होनेवाले कष्टो को तुम नहीं जानती हो। मेरे साथ चलने को सन्नद्ध हो गई हो, अतः तुम मेरे लिए अपार दुःख उत्पन्न कर रही हो।

क्षत्रिय-वंश के श्रेष्ठ राम के यह कहने पर कोकिल को परास्त करनेवाली मधुर वाणी से युक्त सीता, कोप के साथ बोली—आपको मेरे कारण ही संकट उत्पन्न होता है, कदाचित् मुझे छोड़कर जाने मे आपको सुख ही सुख है।

तब उदार गुणवाले राम कुछ उत्तर नही दे सके और सीता को साथ लेकर उस वीथी में, जहाँ नर-नारी, अश्रु-प्रवाह के कारण खेत के जैसे कीचड़ से भरी धरती पर पडे थे, चलकर बड़ी कठिनाई से आगे बढ़े।

राम आगे-आगे जा रहे थे, उनके साथ सीता वल्कल पहने पीछे-पीछे जा रही थी और उनके पीछे दृढ़ धनुर्धारी लक्ष्मण जा रहे थे। उस दृश्य को देखकर, उस नगर के लोगो को जो दुःख हुआ, उसका वर्णन करना संभव नही है।

उस समय कोई भी अमंगल उत्पन्न करने के कारण रोये नही। सब व्याकुल चित्त

अयोध्याकाण्ड | २२५

के साथ यह सोचकर कि राम के पहले ही हम वन में पहुँच जायेंगे, कोलाहल-ध्वनि बढ़ाते हुए, आगे बढ़ चले।

विजयमाला से भूषित भाले को धारण करनेवाले रामचंद्र अपने पिता के सौध-द्वार पर पहुँचे। वहाँ अपनी माताओं के प्रति कर जोड़कर विनती की कि आप लोग यही रहकर चक्रवर्त्ती को सान्त्वना दें। यह सुनकर माताएँ मूर्च्छित होकर गिर गईं।

सञ्ज्ञा लौटने पर उन्होंने गद्गद कंठ से पुत्र (राम) को आशीष दिये। पुत्र-वधू की प्रशंसा की। कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) की प्रस्तुति की और देवताओ से प्रार्थना की कि हे कुल-देवताओ! इनकी रक्षा करना।

उन माताओं के बड़ी कठिनाई से हटने पर, राम ने मुनिवर वसिष्ठ को प्रणाम किया। फिर, स्वयं अपने प्राण-समान भाई और सीता के साथ एक रथ पर आरूढ होकर चल पड़े। (१-२४०)


अध्याय ५

तैल-निमज्जन पटल

विशाल सेना से युक्त चक्रवर्त्ती से कभी वियुक्त न होनेवाली उनकी पत्नियाँ (राम के साथ न जाकर) रुक गईं। उस दिव्य नगर में स्थित चित्र भी प्राणहीन होने के कारण (जाने से) रह गये। इनको छोड़कर, पिता की आज्ञा से (वन) जानेवाले राम के साथ न जानेवाला वहाँ कोई नहीं रहा।

वह स्वर्णमय रथ, उसके चारो ओर उष्ण अश्रु-जल के प्रवाहित होने से, धीरे-धीरे चल रहा था और उस दिव्य मत्स्य (विष्णु के मत्स्यावतार) के समान लगता था, जिसने सप्त लोकों को एक करनेवाले महान् समुद्र के जल में संचरण करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया था।

सूर्य मानों राम को वन जाते हुए नहीं देखना चाहता हो, (इसलिए) वह पर्वत के मध्य जा छिपने के लिए त्वरित गति से बढ़ चला। तब गायें और भैंसे अपने गोष्ठों में आकर प्रविष्ट हुईं। धूप मिट गई और नक्षत्र चमकने लगे।

कमलभव ब्रह्मा के द्वारा चन्द्र के खंडों को लेकर निर्मित उज्ज्वल ललाटवाली सुन्दरियों के वदन के समान कमल-पुष्पों के समूह, अश्रुजल-रूपी मद्य के प्रवाहित होने से शोभाहीन होकर मुँह झुकाये खड़े रहे।

सन्ध्याकाल में सूर्य के अस्तंगत होने से आकाश-प्रदेश, मंथरा के वचन-रूपी विष से विकृत हुए कैकेयी के मन के समान ही, अपनी अरुणिमा को (प्रकाश को) छोड़कर अन्धकार से भर गया।

२२६कम्ब रामायण

सर्वत्र नक्षत्रों से प्रकाशमान नील वर्ण आकाश, इन्द्र की देह के समान लगता था; (देह) मुनिवर (गौतम) के द्वारा दुःख के साथ दिये गये शाप के प्रभाव से अनेक अनिमेष नयनों से युक्त हो गई थी।

राम उस अयोध्यानगर को छोड़कर शीघ्र गति से दो योजन दूर पारकर गये और सुगन्ध-भरे एक उद्यान में पहुँचे। वहाँ उतरकर अपने मित्र-समान अनेक मुनियों के साथ विश्राम करने लगे; तब—

राम का विरह न सहकर उनके साथ आई हुई जनता एक योजन-पर्यंत प्रदेश को घेरकर पक्षियों से भरे उस उपवन के बाहर इस प्रकार फैली पड़ी रही कि तिल रखने के लिए भी वहाँ स्थान नहीं रहा।

वे लोग मुँह में रखकर न कुछ खा रहे थे, न सो रहे थे, पर मन में कुढ़कर सिसक-सिसककर रो रहे थे। उत्तम रत्न जहाँ बिखरे पड़े थे, ऐसे नदी-तट पर सैकत-राशियों और हरियाली पर वे (विकल होकर) लोट रहे थे।

जलाशय में विकसित कमल-पुष्प के मध्य जैसे सुगंध-भरे सद्योविकसित नील उत्पल खिले हों, वैसे नेत्रों से तथा कस्तूरी-गंध से युक्त केशों से शोभायमान सुन्दरियाँ, धूम से आवृत दूध के फेन-जैसे वस्त्रों को ही शय्या बनाकर सो गईं।

