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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

अयोध्याकाण्ड २२७

बनाकर यो सो रही थी कि उनके वदन कांतिहीन होकर, कुम्हलाकर, मुकुलित हुए कमल के समान लगते थे ।

कुछ, पथ-गमन के श्रम से चूर होकर, फैले हुए पत्थरो पर पड़ी सो रही थी । कुछ नीचे पडे पत्तो की राशि पर बेसुध पड़ी सो रही थी । कुछ, अपने वस्त्र का एकभाग मात्र पहनकर शेष भाग को विछाकर उस पर सो रही थी । कुछ पल्लवों को विछाकर उनपर शिथिल हो पड़ी थी ।

जब सब लोग इस प्रकार पडे सो रहे थे, तब ( वैवस्वत ) मनु के वंश मे उत्पन्न राम ने सुमंत्र को अपने निकट बुलाया ओर उससे कहा—तुम दोषहीन हो और सब गुणों के आगार हो । तुम्हे एक काम करना है । सुनो—

मुझपर गाढ प्रेम रखनेवालों को लौटाकर भेजना कठिन है । इनको यहाँ से भेजे बिना मेरा यहाँ से चला जाना भी उचित नही है । अतः, हे पितृ-तुल्य ! तुम अभी इस रथ को लौटाकर ले चलो । रथ के चिह्न को देखकर सब लोग यह समझेंगे कि मै अयोध्या को लौट गया हूँ । इससे सारी जनता नगर को वापस चली जायगी । तुमसे यही मेरी प्रार्थना है ।

सद्गुणों से पूर्ण राम के यों कहने पर रथ चलाने मे चतुर सुमंत्र ने कहा—इस स्थान में तुम्हे छोड़कर और अपने प्यारे प्राणों को रखकर मुझे उस अयोध्यानगर में, वहाँ की दुःखपूर्ण दशा को देखने के लिए जाना है। मै उस क्रूर माता और कठोर नृपति से भी अधिक कठोर हूँ ।

लोहे के समान हृदयवाला मै, वहाँ जाकर क्या कहूँगा ? क्या यह कहूँगा कि राम को, उनकी पत्नी तथा भाई के साथ पुष्पो से भरे उद्यान में जाने के लिए छोड़ आया हूँ ? या यह कहूँगा कि राम को साथ लेकर अयोध्या को लौट आया हूँ ?

क्या यह कहूँगा कि पुराना मित्र तथा दोषहीन आचरणवाला मै, माला के योग्य कोमल पुष्पो पर भी चलने मे अशक्त ( अर्थात्, अति सुकुमार ), कंचुक से बँधे स्तनोवाली सीता के साथ दोनो बलवान् कुमारो को कठोर धरती पर चलने के लिए उतारकर, स्वयं रथ पर लौटकर चला आया हूँ ?

क्या कठोर इन्द्रियो तथा शिला-जैसे मनवाला वंचक मै, टूटे हृदय तथा शिथिल गात्र से पीडित होनेवाले चक्रवर्त्ती के निकट दक्षिण दिशा के अधिपति यम के दूत के समान जाऊँ ? क्या मै तुमसे यह निवेदन कर सकता हूँ कि तुम अपनी सद्बुद्धि से कोई योग्य वचन मुझे बताओ ( जिसे मैं अयोध्या मे चक्रवर्त्ती को सुना सकूँ ) ।

हे प्रभु ! 'चारो दिशाओ के निवासी तथा नगर की प्रजा राम को समझा-बुझा-कर अयोध्या लौटा ले आयेगे'—यों कहकर चिंतित चक्रवर्ती को स्वस्थ किया गया था । अब क्या मैं कठोर यम-सदृश वचन से उनके प्राणो का हरण करूँगा ?

क्या मैं उनको यह सुनाऊँगा कि अग्नि मे यज्ञ करके, बड़ी कठिनाई से प्राप्त किये गये आपके सिंह-सदृश पुत्र, अरण्य मे चले गये हैं ? ठीक विचार करने पर जान पड़ता है कि चक्रवर्त्ती को इस कठोर वचन को सुनानेवाले मेरे जैसे व्यक्ति से तो वह कैकय-राजपुत्री ही अच्छी हैं ।

२२८ कंब रामायण

इस प्रकार अंतिम प्रार्थना करने पर भी सुमंत्र को वज्र का घोष ही (अर्थात्, मैं नहीं लौटूंगा) सुनाई पड़ा, जिससे अत्यंत व्याकुल होकर तड़पनेवाले सर्प के समान व्याकुल होकर सुमंत्र राम के चरणों को पकड़कर धरती पर लोट गया और विविध वचन कहकर रोने लगा।

तब उन राम ने, जो निग्रह करने योग्य इन्द्रियों तथा मन के लिए अगोचर, पर परिशुद्ध बुद्धि के लिए गोचर हैं, अपने विशाल हाथों से उठाकर उस सुमंत्र को गले लगा लिया और उसके अश्रुओं को पोंछकर पृथक् ले जाकर उससे कहा—

इस संसार में हमारा जन्म हुआ है। उस (जन्म) के साथ घटित होनेवाली सब बातों को, उचित बुद्धि से, सोचकर समझने की शक्ति तुम रखते हो। यह सोचकर कि विपदा उत्पन्न हुई है, क्या तुम असाधारण रूप से उत्पन्न होनेवाले अपयश को एवं धर्म के तत्त्व को भूल जाओगे?

श्रेष्ठ धर्म सब कार्यों से आगे रहकर यश को स्थिर बनाता है और मृत्यु के पश्चात् भी शाश्वत फल प्रदान करता है। ऐसे धर्म का आचरण करते समय, क्या यदि सुख हो, तो हम उसका आचरण करेंगे, पर यदि कष्ट हो, तो क्या उस (धर्म) को छोड़ देना उचित होगा?

शत्रुओं के उज्ज्वल शस्त्रों को वीरता के साथ अपने वक्ष पर सहन करना शूरता नहीं है। मृत्यु का भी सामना होने पर, अथवा सारी संपत्ति को खोने की आवश्यकता पड़ने पर भी, धर्म का परित्याग न करना ही शूरता है।

(शत्रुओं के) शरीर को भेदकर उसमें स्थित प्राणों के अपहारक भाले को धारण करनेवाले हे राम! यदि मैं वन-गमन से होनेवाले कष्टों का विचार करके नगर को लौट जाऊँगा, तो क्या वैवस्वत मनु का यह कुल, जिसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैली हुई है, धर्मच्युत नहीं कहलायेगा?

