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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

अयोध्याकाण्ड २२७

बनाकर यो सो रही थी कि उनके वदन कांतिहीन होकर, कुम्हलाकर, मुकुलित हुए कमल के समान लगते थे ।

कुछ, पथ-गमन के श्रम से चूर होकर, फैले हुए पत्थरो पर पड़ी सो रही थी । कुछ नीचे पडे पत्तो की राशि पर बेसुध पड़ी सो रही थी । कुछ, अपने वस्त्र का एकभाग मात्र पहनकर शेष भाग को विछाकर उस पर सो रही थी । कुछ पल्लवों को विछाकर उनपर शिथिल हो पड़ी थी ।

जब सब लोग इस प्रकार पडे सो रहे थे, तब ( वैवस्वत ) मनु के वंश मे उत्पन्न राम ने सुमंत्र को अपने निकट बुलाया ओर उससे कहा—तुम दोषहीन हो और सब गुणों के आगार हो । तुम्हे एक काम करना है । सुनो—

मुझपर गाढ प्रेम रखनेवालों को लौटाकर भेजना कठिन है । इनको यहाँ से भेजे बिना मेरा यहाँ से चला जाना भी उचित नही है । अतः, हे पितृ-तुल्य ! तुम अभी इस रथ को लौटाकर ले चलो । रथ के चिह्न को देखकर सब लोग यह समझेंगे कि मै अयोध्या को लौट गया हूँ । इससे सारी जनता नगर को वापस चली जायगी । तुमसे यही मेरी प्रार्थना है ।

सद्गुणों से पूर्ण राम के यों कहने पर रथ चलाने मे चतुर सुमंत्र ने कहा—इस स्थान में तुम्हे छोड़कर और अपने प्यारे प्राणों को रखकर मुझे उस अयोध्यानगर में, वहाँ की दुःखपूर्ण दशा को देखने के लिए जाना है। मै उस क्रूर माता और कठोर नृपति से भी अधिक कठोर हूँ ।

लोहे के समान हृदयवाला मै, वहाँ जाकर क्या कहूँगा ? क्या यह कहूँगा कि राम को, उनकी पत्नी तथा भाई के साथ पुष्पो से भरे उद्यान में जाने के लिए छोड़ आया हूँ ? या यह कहूँगा कि राम को साथ लेकर अयोध्या को लौट आया हूँ ?

क्या यह कहूँगा कि पुराना मित्र तथा दोषहीन आचरणवाला मै, माला के योग्य कोमल पुष्पो पर भी चलने मे अशक्त ( अर्थात्, अति सुकुमार ), कंचुक से बँधे स्तनोवाली सीता के साथ दोनो बलवान् कुमारो को कठोर धरती पर चलने के लिए उतारकर, स्वयं रथ पर लौटकर चला आया हूँ ?

क्या कठोर इन्द्रियो तथा शिला-जैसे मनवाला वंचक मै, टूटे हृदय तथा शिथिल गात्र से पीडित होनेवाले चक्रवर्त्ती के निकट दक्षिण दिशा के अधिपति यम के दूत के समान जाऊँ ? क्या मै तुमसे यह निवेदन कर सकता हूँ कि तुम अपनी सद्बुद्धि से कोई योग्य वचन मुझे बताओ ( जिसे मैं अयोध्या मे चक्रवर्त्ती को सुना सकूँ ) ।

हे प्रभु ! 'चारो दिशाओ के निवासी तथा नगर की प्रजा राम को समझा-बुझा-कर अयोध्या लौटा ले आयेगे'—यों कहकर चिंतित चक्रवर्ती को स्वस्थ किया गया था । अब क्या मैं कठोर यम-सदृश वचन से उनके प्राणो का हरण करूँगा ?

क्या मैं उनको यह सुनाऊँगा कि अग्नि मे यज्ञ करके, बड़ी कठिनाई से प्राप्त किये गये आपके सिंह-सदृश पुत्र, अरण्य मे चले गये हैं ? ठीक विचार करने पर जान पड़ता है कि चक्रवर्त्ती को इस कठोर वचन को सुनानेवाले मेरे जैसे व्यक्ति से तो वह कैकय-राजपुत्री ही अच्छी हैं ।