कमल-कोरक-समान स्तनों, तीक्ष्ण शर-समान नेत्रों तथा इक्षु रस-समान मधुर वाणी से युक्त कन्याएँ, दिन-भर की बड़ी थकावट के कारण, नारिकेल-फल के जैसे स्तनों से युक्त अपनी धाइयों की गोद में ही पड़ी-पड़ी सो गईं।

(कभी) मांस से रहित न होनेवाले (अर्थात्, सदा शत्रुओं के मांस से युक्त) 'कुंत' नामक शस्त्र धारण करनेवाले वीर युवक, सिकता-राशियों से भरे प्रदेश में, आम के टिकोरे के समान नेत्रोंवाली अपनी यौवनवती पत्नियों के साथ, हथसार में बँधे हुए छोटी आँखोंवाले मत्तगज के समान सोये पड़े थे।

कुछ युवतियाँ जो सद्गुणों तथा (पातिव्रत्य के) तप से संपन्न थीं और अपने पति के सुखों के दर्शन तथा उनकी करुणा से तृप्त रहती थीं, अब अत्यधिक दुःख के कारण, जैसे नृत्यशील मयूर निष्प्राण हो पड़े हों, उसी प्रकार सो रही थीं और उनके शिशु उनके स्तन-चूचुकों पर अपने करों को फेरते हुए दुग्ध-पान कर रहे थे।

कुछ स्त्रियाँ माधवीलता के कुंजों में, नक्षत्र-भरे आकाश के समान उज्ज्वल, नील-रत्नमय सैकत वेदी पर, मयूरों के विशाल झुण्ड के समान माँड़ी पड़ी थीं। कुछ स्त्रियाँ क्रमुक-वन के मध्य स्थित जलाशय के निकटस्थ सैकत प्रदेश पर हंसिनियों की श्रेणी के समान पड़ी थीं।

कुछ स्त्रियाँ चंपक-पुष्पों के सुगन्धित उद्यानों में इस प्रकार शिथिल पड़ी थीं, जैसे तरुण लताएँ छिन्न होकर मुरझाई पड़ी हों और कुछ स्त्रियाँ कंचुकी में बँधे स्तनों के साथ सिकता-राशियों पर फैली हुई प्रवाल-लताओं के समान प्रज्ञाहीन सो रही थीं।

कुछ स्त्रियाँ इस प्रकार सो रही थीं कि उनके पीन स्तनों पर धूल लग गई थी, जैसे कुंकुम-पुष्पों से भरे पर्वत पर ओस छाई हुई हो। कुछ स्त्रियाँ अपने हाथ का सिरहाना

अयोध्याकाण्ड २२७

बनाकर यो सो रही थी कि उनके वदन कांतिहीन होकर, कुम्हलाकर, मुकुलित हुए कमल के समान लगते थे ।

कुछ, पथ-गमन के श्रम से चूर होकर, फैले हुए पत्थरो पर पड़ी सो रही थी । कुछ नीचे पडे पत्तो की राशि पर बेसुध पड़ी सो रही थी । कुछ, अपने वस्त्र का एकभाग मात्र पहनकर शेष भाग को विछाकर उस पर सो रही थी । कुछ पल्लवों को विछाकर उनपर शिथिल हो पड़ी थी ।

जब सब लोग इस प्रकार पडे सो रहे थे, तब ( वैवस्वत ) मनु के वंश मे उत्पन्न राम ने सुमंत्र को अपने निकट बुलाया ओर उससे कहा—तुम दोषहीन हो और सब गुणों के आगार हो । तुम्हे एक काम करना है । सुनो—

मुझपर गाढ प्रेम रखनेवालों को लौटाकर भेजना कठिन है । इनको यहाँ से भेजे बिना मेरा यहाँ से चला जाना भी उचित नही है । अतः, हे पितृ-तुल्य ! तुम अभी इस रथ को लौटाकर ले चलो । रथ के चिह्न को देखकर सब लोग यह समझेंगे कि मै अयोध्या को लौट गया हूँ । इससे सारी जनता नगर को वापस चली जायगी । तुमसे यही मेरी प्रार्थना है ।

सद्गुणों से पूर्ण राम के यों कहने पर रथ चलाने मे चतुर सुमंत्र ने कहा—इस स्थान में तुम्हे छोड़कर और अपने प्यारे प्राणों को रखकर मुझे उस अयोध्यानगर में, वहाँ की दुःखपूर्ण दशा को देखने के लिए जाना है। मै उस क्रूर माता और कठोर नृपति से भी अधिक कठोर हूँ ।

लोहे के समान हृदयवाला मै, वहाँ जाकर क्या कहूँगा ? क्या यह कहूँगा कि राम को, उनकी पत्नी तथा भाई के साथ पुष्पो से भरे उद्यान में जाने के लिए छोड़ आया हूँ ? या यह कहूँगा कि राम को साथ लेकर अयोध्या को लौट आया हूँ ?

क्या यह कहूँगा कि पुराना मित्र तथा दोषहीन आचरणवाला मै, माला के योग्य कोमल पुष्पो पर भी चलने मे अशक्त ( अर्थात्, अति सुकुमार ), कंचुक से बँधे स्तनोवाली सीता के साथ दोनो बलवान् कुमारो को कठोर धरती पर चलने के लिए उतारकर, स्वयं रथ पर लौटकर चला आया हूँ ?

क्या कठोर इन्द्रियो तथा शिला-जैसे मनवाला वंचक मै, टूटे हृदय तथा शिथिल गात्र से पीडित होनेवाले चक्रवर्त्ती के निकट दक्षिण दिशा के अधिपति यम के दूत के समान जाऊँ ? क्या मै तुमसे यह निवेदन कर सकता हूँ कि तुम अपनी सद्बुद्धि से कोई योग्य वचन मुझे बताओ ( जिसे मैं अयोध्या मे चक्रवर्त्ती को सुना सकूँ ) ।

हे प्रभु ! 'चारो दिशाओ के निवासी तथा नगर की प्रजा राम को समझा-बुझा-कर अयोध्या लौटा ले आयेगे'—यों कहकर चिंतित चक्रवर्ती को स्वस्थ किया गया था । अब क्या मैं कठोर यम-सदृश वचन से उनके प्राणो का हरण करूँगा ?