'आचरण के लिए दुस्साध्य सत्य का अनुसरण करनेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) ने अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज दिया—ऐसी'—प्रख्याति उन चक्रवर्त्ती के लिए एक तपस्या ही होगी और उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके वन जाना मेरे लिए भी तपस्या ही है। अतः, हे मेरे पितृ-तुल्य! तुम इससे दुःखी मत होओ।

(नगर में लौटकर) तुम पहले मुनिवर (वसिष्ठ) को नमस्कार करना और मेरे प्रणाम एवं मेरे वचनों को उन्हें सुनाना। उन मुनिवर से यह निवेदन करना कि वे स्वयं चक्रवर्त्ती के पास जाकर मेरा मनोभाव उनसे प्रकट करें।

मुनिवर के द्वारा ही मेरे भाई (भरत) को यह सन्देशा देना कि वह नीति-मार्ग पर दृढ़ रहकर वेदज्ञ ब्राह्मणों तथा स्वर्गलोकवासियों के लिए हितकारी कार्य करें तथा अपने आचरण से, मेरे वियोग में उत्पन्न सब लोगों के दुःख को दूर करे। फिर, रामचन्द्र ने सुमंत्र से कहा—

तुम (वसिष्ठ मुनिवर से) यह कहना कि इस समय मेरे मन को यह बात किंचित् भी पीड़ा नहीं दे रही है कि मेरी छोटी माता के कारण एक बड़ा दुःख मुझे उत्पन्न हुआ है।

अयोध्याकाण्ड २२६

अतः, मेरे प्रति उनकी जैसी कृपा है, वैसी ही कृपा उस (कैकेयी अथवा भरत) पर भी रखे।

तुम यहाँ से लौटकर महान् तपस्वी (वसिष्ठ) के साथ राजप्रासाद में जाओ और मेरे पिता के अपार दुःख को शांत करने का उपाय करो। उन चक्रवर्ती की कृपा मेरे उस भाई (भरत) पर भी बनी रहे, ऐसा उपाय करो—यही मेरी प्रार्थना है।

मुखपट्ट से भूषित, मदस्रावी हाथियों की सेना से युक्त चक्रवर्ती को वसिष्ठ के द्वारा मेरा यह सन्देश पहुँचा देना कि चौदह वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् मैं नगर को लौट आऊँगा और उनके चरणों को प्रणाम करूँगा। वे दुःखी न हों।

मेरी तीनों माताओं को क्रम के अनुसार मेरा प्रणाम पहुँचाना। फिर, चक्रवर्ती के दुःख को शांत करते हुए उनके निकट रहना—इस प्रकार राम ने, जो वेदों के लिए भी अज्ञेय हैं और अब वन में जाकर रहते हैं, सुमंत्र से कहा।

अनुपम महान् रथ को चलाने में समर्थ सुमंत्र ने, यह विचार कर कि दासता से विमुख होना एक सेवक का कर्त्तव्य नहीं है, राम के चरणों पर नत हुआ। फिर, यह सोचकर कि पूर्व कर्मों के कारण हमें दुःख भोगना पड़ता है, भाले-जैसे नेत्रवाली जानकी को नमस्कार करके उनकी ओर देखा।

तब सीता ने (सुमंत्र से) कहा—'चक्रवर्ती को तथा सासों को मेरा नमस्कार कहना। फिर, मेरी प्यारी बहिनों से कहना कि सोने के रंगवाली मेरी सारिका को और तोते को सावधानी से पाले।

सीता के वचन सुनकर, सारथि (वनवास से) अधीर न होनेवाली उन (सीता) के दुःख का विचार करके व्यथित हुआ, और यह कहता हुआ कि 'विपदा उत्पन्न होने पर उसे दूर करने में कौन समर्थ होता है और प्राण छोड़ना भी सुगम नहीं है'—पहले भीतर-ही-भीतर व्याकुल हुआ, फिर ऐसा रो पड़ा कि महावीर राम के समझाने पर भी वह शान्त नहीं हुआ।

सदा स्थिर रहनेवाले प्रेम से युक्त सुमंत्र, अपने दुःख से किंचित् शान्त-सा होकर राम को पुनः-पुनः नमस्कार करके उनसे विदा हुआ। फिर लक्ष्मण से उसने पूछा कि आपका क्या सन्देश है।

तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया—'जिन सत्यसंध ने, पहले मेरे भाई को राज्य देने का वचन देकर पुनः सारी संपत्ति को सुगन्धित केशोंवाली एक नारी को दे दिया, उनको चक्रवर्ती मानकर क्या अब भी कोई संदेश देना उचित होगा?

फिर भी, उन असत्यहीन चक्रवर्ती से, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र के वन में जाकर कंद-मूल खाते रहते समय, स्वयं राजोचित भोजन करते रहते हैं, यह कहना कि उनके शरीर में स्थित प्राण इस संसार को छोड़कर अभी तक स्वर्ग नहीं गये, अतएव मैं उनकी दृढ़ता की प्रशंसा करता हूँ।

उज्ज्वल करवालधारी राजा भरत से कहना—'मैं, राजा होने के अधिकारी मेरे-प्रभु (राम) का भाई (होने योग्य) नहीं हूँ (क्योंकि मैं अपने पिता से लड़कर उन्हें राज्य नहीं दिलवा सका)। राज्य का शासन करनेवाले उस भरत का भी भाई नहीं हूँ

२३०कंब रामायण

तथा उस शत्रुघ्न को भी अपना अनुज नहीं मानता हूँ। मैं केवल एकाकी ही जन्मा हूँ। मेरा बल किंचित् भी कम नहीं है।

इस समय आर्य (राम) ने अपने भाई को देखकर कहा—हे तात ! ऐसे अशोभनीय वचन कहना उचित नहीं। तब सारथि अपने मन में व्यथित होकर धरती पर गिरकर उनको प्रणाम करके रथ की ओर बढ़ा।

सुमन्त्र ने रथ-रूपी यन्त्र को ठीक किया। उसमें घोड़े जोते। सबकी दृष्टि में साफ दिखाई देनेवाले मार्ग से अपने रथ को लौटाकर ले चला। उसने निपुणता से रथ को ऐसे चलाया कि कोई भी व्यक्ति निद्रा से नहीं जग सका।

उस अर्धरात्रि में, प्रभु (राम) भी देवी का पातिव्रत्य, अपनी उदारता, कलंक-हीन कृपा, विवेक, सत्य, कार्य में निपुण अपने धनुष तथा अनुज (लक्ष्मण), इन सबको साथ लेकर चल पड़े।

तब दिव्य प्रकाश से युक्त चन्द्रमा ऐसे उदित हुआ, मानो मायावी जीवन व्यतीत करनेवाले राक्षसों का साथी बनकर उनके क्रूर कार्यों में सहायता देनेवाले तथा राम-लक्ष्मण के (वन-गमन में) विघ्न-सा बने हुए, अंजन सदृश अंधकार को भगाने के लिए आकाश ने अपने हाथ में दीपक ले लिया हो।

वह अनुपम शीतल चंद्रमा इस प्रकार प्रकाशित हुआ, जैसे उस धर्मदेवता का प्रसन्न मुख हो, जो उसके प्राणों का विनाश करनेवाले पाप को मिटाने में समर्थ, वज्र-सदृश धनुष से युक्त राम-लक्ष्मण को वन-गमन के लिए सहमत करनेवाले सुकृत का विचार करके बड़ी प्रसन्नता से उन (राम-लक्ष्मण) के दर्शनार्थ वहाँ आया हो।

ऊँचे बढ़े हुए बाँसों से युक्त उस वन में पैदल चलनेवाले राम की दुःख-दशा को देखकर, दुःखी होकर ही मानो रक्त-कमल सुकुलित हुए थे। कुवलय-पुष्प भी सर्प के सिर का रूप धारण कर पीड़ित हो झुके थे। अब दूसरे पुष्पों के बारे में कहने की आवश्यकता ही क्या है ?