क्या मैं उनको यह सुनाऊँगा कि अग्नि मे यज्ञ करके, बड़ी कठिनाई से प्राप्त किये गये आपके सिंह-सदृश पुत्र, अरण्य मे चले गये हैं ? ठीक विचार करने पर जान पड़ता है कि चक्रवर्त्ती को इस कठोर वचन को सुनानेवाले मेरे जैसे व्यक्ति से तो वह कैकय-राजपुत्री ही अच्छी हैं ।

२२८ कंब रामायण

इस प्रकार अंतिम प्रार्थना करने पर भी सुमंत्र को वज्र का घोष ही (अर्थात्, मैं नहीं लौटूंगा) सुनाई पड़ा, जिससे अत्यंत व्याकुल होकर तड़पनेवाले सर्प के समान व्याकुल होकर सुमंत्र राम के चरणों को पकड़कर धरती पर लोट गया और विविध वचन कहकर रोने लगा।

तब उन राम ने, जो निग्रह करने योग्य इन्द्रियों तथा मन के लिए अगोचर, पर परिशुद्ध बुद्धि के लिए गोचर हैं, अपने विशाल हाथों से उठाकर उस सुमंत्र को गले लगा लिया और उसके अश्रुओं को पोंछकर पृथक् ले जाकर उससे कहा—

इस संसार में हमारा जन्म हुआ है। उस (जन्म) के साथ घटित होनेवाली सब बातों को, उचित बुद्धि से, सोचकर समझने की शक्ति तुम रखते हो। यह सोचकर कि विपदा उत्पन्न हुई है, क्या तुम असाधारण रूप से उत्पन्न होनेवाले अपयश को एवं धर्म के तत्त्व को भूल जाओगे?

श्रेष्ठ धर्म सब कार्यों से आगे रहकर यश को स्थिर बनाता है और मृत्यु के पश्चात् भी शाश्वत फल प्रदान करता है। ऐसे धर्म का आचरण करते समय, क्या यदि सुख हो, तो हम उसका आचरण करेंगे, पर यदि कष्ट हो, तो क्या उस (धर्म) को छोड़ देना उचित होगा?

शत्रुओं के उज्ज्वल शस्त्रों को वीरता के साथ अपने वक्ष पर सहन करना शूरता नहीं है। मृत्यु का भी सामना होने पर, अथवा सारी संपत्ति को खोने की आवश्यकता पड़ने पर भी, धर्म का परित्याग न करना ही शूरता है।

(शत्रुओं के) शरीर को भेदकर उसमें स्थित प्राणों के अपहारक भाले को धारण करनेवाले हे राम! यदि मैं वन-गमन से होनेवाले कष्टों का विचार करके नगर को लौट जाऊँगा, तो क्या वैवस्वत मनु का यह कुल, जिसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैली हुई है, धर्मच्युत नहीं कहलायेगा?

'आचरण के लिए दुस्साध्य सत्य का अनुसरण करनेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) ने अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज दिया—ऐसी'—प्रख्याति उन चक्रवर्त्ती के लिए एक तपस्या ही होगी और उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके वन जाना मेरे लिए भी तपस्या ही है। अतः, हे मेरे पितृ-तुल्य! तुम इससे दुःखी मत होओ।

(नगर में लौटकर) तुम पहले मुनिवर (वसिष्ठ) को नमस्कार करना और मेरे प्रणाम एवं मेरे वचनों को उन्हें सुनाना। उन मुनिवर से यह निवेदन करना कि वे स्वयं चक्रवर्त्ती के पास जाकर मेरा मनोभाव उनसे प्रकट करें।

मुनिवर के द्वारा ही मेरे भाई (भरत) को यह सन्देशा देना कि वह नीति-मार्ग पर दृढ़ रहकर वेदज्ञ ब्राह्मणों तथा स्वर्गलोकवासियों के लिए हितकारी कार्य करें तथा अपने आचरण से, मेरे वियोग में उत्पन्न सब लोगों के दुःख को दूर करे। फिर, रामचन्द्र ने सुमंत्र से कहा—

तुम (वसिष्ठ मुनिवर से) यह कहना कि इस समय मेरे मन को यह बात किंचित् भी पीड़ा नहीं दे रही है कि मेरी छोटी माता के कारण एक बड़ा दुःख मुझे उत्पन्न हुआ है।

अयोध्याकाण्ड २२६

अतः, मेरे प्रति उनकी जैसी कृपा है, वैसी ही कृपा उस (कैकेयी अथवा भरत) पर भी रखे।

तुम यहाँ से लौटकर महान् तपस्वी (वसिष्ठ) के साथ राजप्रासाद में जाओ और मेरे पिता के अपार दुःख को शांत करने का उपाय करो। उन चक्रवर्ती की कृपा मेरे उस भाई (भरत) पर भी बनी रहे, ऐसा उपाय करो—यही मेरी प्रार्थना है।

मुखपट्ट से भूषित, मदस्रावी हाथियों की सेना से युक्त चक्रवर्ती को वसिष्ठ के द्वारा मेरा यह सन्देश पहुँचा देना कि चौदह वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् मैं नगर को लौट आऊँगा और उनके चरणों को प्रणाम करूँगा। वे दुःखी न हों।

मेरी तीनों माताओं को क्रम के अनुसार मेरा प्रणाम पहुँचाना। फिर, चक्रवर्ती के दुःख को शांत करते हुए उनके निकट रहना—इस प्रकार राम ने, जो वेदों के लिए भी अज्ञेय हैं और अब वन में जाकर रहते हैं, सुमंत्र से कहा।

अनुपम महान् रथ को चलाने में समर्थ सुमंत्र ने, यह विचार कर कि दासता से विमुख होना एक सेवक का कर्त्तव्य नहीं है, राम के चरणों पर नत हुआ। फिर, यह सोचकर कि पूर्व कर्मों के कारण हमें दुःख भोगना पड़ता है, भाले-जैसे नेत्रवाली जानकी को नमस्कार करके उनकी ओर देखा।