चन्द्रमा अपनी चंद्रिका फैला रहा था, मानो इस विचार से कि धनुष जैसी भौंहो-वाली (सीता) के मृदुल चरणों को चलने में क्लेश न हो। उसने कानन में सफेद रूई बिछा दी हो। उस प्रकाश में अंजनपर्वत-सदृश सुन्दर पुरुष (राम) तथा वह कनिष्ठ भ्राता—जो ऐसा था, मानो प्रभु (राम) को उत्तम स्वर्ण के आवरण से आवृत्त कर रखा हो—धीरे-धीरे पग बढ़ाते हुए चले।

क्षीण कटि से पीन स्तनों का भार वहन करनेवाली, लक्ष्मी कहलानेवाली तथा घने केश-भार से युक्त सीता, जल के बुद्बुदों से भी अधिक मृदुल अपने छोटे चरणों को रखती हुई रामचन्द्र के पीछे-पीछे चली। क्या कलंक-रहित प्रेम से भी बढ़कर दृढ़ कोई वस्तु हो सकती है ?

सूर्य के उदयाचल पर आने के पूर्व, लक्ष्मी के पति (राम) दक्षिण दिशा में दो योजन दूर चले गये। अब उस सुमन्त्र के संबंध में कहेंगे, जो निर्भर-जैसे बहते नयन, आहत मन तथा अकेलापन साथ लिये तीव्रगामी अश्व-जुत रथ पर चला था।

अयोध्याकाण्ड २३१

पाँच घड़ी के अन्दर वह (सुमन्त्र) प्राचीरों से सुरक्षित अयोध्यानगर में आ पहुँचा और जाकर कुलगुरु (वसिष्ठ) के चरणों पर नत हुआ। वे मुनिवर भी सब वृत्तांत सुनकर व्यथित-चित्त हुए और भविष्य को जानकर बोले—हाय! चक्रवर्त्ती के प्राण अब गये।

मुनिवर यह कहते हुए कि उदारगुण दशरथ स्थायी रहनेवाले अपवाद के डर से (राम को) रोक नहीं सके। धर्म की रक्षा करनेवाले राम ने मेरे कथन को भी माना नहीं। नियति को कौन जीत सकता है? इस प्रकार रोते हुए वे सुमंत्र के साथ गज-प्रासाद में गये।

मन्त्रिगण यह सोचकर कि राम रथ पर लौट आये हैं—चन्द्र के चारों ओर परिवेषण के समान दशरथ को घेरकर आये। किन्तु वहाँ राम को न देखकर और अजस्र अश्रु धारा बहानेवाले सुमंत्र की दशा को देखकर अपने आनन्द को भूल गये।

'रथ आ गया'—यों वहाँ के सब लोग बोल उठे। उसे सुनकर और यह सोच-कर कि राम आ गये, दशरथ मूर्च्छा से उठे। कमल-समान अपने नेत्र खोलकर देखा। फिर अपने सम्मुख महान् तपस्वी (वसिष्ठ) को देखकर उनसे पूछा—क्या महावीर (राम) लौट आया?

मुनिवर, 'नहीं आये' कह सकने में असमर्थ हो अत्यंत विकल होकर चुपचाप रहे। सद्गुणों से पूर्ण मुनिवर का मुख सूचित कर रहा था कि राम नहीं लौटे। तब दशरथ फिर मूर्च्छित हो गये। मुनिवर दुःखी होकर यह कहते हुए कि मैं चक्रवर्ती की पीडा को नहीं देख सकता, वहाँ से दूर हट गये।

तब चक्रवर्त्ती ने अपने सारथि को देखकर पूछा—मेरा वत्स (राम) दूर है या समीप में है? उत्तर में सुमंत्र ने ज्योंही यह कहा कि वे उनके अनुज तथा मिथिला में उत्पन्न लक्ष्मी-सदृश देवी तीनों सीधे बढ़े हुए बाँसों से भरे वन में गये, त्योंही दशरथ के प्राण भी शरीर को छोड़कर निकल गये।

उस समय, उस स्थान पर, इन्द्र आदि सब देवता आकर एकत्र हुए और यह सोचकर आनन्दित हुए कि हमारे पिता (विष्णु) के पिता हमारे निकट आनेवाले हैं। उन्होंने रुद्र समान एक अनुपम विमान में उन (दशरथ) को बिठाकर, नारायण के नाभि-कमल में उत्पन्न ब्रह्मा के लोक से भी ऊपर स्थित उस (वैकुंठ) लोक में पहुँचाया, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती।

उत्तम कुलजात मयूर-सदृश कौशल्या, दशरथ की दशा को देखकर आशंकित हुई और उनकी देह का स्पर्श करके देखा। तब यह जानकर कि इनके प्राण निकल गये, देह स्पन्दन-हीन हो गई है, अत्यन्त व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ी और यों तड़प उठी, जैसे कोई अस्थिहीन कीड़ा, कड़ी धूप में पड़कर तड़प उठा हो।

वह कौशल्या, जिन्होंने ब्रह्मा प्रभृति सारी सृष्टि के कारणभूत विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने का बड़ा सुकृत किया था, अब पति के वियोग से इस प्रकार विकल होकर विलाप करने लगीं जैसे चन्द्रमा ने अमृत को खो दिया हो, जैसे कोई नाग अपने माणिक्य को खोकर मूर्च्छित हुआ हो और जैसे क्रौंची अपने साथी को खोकर रो पड़ी हो।

२३२कंब रामायण

जिनको कुछ कमी नहीं थी, ऐसे दशरथ हम पर कृपाहीन होकर अब हमें छोड़कर चले गये। मृत्यु के कारणभूत किसी व्याधि के बिना ही मर गये। यों कहकर वे (कौशल्या) इस प्रकार तड़पकर गिरी, जैसे आकाश से वर्षा के न गिरने से किसी सूखनेवाले जलाशय में रहनेवाली मछली तड़पती हो।

जो पुत्रवान् होते हैं, उनका एक ही सुख नहीं, अनेक सुख मिलते हैं। वे अपने पितरों को नरक से मुक्त करते हैं। इस लोक में अपने माता-पिता के जीवन की रक्षा करते हैं। जो पुत्र पाकर जीवन व्यतीत करते हैं, उनको कोई विपदा उत्पन्न नहीं होती। किन्तु मेरा पुत्र (राम) तो यहाँ आकर यह नहीं कह रहा है कि तुम डरो नहीं, (इसके विपरीत) वह अपने पिता की मृत्यु का कारण बन रहा है। यों कहती हुई कौशल्या कातर होकर बिलखने लगीं।

हाय ! दशरथ को, किसी व्याधि से या युद्ध में भाले, करवाल आदि शस्त्र से मृत्यु नहीं मिली। किन्तु अपने जाये पुत्र से ही मृत्यु प्राप्त हुई (अर्थात्, अपना प्यारा पुत्र ही मृत्यु का कारण बना)। अहो, केकड़ा, मोती की सीप, फल देनेवाले केले का पेड़ और बाँस के जैसे दशरथ भी (अपने जाये पुत्र के कारण ही) मृत्यु-ग्रस्त हो गये। यों कहकर वह मूर्च्छित हो गिरी।