तब सीता ने (सुमंत्र से) कहा—'चक्रवर्ती को तथा सासों को मेरा नमस्कार कहना। फिर, मेरी प्यारी बहिनों से कहना कि सोने के रंगवाली मेरी सारिका को और तोते को सावधानी से पाले।

सीता के वचन सुनकर, सारथि (वनवास से) अधीर न होनेवाली उन (सीता) के दुःख का विचार करके व्यथित हुआ, और यह कहता हुआ कि 'विपदा उत्पन्न होने पर उसे दूर करने में कौन समर्थ होता है और प्राण छोड़ना भी सुगम नहीं है'—पहले भीतर-ही-भीतर व्याकुल हुआ, फिर ऐसा रो पड़ा कि महावीर राम के समझाने पर भी वह शान्त नहीं हुआ।

सदा स्थिर रहनेवाले प्रेम से युक्त सुमंत्र, अपने दुःख से किंचित् शान्त-सा होकर राम को पुनः-पुनः नमस्कार करके उनसे विदा हुआ। फिर लक्ष्मण से उसने पूछा कि आपका क्या सन्देश है।

तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया—'जिन सत्यसंध ने, पहले मेरे भाई को राज्य देने का वचन देकर पुनः सारी संपत्ति को सुगन्धित केशोंवाली एक नारी को दे दिया, उनको चक्रवर्ती मानकर क्या अब भी कोई संदेश देना उचित होगा?

फिर भी, उन असत्यहीन चक्रवर्ती से, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र के वन में जाकर कंद-मूल खाते रहते समय, स्वयं राजोचित भोजन करते रहते हैं, यह कहना कि उनके शरीर में स्थित प्राण इस संसार को छोड़कर अभी तक स्वर्ग नहीं गये, अतएव मैं उनकी दृढ़ता की प्रशंसा करता हूँ।

उज्ज्वल करवालधारी राजा भरत से कहना—'मैं, राजा होने के अधिकारी मेरे-प्रभु (राम) का भाई (होने योग्य) नहीं हूँ (क्योंकि मैं अपने पिता से लड़कर उन्हें राज्य नहीं दिलवा सका)। राज्य का शासन करनेवाले उस भरत का भी भाई नहीं हूँ

२३०कंब रामायण

तथा उस शत्रुघ्न को भी अपना अनुज नहीं मानता हूँ। मैं केवल एकाकी ही जन्मा हूँ। मेरा बल किंचित् भी कम नहीं है।

इस समय आर्य (राम) ने अपने भाई को देखकर कहा—हे तात ! ऐसे अशोभनीय वचन कहना उचित नहीं। तब सारथि अपने मन में व्यथित होकर धरती पर गिरकर उनको प्रणाम करके रथ की ओर बढ़ा।

सुमन्त्र ने रथ-रूपी यन्त्र को ठीक किया। उसमें घोड़े जोते। सबकी दृष्टि में साफ दिखाई देनेवाले मार्ग से अपने रथ को लौटाकर ले चला। उसने निपुणता से रथ को ऐसे चलाया कि कोई भी व्यक्ति निद्रा से नहीं जग सका।

उस अर्धरात्रि में, प्रभु (राम) भी देवी का पातिव्रत्य, अपनी उदारता, कलंक-हीन कृपा, विवेक, सत्य, कार्य में निपुण अपने धनुष तथा अनुज (लक्ष्मण), इन सबको साथ लेकर चल पड़े।

तब दिव्य प्रकाश से युक्त चन्द्रमा ऐसे उदित हुआ, मानो मायावी जीवन व्यतीत करनेवाले राक्षसों का साथी बनकर उनके क्रूर कार्यों में सहायता देनेवाले तथा राम-लक्ष्मण के (वन-गमन में) विघ्न-सा बने हुए, अंजन सदृश अंधकार को भगाने के लिए आकाश ने अपने हाथ में दीपक ले लिया हो।

वह अनुपम शीतल चंद्रमा इस प्रकार प्रकाशित हुआ, जैसे उस धर्मदेवता का प्रसन्न मुख हो, जो उसके प्राणों का विनाश करनेवाले पाप को मिटाने में समर्थ, वज्र-सदृश धनुष से युक्त राम-लक्ष्मण को वन-गमन के लिए सहमत करनेवाले सुकृत का विचार करके बड़ी प्रसन्नता से उन (राम-लक्ष्मण) के दर्शनार्थ वहाँ आया हो।

ऊँचे बढ़े हुए बाँसों से युक्त उस वन में पैदल चलनेवाले राम की दुःख-दशा को देखकर, दुःखी होकर ही मानो रक्त-कमल सुकुलित हुए थे। कुवलय-पुष्प भी सर्प के सिर का रूप धारण कर पीड़ित हो झुके थे। अब दूसरे पुष्पों के बारे में कहने की आवश्यकता ही क्या है ?

चन्द्रमा अपनी चंद्रिका फैला रहा था, मानो इस विचार से कि धनुष जैसी भौंहो-वाली (सीता) के मृदुल चरणों को चलने में क्लेश न हो। उसने कानन में सफेद रूई बिछा दी हो। उस प्रकाश में अंजनपर्वत-सदृश सुन्दर पुरुष (राम) तथा वह कनिष्ठ भ्राता—जो ऐसा था, मानो प्रभु (राम) को उत्तम स्वर्ण के आवरण से आवृत्त कर रखा हो—धीरे-धीरे पग बढ़ाते हुए चले।

क्षीण कटि से पीन स्तनों का भार वहन करनेवाली, लक्ष्मी कहलानेवाली तथा घने केश-भार से युक्त सीता, जल के बुद्बुदों से भी अधिक मृदुल अपने छोटे चरणों को रखती हुई रामचन्द्र के पीछे-पीछे चली। क्या कलंक-रहित प्रेम से भी बढ़कर दृढ़ कोई वस्तु हो सकती है ?

सूर्य के उदयाचल पर आने के पूर्व, लक्ष्मी के पति (राम) दक्षिण दिशा में दो योजन दूर चले गये। अब उस सुमन्त्र के संबंध में कहेंगे, जो निर्भर-जैसे बहते नयन, आहत मन तथा अकेलापन साथ लिये तीव्रगामी अश्व-जुत रथ पर चला था।

अयोध्याकाण्ड २३१

पाँच घड़ी के अन्दर वह (सुमन्त्र) प्राचीरों से सुरक्षित अयोध्यानगर में आ पहुँचा और जाकर कुलगुरु (वसिष्ठ) के चरणों पर नत हुआ। वे मुनिवर भी सब वृत्तांत सुनकर व्यथित-चित्त हुए और भविष्य को जानकर बोले—हाय! चक्रवर्त्ती के प्राण अब गये।

मुनिवर यह कहते हुए कि उदारगुण दशरथ स्थायी रहनेवाले अपवाद के डर से (राम को) रोक नहीं सके। धर्म की रक्षा करनेवाले राम ने मेरे कथन को भी माना नहीं। नियति को कौन जीत सकता है? इस प्रकार रोते हुए वे सुमंत्र के साथ गज-प्रासाद में गये।

मन्त्रिगण यह सोचकर कि राम रथ पर लौट आये हैं—चन्द्र के चारों ओर परिवेषण के समान दशरथ को घेरकर आये। किन्तु वहाँ राम को न देखकर और अजस्र अश्रु धारा बहानेवाले सुमंत्र की दशा को देखकर अपने आनन्द को भूल गये।

'रथ आ गया'—यों वहाँ के सब लोग बोल उठे। उसे सुनकर और यह सोच-कर कि राम आ गये, दशरथ मूर्च्छा से उठे। कमल-समान अपने नेत्र खोलकर देखा। फिर अपने सम्मुख महान् तपस्वी (वसिष्ठ) को देखकर उनसे पूछा—क्या महावीर (राम) लौट आया?

मुनिवर, 'नहीं आये' कह सकने में असमर्थ हो अत्यंत विकल होकर चुपचाप रहे। सद्गुणों से पूर्ण मुनिवर का मुख सूचित कर रहा था कि राम नहीं लौटे। तब दशरथ फिर मूर्च्छित हो गये। मुनिवर दुःखी होकर यह कहते हुए कि मैं चक्रवर्ती की पीडा को नहीं देख सकता, वहाँ से दूर हट गये।

तब चक्रवर्त्ती ने अपने सारथि को देखकर पूछा—मेरा वत्स (राम) दूर है या समीप में है? उत्तर में सुमंत्र ने ज्योंही यह कहा कि वे उनके अनुज तथा मिथिला में उत्पन्न लक्ष्मी-सदृश देवी तीनों सीधे बढ़े हुए बाँसों से भरे वन में गये, त्योंही दशरथ के प्राण भी शरीर को छोड़कर निकल गये।

उस समय, उस स्थान पर, इन्द्र आदि सब देवता आकर एकत्र हुए और यह सोचकर आनन्दित हुए कि हमारे पिता (विष्णु) के पिता हमारे निकट आनेवाले हैं। उन्होंने रुद्र समान एक अनुपम विमान में उन (दशरथ) को बिठाकर, नारायण के नाभि-कमल में उत्पन्न ब्रह्मा के लोक से भी ऊपर स्थित उस (वैकुंठ) लोक में पहुँचाया, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती।

उत्तम कुलजात मयूर-सदृश कौशल्या, दशरथ की दशा को देखकर आशंकित हुई और उनकी देह का स्पर्श करके देखा। तब यह जानकर कि इनके प्राण निकल गये, देह स्पन्दन-हीन हो गई है, अत्यन्त व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ी और यों तड़प उठी, जैसे कोई अस्थिहीन कीड़ा, कड़ी धूप में पड़कर तड़प उठा हो।

वह कौशल्या, जिन्होंने ब्रह्मा प्रभृति सारी सृष्टि के कारणभूत विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने का बड़ा सुकृत किया था, अब पति के वियोग से इस प्रकार विकल होकर विलाप करने लगीं जैसे चन्द्रमा ने अमृत को खो दिया हो, जैसे कोई नाग अपने माणिक्य को खोकर मूर्च्छित हुआ हो और जैसे क्रौंची अपने साथी को खोकर रो पड़ी हो।

२३२कंब रामायण

जिनको कुछ कमी नहीं थी, ऐसे दशरथ हम पर कृपाहीन होकर अब हमें छोड़कर चले गये। मृत्यु के कारणभूत किसी व्याधि के बिना ही मर गये। यों कहकर वे (कौशल्या) इस प्रकार तड़पकर गिरी, जैसे आकाश से वर्षा के न गिरने से किसी सूखनेवाले जलाशय में रहनेवाली मछली तड़पती हो।

जो पुत्रवान् होते हैं, उनका एक ही सुख नहीं, अनेक सुख मिलते हैं। वे अपने पितरों को नरक से मुक्त करते हैं। इस लोक में अपने माता-पिता के जीवन की रक्षा करते हैं। जो पुत्र पाकर जीवन व्यतीत करते हैं, उनको कोई विपदा उत्पन्न नहीं होती। किन्तु मेरा पुत्र (राम) तो यहाँ आकर यह नहीं कह रहा है कि तुम डरो नहीं, (इसके विपरीत) वह अपने पिता की मृत्यु का कारण बन रहा है। यों कहती हुई कौशल्या कातर होकर बिलखने लगीं।

हाय ! दशरथ को, किसी व्याधि से या युद्ध में भाले, करवाल आदि शस्त्र से मृत्यु नहीं मिली। किन्तु अपने जाये पुत्र से ही मृत्यु प्राप्त हुई (अर्थात्, अपना प्यारा पुत्र ही मृत्यु का कारण बना)। अहो, केकड़ा, मोती की सीप, फल देनेवाले केले का पेड़ और बाँस के जैसे दशरथ भी (अपने जाये पुत्र के कारण ही) मृत्यु-ग्रस्त हो गये। यों कहकर वह मूर्च्छित हो गिरी।

मेघ के मध्य कौंधनेवाली बिजली के समान दशरथ के वक्ष पर गिरकर बिलखनेवाली कौशल्या कहने लगी, मनोहर दीर्घ केशों से युक्त कैकेयी ! बुद्धि की चातुरी से तुमने राज्य प्राप्त किया। अपरिवर्तनीय वचन तुमने प्राप्त किये। तुमने एक साथ अपने सारे मनोरथ पूर्ण कर लिये, अहो !^१