मेघ के मध्य कौंधनेवाली बिजली के समान दशरथ के वक्ष पर गिरकर बिलखनेवाली कौशल्या कहने लगी, मनोहर दीर्घ केशों से युक्त कैकेयी ! बुद्धि की चातुरी से तुमने राज्य प्राप्त किया। अपरिवर्तनीय वचन तुमने प्राप्त किये। तुमने एक साथ अपने सारे मनोरथ पूर्ण कर लिये, अहो !^१

अनुपम गजराज से वियुक्त होकर, गहरे प्रेम के कारण विकल होनेवाली हथनी के समान कौशल्या कहने लगी—हे राजन् ! तुमने पूर्वकाल में एक अपूर्व रथ में बैठकर शंबरासुर के युद्ध में उसे निहत किया था। तुम्हारी कृपा से देवता लोग सुखी हुए थे। आज तुम स्वयं उन (देवों) के अतिथि बन गये।

वह कौशल्या, जिन्होंने राम को जन्म दिया था, जिससे देवता लोग भी श्रुति (अर्थात्, वेद) के सारभूत परमपुरुष के दर्शन कर सके, कहने लगी—हे राजन् ! तुम क्या अपने पूर्व अनुष्ठित यज्ञों के फल भोगने के लिए गये हो ? या सत्य का व्रत लेने से उत्पन्न निःश्रेयस् का अनुभव करने के लिए गये हो ? या श्रेष्ठ मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म-मार्ग पर चलने से प्राप्त परमसुख का अनुभव करने के लिए गये हो ?

जब चक्रवर्ती की पत्नियों में पट्टमहिषी कौशल्या इस प्रकार के वचन कह-कहकर विलाप कर रही थी, उसी समय, उनकी सहेली जैसी सुमित्रा भी विकलता से रोती हुई बेसुध पड़ी रही। सारे अन्तःपुर में ऐसी दशा थी, जैसे युगान्त आ गया हो। आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली (दशरथ की) अन्य देवियों भी आकर एकत्र हो गईं और बड़ा कातर शब्द करके रो पड़ीं।


१. अन्तिम पंक्तियों में यह भाव ध्वनित हुआ है कि अपने पति को मारने की तुम्हारी इच्छा भी पूरी हो गई।

अयोध्याकाण्ड २३३

उन्होने अपने प्राणो के साथी को मृत पड़े हुए देखा, तो वे भय के कारण विष-पान किये हुए व्यक्ति के जैसे कंपित हो उठीं। उन्होने अपने मन मे ठान लिया कि निष्कलंक गुणवाले दशरथ का अनुसरण करके देवलोक मे जाना ही उत्तम हैं। इसलिए, भय और व्याकुलता के उत्तरोत्तर बढ़ते रहने पर भी वे मूर्च्छित हो नही गिरी (अर्थात्, दशरथ का सहगमन करने का दृढ निश्चय करके धीरता के साथ खड़ी रही) अहो ! क्या प्रेम से भी बढ़कर कठोर वस्तु कुछ है ?

कलंकहीन चन्द्र-जैसे मुखवाली वे देवियाँ ऐसी खड़ी थी कि समुद्र से आवृत्त धरती में, देव-लोक में, उससे परे स्थित अन्य लोको में भी पातिव्रत्य से युक्त स्त्रियो मे इन देवियो से बढ़कर कोई नहीं थी। अरण्य की किसी नदी की धारा से पर्वत के घिर जाने पर, उसके शिखर के अंचल पर एकत्र होनेवाले मयूरो के समूह के समान उन देवियो का समूह स्थिर खड़ा था।

अपने पुत्र से वियुक्त होकर तथा अत्यन्त पीडाजनक कड़वे वचनों से अपने प्राण त्यागकर भी अन्त तक सत्य पर दृढ रहनेवाले चक्रवर्त्ती की देह को वे स्त्रियाँ पकडे हुए रो रही थी। वे ऐसी थी, मानो मोहजनक माया-रूपी मकरो से भरे जीवन-रूपी समुद्र के पार (एक व्यक्ति को) पहुँचाकर लौटी हुई नौका मे स्वयं भी जाने का प्रयत्न कर रही हो ?

इस प्रकार जब साठ सहस्र देवियाँ रो रही थी तथा निष्कलंक गुणवाली कौशल्या तथा सुमित्रा विकल हो मूर्च्छित पड़ी थी, तब रत्नमय रथ का सारथ्य करनेवाले सुमन्त्र ने जाकर मुनिवर (वसिष्ठ) को दशरथ की दशा का समाचार दिया। वे वेदज्ञ मुनि तुरन्त आये और विधि के विधान के बारे मे सोचते हुए दुःख-मग्न हो रहे।

मुनिवर यह सोचकर कि हमारे चक्रवर्ती वर देकर पुत्र से वियुक्त होने के दुःख से अब मुक्त हो गये, चिन्तित हुए। तरंगो से क्षुब्ध सागर में किसी नौका के टूट जाने और उस नौका के नायक के मर जाने पर किंकर्त्तव्यविमूढ हो रहनेवाले पतवार चलानेवाले व्यक्ति के समान वे (किंकर्त्तव्यविमूढ़) हो रहे।

सस्कारादि क्रियाएँ सम्पन्न करने के लिए यहाँ कोई पुत्र नही है। जो घटित होना है, वह अवश्य घटित होगा ही। अब क्या किया जाय ? यो विचार करके फिर यह निश्चय किया कि भ्रान्ति मे पड़ी क्रूर कैकेयी के पुत्र (भरत) के आने पर सब अन्तिम क्रियाएँ पूर्ण करेंगे और स्त्रियो के समुद्र-मध्य पडे दशरथ के शरीर को तेल के समुद्र मे निमज्जित करके रखा।

राजा की पत्नियो को देखकर वसिष्ठ ने कहा—जिस दिन इन (चक्रवर्त्ती) के अन्तिम सस्कार किये जायेगे, उस दिन इनकी देह का आलिंगन करके रक्तवर्ण अग्नि-ज्वाला मे अपने प्राण छोड़ना। यो उनको वहाँ से हटाकर दोनो पट्टमहिषियो (कौशल्या और सुमित्रा) को कलंकहीन प्रासाद मे भेजा। फिर, संदेशवाहको को यह कहकर कि 'शीतल पुष्पमालाओ से भूषित भरत को जाकर ले आओ', और यह लिखकर कि 'यह चक्रवर्त्ती की आज्ञा है'—भेज दिया।

२३४ | कब रामायण

वे दूत केकय-महाराज के सुन्दर नगर की ओर चल पड़े। अपूर्वज्ञान तथा तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ ने सेनापतियों में एक चतुर व्यक्ति को देखकर कहा कि तुम आवश्यक राज्य-कार्य पूर्ण करो। फिर, अपने कुल-धर्म के अनुष्ठान के योग्य स्थान मे जा पहुँचे। अब हम उस प्रजा की दशा के संबंध मे कहेगे, जो राम के साथ (अरण्य मे) जाकर निद्रामग्न हुई थी।