अनुपम गजराज से वियुक्त होकर, गहरे प्रेम के कारण विकल होनेवाली हथनी के समान कौशल्या कहने लगी—हे राजन् ! तुमने पूर्वकाल में एक अपूर्व रथ में बैठकर शंबरासुर के युद्ध में उसे निहत किया था। तुम्हारी कृपा से देवता लोग सुखी हुए थे। आज तुम स्वयं उन (देवों) के अतिथि बन गये।

वह कौशल्या, जिन्होंने राम को जन्म दिया था, जिससे देवता लोग भी श्रुति (अर्थात्, वेद) के सारभूत परमपुरुष के दर्शन कर सके, कहने लगी—हे राजन् ! तुम क्या अपने पूर्व अनुष्ठित यज्ञों के फल भोगने के लिए गये हो ? या सत्य का व्रत लेने से उत्पन्न निःश्रेयस् का अनुभव करने के लिए गये हो ? या श्रेष्ठ मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म-मार्ग पर चलने से प्राप्त परमसुख का अनुभव करने के लिए गये हो ?

जब चक्रवर्ती की पत्नियों में पट्टमहिषी कौशल्या इस प्रकार के वचन कह-कहकर विलाप कर रही थी, उसी समय, उनकी सहेली जैसी सुमित्रा भी विकलता से रोती हुई बेसुध पड़ी रही। सारे अन्तःपुर में ऐसी दशा थी, जैसे युगान्त आ गया हो। आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली (दशरथ की) अन्य देवियों भी आकर एकत्र हो गईं और बड़ा कातर शब्द करके रो पड़ीं।


१. अन्तिम पंक्तियों में यह भाव ध्वनित हुआ है कि अपने पति को मारने की तुम्हारी इच्छा भी पूरी हो गई।

अयोध्याकाण्ड २३३

उन्होने अपने प्राणो के साथी को मृत पड़े हुए देखा, तो वे भय के कारण विष-पान किये हुए व्यक्ति के जैसे कंपित हो उठीं। उन्होने अपने मन मे ठान लिया कि निष्कलंक गुणवाले दशरथ का अनुसरण करके देवलोक मे जाना ही उत्तम हैं। इसलिए, भय और व्याकुलता के उत्तरोत्तर बढ़ते रहने पर भी वे मूर्च्छित हो नही गिरी (अर्थात्, दशरथ का सहगमन करने का दृढ निश्चय करके धीरता के साथ खड़ी रही) अहो ! क्या प्रेम से भी बढ़कर कठोर वस्तु कुछ है ?

कलंकहीन चन्द्र-जैसे मुखवाली वे देवियाँ ऐसी खड़ी थी कि समुद्र से आवृत्त धरती में, देव-लोक में, उससे परे स्थित अन्य लोको में भी पातिव्रत्य से युक्त स्त्रियो मे इन देवियो से बढ़कर कोई नहीं थी। अरण्य की किसी नदी की धारा से पर्वत के घिर जाने पर, उसके शिखर के अंचल पर एकत्र होनेवाले मयूरो के समूह के समान उन देवियो का समूह स्थिर खड़ा था।

अपने पुत्र से वियुक्त होकर तथा अत्यन्त पीडाजनक कड़वे वचनों से अपने प्राण त्यागकर भी अन्त तक सत्य पर दृढ रहनेवाले चक्रवर्त्ती की देह को वे स्त्रियाँ पकडे हुए रो रही थी। वे ऐसी थी, मानो मोहजनक माया-रूपी मकरो से भरे जीवन-रूपी समुद्र के पार (एक व्यक्ति को) पहुँचाकर लौटी हुई नौका मे स्वयं भी जाने का प्रयत्न कर रही हो ?

इस प्रकार जब साठ सहस्र देवियाँ रो रही थी तथा निष्कलंक गुणवाली कौशल्या तथा सुमित्रा विकल हो मूर्च्छित पड़ी थी, तब रत्नमय रथ का सारथ्य करनेवाले सुमन्त्र ने जाकर मुनिवर (वसिष्ठ) को दशरथ की दशा का समाचार दिया। वे वेदज्ञ मुनि तुरन्त आये और विधि के विधान के बारे मे सोचते हुए दुःख-मग्न हो रहे।

मुनिवर यह सोचकर कि हमारे चक्रवर्ती वर देकर पुत्र से वियुक्त होने के दुःख से अब मुक्त हो गये, चिन्तित हुए। तरंगो से क्षुब्ध सागर में किसी नौका के टूट जाने और उस नौका के नायक के मर जाने पर किंकर्त्तव्यविमूढ हो रहनेवाले पतवार चलानेवाले व्यक्ति के समान वे (किंकर्त्तव्यविमूढ़) हो रहे।

सस्कारादि क्रियाएँ सम्पन्न करने के लिए यहाँ कोई पुत्र नही है। जो घटित होना है, वह अवश्य घटित होगा ही। अब क्या किया जाय ? यो विचार करके फिर यह निश्चय किया कि भ्रान्ति मे पड़ी क्रूर कैकेयी के पुत्र (भरत) के आने पर सब अन्तिम क्रियाएँ पूर्ण करेंगे और स्त्रियो के समुद्र-मध्य पडे दशरथ के शरीर को तेल के समुद्र मे निमज्जित करके रखा।

राजा की पत्नियो को देखकर वसिष्ठ ने कहा—जिस दिन इन (चक्रवर्त्ती) के अन्तिम सस्कार किये जायेगे, उस दिन इनकी देह का आलिंगन करके रक्तवर्ण अग्नि-ज्वाला मे अपने प्राण छोड़ना। यो उनको वहाँ से हटाकर दोनो पट्टमहिषियो (कौशल्या और सुमित्रा) को कलंकहीन प्रासाद मे भेजा। फिर, संदेशवाहको को यह कहकर कि 'शीतल पुष्पमालाओ से भूषित भरत को जाकर ले आओ', और यह लिखकर कि 'यह चक्रवर्त्ती की आज्ञा है'—भेज दिया।

२३४ | कब रामायण

वे दूत केकय-महाराज के सुन्दर नगर की ओर चल पड़े। अपूर्वज्ञान तथा तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ ने सेनापतियों में एक चतुर व्यक्ति को देखकर कहा कि तुम आवश्यक राज्य-कार्य पूर्ण करो। फिर, अपने कुल-धर्म के अनुष्ठान के योग्य स्थान मे जा पहुँचे। अब हम उस प्रजा की दशा के संबंध मे कहेगे, जो राम के साथ (अरण्य मे) जाकर निद्रामग्न हुई थी।

सहस्र उज्ज्वल किरणो से युक्त सूर्य, मानो यह कहता हुआ कि 'उत्तम गुणवान् पुत्र दशरथ स्वर्ग मे पहुँच गया, उनके (चारो) पुत्र नगर से बाहर कही रहते है, उन पुत्रो (भरत और शत्रुघ्न) के आने तक मै ही इस नगर की रक्षा करूँगा'—प्रकाशमय रथ पर आरूढ होकर उज्ज्वल कर-रूपी करवाल लिये हुए प्रकट हुआ। तब मत्स्यों से पूर्ण समुद्र ने नगाड़े बजाये। देवताओ ने स्तुति-पाठ किया, ससार के लोगो ने वन्दना की।

राम के पीछे-पीछे आये हुए लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे कि उतना दुःखी अन्य कोई नही हुआ था, बेसुध होकर निद्रा मे डूबे थे और यह सोचकर कि उदारगुण (राम) वहाँ रहते हैं, उसी स्थान मे ठहरे हुए थे, सब इस समय जग पडे। फिर, करुणा से पूर्ण विशाल कमल-सदृश नयनोवाले घनश्याम राम को कही न देखकर विकल हुए और यह कहकर कि कभी न बद होनेवाले हमारे नेत्रो ने आज बद होकर हमे धोखा दिया, दुःखी होकर धरती पर लोट गये।

वे लोग राम का अन्वेषण करने के लिए आठो दिशाओ में दौड़ते, किन्तु मार्ग-मध्य गिर पड़ते। यह कहते कि अहो। हमारे प्रभु हमे दुःख के समुद्र मे निमज्जित करके चले गये। उन्होने कितना क्रूर कार्य किया है। वह घना दंडकारण्य इसी धरती पर है, अपनी बुद्धि से हम उसे ढूँढ़कर पहचानेगे। हम यो चुप पडे नही रह सकते। हम उस वन की ओर गये हुए रथ के चक्रो के चिन्हो को पकड़कर आगे चलेंगे।

रथ के चक्रो के चिह्न को खोजते हुए जानेवाले लोगो ने रथ के चिन्हो को अयोध्यानगर की ओर लौटते हुए देखा। उससे उनके प्राण स्वस्थ हुए। वे सोचने लगे कि डरने की आवश्यकता नही। प्रभु अयोध्या पहुँच गये हैं। इस पर आनदित होकर वे यो घोष कर उठे, जैसे वज्रयुक्त आकाश और समुद्र एकत्र होकर शब्द कर उठे हो।

उन नगरवासियो ने विचार किया—वसन्त के साथी मन्मथ के रूप-गर्व को मिटानेवाले राम अयोध्या को लौट गये हैं। उनकी दशा इस प्रकार हुई, जैसे फुफकार करनेवाले सर्प के भयकर वक्र दंत के दंश से (उनके शरीर मे) बढे हुए विष को दूर करने का अपूर्व औषध, 'अमृत' उन्हे मिल गया हो और उससे उनके प्राण स्वस्थ हो गये हो।

ज्यो-ज्यो वे मार्ग मे बढते जाते थे, त्यो-त्यो उस रथ के चक्रों का ही चिह्न देखते थे। नगर से इतर अन्य किसी दिशा मे उन चिन्हो को न देखकर वे उत्तरोत्तर बढनेवाले आनन्द से भरकर अपने अयोध्यानगर मे उसी प्रकार पुनः आ पहुँचे, जिस प्रकार समुद्र प्रलय-काल में अपनी सीमा को पारकर ससार-भर मे वह चलता है और पुनः अपनी सीमा के अन्दर आ पहुँचता हैं।

नगर मे पहुँचने पर उन लोगो ने सुना कि चक्रवर्ती स्वर्ग सिधार गये। यह समाचार भी सुना कि दशरथ के स्वर्गवास करने का कारण राम का वन-गमन ही है। तब

अयोध्याकाण्ड २३५

उनके हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गये और वे मूच्छित होकर गिर पड़े। उनके महान् शोक का वर्णन करना हमारी शक्ति के परे है। प्रत्येक व्यक्ति के प्राणों के निर्गमन के लिए एक समय निश्चित होता है। अतः, वैसा गंभीर दुःख होने पर भी उनके प्राण शरीर को छोड़कर कैसे निकल सकते थे ?

वे चक्रवर्त्ती की कुछ सेवा नहीं कर सके। वन को गये हुए राम के साथ रहकर उनकी कुछ सेवा नहीं कर सके। दुस्सह दुःख-रूपी कारागार में बंदी होकर वे तड़प रहे थे; तब अपूर्व तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ मुनिवर ने उनको, यह कहकर कि मैं भी तो अपवाद से डरकर इन प्राणों को रखे हुए हूँ और इस शोक का अनुभव कर रहा हूँ, और कई प्रकार से समझाकर उन्हें शांत किया।

मुनिवर की आज्ञा से जलमध्य-स्थित वडवाग्नि से डरकर वेला को न लाँघनेवाले-समुद्र के समान, नगर के लोग दुःख-सागर में निमग्न ही रहे। अब हम, उदारगुण पिता की आज्ञा, 'देवों के सुकृत' से, अर्धरात्रि में वन-मार्ग पर चलनेवाले दृढ़ धनुर्धारी राम के कार्यों का वर्णन करेंगे। ( १-८७ )