सहस्र उज्ज्वल किरणो से युक्त सूर्य, मानो यह कहता हुआ कि 'उत्तम गुणवान् पुत्र दशरथ स्वर्ग मे पहुँच गया, उनके (चारो) पुत्र नगर से बाहर कही रहते है, उन पुत्रो (भरत और शत्रुघ्न) के आने तक मै ही इस नगर की रक्षा करूँगा'—प्रकाशमय रथ पर आरूढ होकर उज्ज्वल कर-रूपी करवाल लिये हुए प्रकट हुआ। तब मत्स्यों से पूर्ण समुद्र ने नगाड़े बजाये। देवताओ ने स्तुति-पाठ किया, ससार के लोगो ने वन्दना की।

राम के पीछे-पीछे आये हुए लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे कि उतना दुःखी अन्य कोई नही हुआ था, बेसुध होकर निद्रा मे डूबे थे और यह सोचकर कि उदारगुण (राम) वहाँ रहते हैं, उसी स्थान मे ठहरे हुए थे, सब इस समय जग पडे। फिर, करुणा से पूर्ण विशाल कमल-सदृश नयनोवाले घनश्याम राम को कही न देखकर विकल हुए और यह कहकर कि कभी न बद होनेवाले हमारे नेत्रो ने आज बद होकर हमे धोखा दिया, दुःखी होकर धरती पर लोट गये।

वे लोग राम का अन्वेषण करने के लिए आठो दिशाओ में दौड़ते, किन्तु मार्ग-मध्य गिर पड़ते। यह कहते कि अहो। हमारे प्रभु हमे दुःख के समुद्र मे निमज्जित करके चले गये। उन्होने कितना क्रूर कार्य किया है। वह घना दंडकारण्य इसी धरती पर है, अपनी बुद्धि से हम उसे ढूँढ़कर पहचानेगे। हम यो चुप पडे नही रह सकते। हम उस वन की ओर गये हुए रथ के चक्रो के चिन्हो को पकड़कर आगे चलेंगे।

रथ के चक्रो के चिह्न को खोजते हुए जानेवाले लोगो ने रथ के चिन्हो को अयोध्यानगर की ओर लौटते हुए देखा। उससे उनके प्राण स्वस्थ हुए। वे सोचने लगे कि डरने की आवश्यकता नही। प्रभु अयोध्या पहुँच गये हैं। इस पर आनदित होकर वे यो घोष कर उठे, जैसे वज्रयुक्त आकाश और समुद्र एकत्र होकर शब्द कर उठे हो।

उन नगरवासियो ने विचार किया—वसन्त के साथी मन्मथ के रूप-गर्व को मिटानेवाले राम अयोध्या को लौट गये हैं। उनकी दशा इस प्रकार हुई, जैसे फुफकार करनेवाले सर्प के भयकर वक्र दंत के दंश से (उनके शरीर मे) बढे हुए विष को दूर करने का अपूर्व औषध, 'अमृत' उन्हे मिल गया हो और उससे उनके प्राण स्वस्थ हो गये हो।

ज्यो-ज्यो वे मार्ग मे बढते जाते थे, त्यो-त्यो उस रथ के चक्रों का ही चिह्न देखते थे। नगर से इतर अन्य किसी दिशा मे उन चिन्हो को न देखकर वे उत्तरोत्तर बढनेवाले आनन्द से भरकर अपने अयोध्यानगर मे उसी प्रकार पुनः आ पहुँचे, जिस प्रकार समुद्र प्रलय-काल में अपनी सीमा को पारकर ससार-भर मे वह चलता है और पुनः अपनी सीमा के अन्दर आ पहुँचता हैं।

नगर मे पहुँचने पर उन लोगो ने सुना कि चक्रवर्ती स्वर्ग सिधार गये। यह समाचार भी सुना कि दशरथ के स्वर्गवास करने का कारण राम का वन-गमन ही है। तब

अयोध्याकाण्ड २३५

उनके हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गये और वे मूच्छित होकर गिर पड़े। उनके महान् शोक का वर्णन करना हमारी शक्ति के परे है। प्रत्येक व्यक्ति के प्राणों के निर्गमन के लिए एक समय निश्चित होता है। अतः, वैसा गंभीर दुःख होने पर भी उनके प्राण शरीर को छोड़कर कैसे निकल सकते थे ?

वे चक्रवर्त्ती की कुछ सेवा नहीं कर सके। वन को गये हुए राम के साथ रहकर उनकी कुछ सेवा नहीं कर सके। दुस्सह दुःख-रूपी कारागार में बंदी होकर वे तड़प रहे थे; तब अपूर्व तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ मुनिवर ने उनको, यह कहकर कि मैं भी तो अपवाद से डरकर इन प्राणों को रखे हुए हूँ और इस शोक का अनुभव कर रहा हूँ, और कई प्रकार से समझाकर उन्हें शांत किया।

मुनिवर की आज्ञा से जलमध्य-स्थित वडवाग्नि से डरकर वेला को न लाँघनेवाले-समुद्र के समान, नगर के लोग दुःख-सागर में निमग्न ही रहे। अब हम, उदारगुण पिता की आज्ञा, 'देवों के सुकृत' से, अर्धरात्रि में वन-मार्ग पर चलनेवाले दृढ़ धनुर्धारी राम के कार्यों का वर्णन करेंगे। ( १-८७ )


अध्याय ६

गंगा पटल

'इनके शरीर का रंग अंजन-सा है, या मरकत-समान है, अथवा तरंगों से पूर्ण समुद्र-जैसा है, या वर्षाकालिक मेघ-समान है ?' ऐसा सन्देह उत्पन्न करनेवाले अनुपम तथा अनश्वर सौंदर्य से युक्त रामचन्द्र, 'नहीं है' ऐसा कहने योग्य कटि से युक्त अपनी पत्नी तथा अपने अनुज के साथ इस प्रकार चले कि सूर्य की कांति उनके शरीर से फूटनेवाली किरणों में अदृश्य होने लगी।

भ्रमरकुल-समान और अनुपम काली मिट्टी के समान घने केशोंवाली, क्षीरसागर में उत्पन्न अमृत-जैसी मृदु-मधुर बोलीवाली, पूर्ण तपस्या के समान व्यापारों से युक्त, आकाश (शून्य)-जैसी कटिवाली सीता के साथ, वृषभ-जैसी गतिवाले रामचन्द्र ने मस्त हंसों तथा हंसिनियों के विहार को देखा।

( मन्मथ के ) पंच बाणों तथा राम के तीक्ष्ण बाण को भी परास्त करनेवाले तथा विष को जीतनेवाले नयनों से युक्त सीता ने देखा कि रामचन्द्र के चरण, रेखावाले मत्त भ्रमरों की गुंजार से भरे कमलपुष्पों का उपहास कर रहे हैं।

अत्यन्त सुगंध और मकरंद से भरे अलकों से युक्त चन्द्रखंड-सदृश ललाटवाली (सीता) के साथ प्रवाल-समान अधरवाले रामचन्द्र इस प्रकार चले, जैसे उज्ज्वल आभरणों से भूषित कोई मेघ, बिजली के साथ आ रहा हो या कोई मत्तगज, करिणी के साथ आ रहा हो।

२३६ कंब रामायण

छेदवाले वंशी की ध्वनि के समान, तंत्रियों से युक्त वीणा के नाद के समान, पीले मधु के समान और इक्षु-रस के खंड के समान माधुर्य से युक्त तोते की-सी बोलीवाली सीता के नयनों के जैसे लगनेवाले और खेतों को निरानेवाले किसानों के द्वारा खेतों से उखाड़कर फेंके गये कुवलय पुष्पों के पुंज को राम ने देखा।

'इसके द्वारा ढोये जानेवाले ये कुङ्कुमों से युक्त दो स्वर्ण-कलश हैं, अथवा मद-भरे गज के दंत-युगल हैं,' ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले स्तन-युगल से युक्त, मेघ-समान केशोंवाली सीता, पर्वताकार कंधोंवाले राम के संग बड़े आनन्द से, दुःख का लेशमात्र भी अनुभव नहीं करती हुई और मार्ग में, ईख पेरनेवाले कोल्हुओं (इक्षु-यंत्र) आदि को देखती हुई चली।

विविध शंखों से उत्पन्न मणियों से भरे, फैली हुई कमल-लताओं से शोभायमान जलाशयों से भरे एवं हंसों के विश्राम-स्थान बने हुए शीतल उद्यानों को, दोनों पार्श्वों में शंखकीटों से युक्त सैकत श्रेणियों को, विविध पुष्पों को बिखेरनेवाले वृक्षों से भरे वनों को तथा स्वर्ण को बहा लानेवाली नदियों को देखकर वे मन में आनन्दित होते हुए चले।

वहाँ के जलाशयों में, जहाँ बड़ी-बड़ी भैंसें धान की बालियों को चबाते हुए ऐसी खड़ी रहती थीं कि (उन बालियों का) रस उनके मुँह से बहकर उनकी टाँगों पर से होकर नीचे की ओर बहता रहता था, जहाँ (जलाशयों में) 'शेल' और 'कयल' (नामक) मछलियाँ इस प्रकार ऊपर उछल पड़ती थीं कि मधु-पूर्ण कमल पुष्पों में रहने-वाले भ्रमर (भयभीत होकर) झट ऊपर उड़ जाते थे, जहाँ युवतियाँ लाल टाँगोंवाले मत्त राजहंसों के समान स्नान करती थीं, ऐसे सुन्दर दृश्यों से युक्त उस कौशल देश को पार करके वे तीनों आगे चले।

सूर्य के समान उज्ज्वल आभरणों से युक्त वे तीनों खेतों और वृक्षों से पूर्ण 'मरुदम प्रदेश' (उपजाऊ भूमि) पारकर, विशाल वीचियों से युक्त उस गंगा नदी पर जा पहुँचे, जहाँ वेदों को जाननेवाले पाप-रहित मुनि रहते थे।

गंगा नामक उस दिव्य नदी पर रहनेवाले सब तपोधन मुनि आनन्द से यह कहते हुए कि 'हमारी शरण तथा लक्ष्य-भूत परमतत्त्व अब हमारे सम्मुख प्रकट हुआ है', सुन्दर नयनोंवाले रामचन्द्र के दर्शन के लिए जा पहुँचे।

वे मुनि चिन्तन करके कहने के लिए असाध्य माधुर्य से परिपूर्ण तथा स्वर-रूप वेदों के द्वारा प्रतिपादित अमृत-स्वरूपी (राम) को अपने चर्म-चक्षुओं से देखकर इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए, जिस प्रकार उन (मुनियों) से भिन्न लोग (अर्थात्, सांसारिक व्यक्ति) स्त्रियों के पास इन्द्रिय-सुख पाकर प्रसन्नचित्त होते हैं।

बाँस के दण्डों को धारण करनेवाले उन मुनियों ने उज्ज्वल कमल-समान नेत्रोंवाले राम को, अपने नयन-पुटों से, समुद्र में उत्पन्न दिव्य माधुर्य से युक्त अमृत जैसे पिया। आगे जाकर उनका स्वागत करके एवं मधुर गानों से उनकी स्तुति करके आनन्दित हुए।

घर से भागे हुए अपने पुत्र को ढूँढ़-ढूँढ़कर भी कहीं न पाकर दिन-भर दुःखी रहनेवाले माता-पिता अपने सम्मुख उस पुत्र के आ जाने पर जिस प्रकार आनन्दित

अयोध्याकाण्ड २३७

होते हैं, उसी प्रकार वे मुनि (राम के दर्शन से) आनन्दित हुए और बड़े आदर के साथ अपनी तपस्या के योग्य आश्रमों में ले गये।

राम आदि के पथ-श्रम को मिटाने के लिए उन मुनियों ने अश्रु के नवीन जल से उन्हें स्नान कराया, अपने मधुर वचन-रूपी धनी पुष्प-मालाएँ पहनाईं तथा अक्षय प्रेम-रूपी भोजन कराया।

वे मुनि, अरण्य के स्वच्छ शाक, कन्द और फल ढूँढ़कर ले आये और राम आदि से प्रार्थना की, 'हे उत्तम! समीपस्थ गंगा में स्नान करके, अग्निहोत्र १ करके इन फलों का आहार करो।

राम ने स्त्री-कुल के लिए दीपक समान (सीता) देवी को अपने अरुण कर से पकड़े हुए, देवी के द्वारा प्रशंसित होते हुए, उस गंगा नदी में स्नान किया, जो (गंगा) पूर्वकाल में ब्रह्मदेव के द्वारा अपने कर से उत्पन्न जल से उन (राम) के (अर्थात्, विष्णु के एक अवतार त्रिविक्रम के) चरण के धोने से वह चली थी।

कभी विनष्ट न होनेवाली (गंगा) नदी ने, कर जोड़कर (राम से) कहा— संसार के लोग मुझमें स्नान करके अपने पाप दूर करते हैं; आज मैं, मुझे उत्पन्न करने-वाले तुम से (स्पर्श पाकर) सब पापों से मुक्त हो गई।

कठोर नयनोंवाले हाथी की सूँड़-जैसी भुजावाले, जटा से बहनेवाले श्वेत गंगाजल से युक्त, पातिव्रत्य से पूर्ण देवी (सीता) के देखते हुए स्नान करनेवाले वे (राम), विषधर सर्प को हाथ में (आभरण बनाकर) धारण करनेवाले, पातिव्रत्य से पूर्ण देवी (पार्वती) के देखते हुए नृत्य करनेवाले, श्वेत गंगाधारा से युक्त जटावाले तथा चन्द्रकला को शिर पर धारण करनेवाले शिव के समान लगत थे।

हिलनेवाले जल से भरी गंगा नदी की तरंगों के मध्य वे (राम) ऐसे लगते थे, जैसे रजत-समान श्वेत वर्णवाले (विष्णु) क्षीर-सागर में, लता-जैसी कटिवाली कमलवासिनी (लक्ष्मी) के संग, शयन से उठकर खड़े हुए हों।

अलक्तक (महावर) रस से अलंकृत मृदु चरणोंवाली, चित्र-समान सुन्दरी सीता ने स्नान (के लिए जल में प्रवेश) किया, तो उनकी कटि की सुन्दरता से परास्त होकर 'वंजि' नामक लता, लज्जा से जल में अपना मुँह छिपाने लगी। (उनकी) मंद गति से हारकर राजहंस दूर हट गये। उनके चरण-जैसे लगनेवाले कमल जल में अदृश्य हो गये। मीन वहाँ से हट गये।