अध्याय ६

गंगा पटल

'इनके शरीर का रंग अंजन-सा है, या मरकत-समान है, अथवा तरंगों से पूर्ण समुद्र-जैसा है, या वर्षाकालिक मेघ-समान है ?' ऐसा सन्देह उत्पन्न करनेवाले अनुपम तथा अनश्वर सौंदर्य से युक्त रामचन्द्र, 'नहीं है' ऐसा कहने योग्य कटि से युक्त अपनी पत्नी तथा अपने अनुज के साथ इस प्रकार चले कि सूर्य की कांति उनके शरीर से फूटनेवाली किरणों में अदृश्य होने लगी।

भ्रमरकुल-समान और अनुपम काली मिट्टी के समान घने केशोंवाली, क्षीरसागर में उत्पन्न अमृत-जैसी मृदु-मधुर बोलीवाली, पूर्ण तपस्या के समान व्यापारों से युक्त, आकाश (शून्य)-जैसी कटिवाली सीता के साथ, वृषभ-जैसी गतिवाले रामचन्द्र ने मस्त हंसों तथा हंसिनियों के विहार को देखा।

( मन्मथ के ) पंच बाणों तथा राम के तीक्ष्ण बाण को भी परास्त करनेवाले तथा विष को जीतनेवाले नयनों से युक्त सीता ने देखा कि रामचन्द्र के चरण, रेखावाले मत्त भ्रमरों की गुंजार से भरे कमलपुष्पों का उपहास कर रहे हैं।

अत्यन्त सुगंध और मकरंद से भरे अलकों से युक्त चन्द्रखंड-सदृश ललाटवाली (सीता) के साथ प्रवाल-समान अधरवाले रामचन्द्र इस प्रकार चले, जैसे उज्ज्वल आभरणों से भूषित कोई मेघ, बिजली के साथ आ रहा हो या कोई मत्तगज, करिणी के साथ आ रहा हो।

२३६ कंब रामायण

छेदवाले वंशी की ध्वनि के समान, तंत्रियों से युक्त वीणा के नाद के समान, पीले मधु के समान और इक्षु-रस के खंड के समान माधुर्य से युक्त तोते की-सी बोलीवाली सीता के नयनों के जैसे लगनेवाले और खेतों को निरानेवाले किसानों के द्वारा खेतों से उखाड़कर फेंके गये कुवलय पुष्पों के पुंज को राम ने देखा।

'इसके द्वारा ढोये जानेवाले ये कुङ्कुमों से युक्त दो स्वर्ण-कलश हैं, अथवा मद-भरे गज के दंत-युगल हैं,' ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले स्तन-युगल से युक्त, मेघ-समान केशोंवाली सीता, पर्वताकार कंधोंवाले राम के संग बड़े आनन्द से, दुःख का लेशमात्र भी अनुभव नहीं करती हुई और मार्ग में, ईख पेरनेवाले कोल्हुओं (इक्षु-यंत्र) आदि को देखती हुई चली।

विविध शंखों से उत्पन्न मणियों से भरे, फैली हुई कमल-लताओं से शोभायमान जलाशयों से भरे एवं हंसों के विश्राम-स्थान बने हुए शीतल उद्यानों को, दोनों पार्श्वों में शंखकीटों से युक्त सैकत श्रेणियों को, विविध पुष्पों को बिखेरनेवाले वृक्षों से भरे वनों को तथा स्वर्ण को बहा लानेवाली नदियों को देखकर वे मन में आनन्दित होते हुए चले।

वहाँ के जलाशयों में, जहाँ बड़ी-बड़ी भैंसें धान की बालियों को चबाते हुए ऐसी खड़ी रहती थीं कि (उन बालियों का) रस उनके मुँह से बहकर उनकी टाँगों पर से होकर नीचे की ओर बहता रहता था, जहाँ (जलाशयों में) 'शेल' और 'कयल' (नामक) मछलियाँ इस प्रकार ऊपर उछल पड़ती थीं कि मधु-पूर्ण कमल पुष्पों में रहने-वाले भ्रमर (भयभीत होकर) झट ऊपर उड़ जाते थे, जहाँ युवतियाँ लाल टाँगोंवाले मत्त राजहंसों के समान स्नान करती थीं, ऐसे सुन्दर दृश्यों से युक्त उस कौशल देश को पार करके वे तीनों आगे चले।

सूर्य के समान उज्ज्वल आभरणों से युक्त वे तीनों खेतों और वृक्षों से पूर्ण 'मरुदम प्रदेश' (उपजाऊ भूमि) पारकर, विशाल वीचियों से युक्त उस गंगा नदी पर जा पहुँचे, जहाँ वेदों को जाननेवाले पाप-रहित मुनि रहते थे।

गंगा नामक उस दिव्य नदी पर रहनेवाले सब तपोधन मुनि आनन्द से यह कहते हुए कि 'हमारी शरण तथा लक्ष्य-भूत परमतत्त्व अब हमारे सम्मुख प्रकट हुआ है', सुन्दर नयनोंवाले रामचन्द्र के दर्शन के लिए जा पहुँचे।

वे मुनि चिन्तन करके कहने के लिए असाध्य माधुर्य से परिपूर्ण तथा स्वर-रूप वेदों के द्वारा प्रतिपादित अमृत-स्वरूपी (राम) को अपने चर्म-चक्षुओं से देखकर इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए, जिस प्रकार उन (मुनियों) से भिन्न लोग (अर्थात्, सांसारिक व्यक्ति) स्त्रियों के पास इन्द्रिय-सुख पाकर प्रसन्नचित्त होते हैं।

बाँस के दण्डों को धारण करनेवाले उन मुनियों ने उज्ज्वल कमल-समान नेत्रोंवाले राम को, अपने नयन-पुटों से, समुद्र में उत्पन्न दिव्य माधुर्य से युक्त अमृत जैसे पिया। आगे जाकर उनका स्वागत करके एवं मधुर गानों से उनकी स्तुति करके आनन्दित हुए।

घर से भागे हुए अपने पुत्र को ढूँढ़-ढूँढ़कर भी कहीं न पाकर दिन-भर दुःखी रहनेवाले माता-पिता अपने सम्मुख उस पुत्र के आ जाने पर जिस प्रकार आनन्दित