महादेव के जटाजूट में रहकर भी जो गंगा नदी 'आक', 'पुन्नाग' आदि विविध पुष्पों की गंध से युक्त नहीं हुई थी, वह सुन्दर केशोंवाली सीता देवी के कुन्तल में स्थित कस्तूरी-गंध तथा सद्योविकसित पुष्पों की गंध से भर गई।

लहरों पर फेन के उठ-उठकर हिलते रहने से, श्वेत केशोंवाली स्त्री के समान लगनेवाली गंगा, (पातिव्रत्य धर्म में) प्रसिद्ध सीता को एकाकी देखकर स्वयं, धाई के समान अपने करों (अर्थात्, लहरों) को बढ़ाकर उसे स्नान कराने लगी।


१. औपासन-होम करना गृहस्थ का नित्य कार्य कहा गया है।

२३८ कंब रामायण

सीता के दीर्घ केशपाश-रूपी मेघ-समुदाय खुलकर जल मे इस प्रकार विस्पदित हो रहे थे, जैसे गंगानदी के मध्य काले रगवाली यमुना नदी की धारा हो और उसमें अनेक भँवर दिखाई दे रही हो ।

भँवरों से युक्त, अनेक लहरो से भरी, शब्दायमान गंगा नदी की उस श्वेतधारा मे, जहाँ उन (सीता) की आँखों के जैसे मीन उछल रहे थे, स्नान करके सीता देवी जब जल से बाहर निकली, तब वे क्षीर-सागर में तत्काल (मथन-काल में) प्रकट हुई लक्ष्मी-सी लगती थी ।

पूर्वकाल मे गंगा नदी, विष्णु के अरुण कमल-समान चरण का स्पर्श करने से, सब लोगो के पापो को दूर करने की शक्ति से युक्त होकर प्रकट हुई थी । अब प्रभु के सारे शरीर का स्पर्श करने से क्या यह ससार कभी नरक मे जायगा ? (भाव यह है, गंगा नदी मे, राम के स्नान करने से ऐसी पवित्रता उत्पन्न हो गई कि अब ससार का कोई भी प्राणी नरक में नही जायगा ।)

राम, उस पवित्र जल में स्नान करके मुनियों के आवास मे पहुँचे । फिर, ज्ञानियो के ध्यान के विषयभूत परब्रह्म को नमस्कार करके प्रज्ज्वलित अग्नि मे होम किया । फिर, उन मुनियों के प्रेम के योग्य अतिथि बनकर भोजन स्वीकार किया ।

जिस विष्णु भगवान् ने बहुत कष्ट उठाकर अमृत उत्पन्न किया था और स्वयं उसे न पीकर देवो को दे दिया था, उसके अवतार राम ने, अब मुनियो के द्वारा दिये गये शाक-कंद का भोजन स्वीकार किया । अहो ! जिनका मन अत्यन्त शुद्ध है, उनके कार्य कभी त्रुटि-पूर्ण नही होते ।

उस समय सहस्र नौकाओ का अधिपति, दीर्घकाल से पवित्र गंगा मे नौका चलाते रहनेवाला, शत्रुध्वंसक धनुष को धारण करनेवाला, पर्वत के जैसे पुष्ट कंधोवाला, गुह नामक निषाद,---

पटह वाद्य से युक्त, श्वानो को पालनेवाला, अपने वडे-वडे पैरो में चमडे के जूत पहननेवाला, घनीभूत अधकार जैसे साकार हो गया हो--ऐसे रूपवाला, अपनी सेना के साथ इस प्रकार आया, जैसे जल-भरा मेघ ही समूल उठकर चला आया हो ।

उसकी सेना के लोग छोटे डडे से दुंदुभी को बजा रहे थे । 'पवे' नामक पटह-वाद्य बजा रहे थे । वह पल्लव-समान लाल रगवाले शरो को धारण करनेवाला था । अनेक नौकाओ का स्वामी था । मदस्रावी गडभागो से युक्त गज-यूथ के समान परिवार से घिरा था ।

कटि से जाँघो तक जाँघिया पहने हुआ था । गंगा की गहराई को जानने की महिमा से युक्त था । उसकी कटि से लाल रग का चर्म लटक रहा था । वह कटि में लपेटी हुई व्याघ्र की पूँछ से शोभायमान था ।

दाँतो की माला-जैसी लगनेवाली छोटे-छोटे उपलो की माला पहने था । उसके पैर ऐसे थे, जैसे पत्थरो के बने हो । उसके केश ऐसे थे, जैसे अधकार को बाँधकर रखा गया हो । उसकी ऊपर की ओर कुचित भौंहो पर धान से भरी वाली रखी हुई थी ।

उसके हाथो पर, ताड के पेडों से लटकनेवाले मोटे रेशों के जैसे बडे, घने और

अयोध्याकाण्ड २३६

सुन्दर केश बढ़े थे। उसका वक्ष विशाल शिला के समान था। उसका रंग तैल लगाये गये अन्धकार के समान था।

उसकी कटि मे, रक्त के चिन्हों से युक्त कटार थी। उसकी दृष्टि ऐसी भयंकर थी कि विषैला सर्प भी उसके आगे काँप जाय। वह उन्मत्त के जैसे असंबद्ध वचन बोलता था। उसकी कटि इन्द्र के वज्र के समान अत्यन्त दृढ़ थी।

शरीर को पुष्ट करनेवाले मांस और मछली खाने से उसके मुँह मे दुर्गन्ध आ रही थी। उस (मुँह) पर हँसी नहीं थी। बिना क्रोध के भी उसके देखने पर (उसकी आँखों से) चिनगारियाँ निकलती थीं। उसकी कण्ठ-ध्वनि यम को भी डरानेवाली थी।

तरंगों से भरे गंगा नदी के तट पर स्थित श्रृंगवेर नामक गाँव मे उसका निवास था। ऐसा वह (गुह), आश्रम में ठहरे हुए उदार पुरुष (राम) के दर्शन करने के लिए मधु, मछली आदि उपहार लेकर आया।

अपने परिवार के लोगों को दूर पर खड़ा करके, खूब तपाये गये बाण से युक्त अपने धनुष को भी दूर रखकर, कटि में बँधे कटार को भी उतारकर, निष्कलंक तथा प्रेमपूर्ण चित्त के साथ, वह राम के आवास-भूत उस आश्रम के द्वार पर पहुँचा।

वह निषादों का गजा, प्रेम से द्रवित हो वहीं खड़ा रहा। फिर पुकारकर कहा— हे स्वामी ! मैं, श्वान के समान क्षुद्र, आप का दास, आप की सेवा मे उपस्थित हुआ हूँ।

गुह के यों कहने पर लक्ष्मण उसके निकट आये और उससे पूछा—तुम कौन हो ? किस कार्य से आये हो ? तब गुह ने प्रेम के साथ उन्हें नमस्कार करके कहा— हे देव ! मैं श्वान-समान दास नाव चलानेवाला हूँ। आप के चरणों का दर्शन करने के लिए आया हूँ।

तब लक्ष्मण गुह से वही ठहरने को कहकर अपने ज्येष्ठ भाई के पास पहुँचे और निवेदन किया—हे विजयशील। पवित्र चित्तवाला, माता से भी अधिक प्रेम से युक्त, वीची-भरे गंगा में नाव चलानेवाला निषाद-पति गुह, अपने बड़े परिवार के साथ आपके दर्शनार्थ आया है।

उदार (राम) ने आदेश दिया—उसे मेरे पास ले आओ। सद्गुणवाले लक्ष्मण ने जाकर गुह को वह आदेश सुनाया, तो गुह प्रेमाधिक्य से तुरन्त भीतर प्रविष्ट हुआ और सुन्दर नेत्रोंवाले राम के दर्शन कर नेत्र-लाभ पाया। फिर काले केशों से युक्त अपने शिर पर कर जोड़कर, शरीर झुकाकर, नमस्कार करके, कर से अपना मुँह बंद किये खड़ा रहा।

राम ने गुह से कहा—बैठो। किन्तु गुह बैठा नही। असीम प्रेम से युक्त होकर उसने कहा—हे देव ! आपके भोजन के लिए अत्युत्तम मधु और मछली लाया हूँ। आपका चित्त कैसा है ? यह सुनकर वीर (राम) वृद्ध तपस्वियों की ओर देखकर मुस्कुराये$^१$ और फिर बोले—


१. कंब ने मांसाहार की काफी निन्दा की है। रामचन्द्र जी, इस रचना में, मांसाहारी नहीं हैं। यही कारण है कि गुह के लाये भोजन को, उसके प्रेम को और उसके भोलेपन को देखकर राम मुस्कराये।

२४० || कंब रामायण

ये वस्तुएँ मन में स्थित प्रेम के आधिक्य को प्रकट करनेवाली हैं और बडे आदर के साथ लाई गई हैं। अतः दुर्लभ अमृत से भी ये अधिक उत्तम हैं। प्रेम से लाये जाने के कारण ये पवित्र हैं, अतः मुझ जैसो के लिए ये योग्य ही हैं। अब जैसे मैने इन वस्तुओ को स्वीकार कर लिया है (तुम इनको स्वय स्वीकार कर लौटाकर ले जा सकते हो)।

सिंह-सदृश वीर राम ने पुनः कहा— आज यहाँ रहकर हम कल गंगा पार करेंगे। अतः, तुम अपने परिवार के लोगो के साथ अपने नगर में जाकर सुख से वास करो और प्रभात के समय नौका लेकर गगा-तट पर आ जाओ।

मेघ के जैसे काले रंगवाले राम के यह कहने पर प्रेम-भरे गुह ने निवेदन किया— हे सारे ससार के स्वामी ! आपको इस वेष मे देखकर भी अभी तक मै, चोर ने, अपनी इन आँखो को नोचकर फेंक नही दिया। अब आप को छोड़कर मै अपने आवास में नहीं लौट सकता। हे प्रभु । अपनी शक्ति-भर मै आपकी सेवा करता रहूँगा।

विजयमाला से भूषित कोदंड-धारी पुरुषोत्तम ने गुह की बात सुनकर अपने भाई और देवी सीता की ओर दृष्टि फेरी और कहा—यह अपार भक्तियुक्त है। और फिर, करुणा-पूर्ण मन से कहा—सबसे उत्तम स्नेह-गुण से सपन्न हे मित्र । तुम यही रहो।

तब गुह ने राम के चरणो को प्रणाम किया और उमड़नेवाले आनन्द के साथ, पटह-वाद्यों से युक्त समुद्र के समान अपनी सेना को बुलाकर रामचन्द्र के आवास के चारो ओर रहकर उसकी रक्षा करने की आज्ञा दी और वह स्वय हाथ मे धनुष लेकर और उसपर शर को भी चढ़ाकर, कटार को अपनी कटि के वस्त्र मे खोंसकर, गरजते मेघ के समान (ध्वनि के साथ) राम के चरणो की स्तुति करता हुआ खड़ा रहा।

गुह ने लक्ष्मण से प्रश्न किया—हे मनुकुल मे उत्पन्न ! सुन्दर अयोध्या नगर को छोड़कर यहाँ आने का कारण बताओ। तब राम के वनवास से दुःखी लक्ष्मण ने सब वृत्तांत कह सुनाया। (राम की) भक्ति से पूर्ण गुह ने अत्यत दुःखी होकर कहा—विशाल भूदेवी ने, तपस्या से सपन्न होकर भी, (तप के) फल को प्राप्त नही किया। यह कैसा अनर्थ है ? और अपनी आँखो से अश्रु बहाता हुआ खड़ा रहा।

जिन्होने अधकार के जैसे सर्वत्र फैले हुए शत्रुओ को पराजित करके भगाया, मव दिशाओ मे अपना अधिकार स्थापित किया, अत्युन्नत स्थान मे रहकर अनुपम आज्ञा-चक्र चलाया, श्रेष्ठ कीर्त्ति को स्थापित किया, अपने शासन-काल मे इस विशाल ससार क मव¹ लोगो के मन मे रहकर सब पर कृपा की, और अब जो मृत हो गये हैं, ऐसे युद्ध-वीर दशरथ के ममान ही अरुण किरणवाला सूर्य भी अस्त हो गया।

संध्याकालीन नित्य कृत्यो को यथाविधि ममाप्त करके वीर (रामचन्द्र) और क्षीर-समुद्र मे उत्पन्न अमृत समान (सीता) देवी ने धरती पर बिछाई गई 'नाणल' घास की बनी चटाई पर विश्राम किया, कनिष्ठ (लक्ष्मण) दृढ धनुष हाथ में लिये, प्रभात होने तक अपलक खड़े रहकर पहरा देते रहे।


१. इम पद में प्रयुक्त 'मव' विशेषण दशरथ और सूर्य—दोनों के लिए समान है।

अयोध्याकाण्ड २४१

जिन (लक्ष्मण) की देह-कांति सूर्य की किरणों से आवृत्त मेरु की स्वर्णमय आभा को मात करनेवाली थी, जो जगमगाते हीरकों के आभरण पहनने योग्य थे, और जो सिंह के सदृश (बलवान्) थे, ऐसे लक्ष्मण ने, निद्रा नामक सुन्दरी के उनके सम्मुख प्रकट होने पर उससे कहा—जब हम सुन्दर प्राचीरों से घिरी अयोध्या में लौटकर जायेंगे तब तुम मेरे पास आना। (तबतक तुम मेरे पास मत आना)।

वीरता के आगार, करवाल-धारी लक्ष्मण की आज्ञा का उल्लंघन न कर सकने के कारण निद्रा-देवी लक्ष्मण के चरणों को प्रणाम करके और यह कहकर कि जब तुम प्राचीरों से घिरी स्वर्ग लोक-जैसी अयोध्या मे आओगे, तब मै तुम्हारे चरणों के आश्रय में आऊँगी, वहाँ से चली गईं।

निद्रादेवी के यों प्रणाम करके चले जाने के पश्चात् लक्ष्मण, अपने प्रभु को निरंतर उत्तम कमल के आसन पर रहनेवाली लक्ष्मी (के अवतार सीता) के साथ उस प्रकार (भूमि पर) शयन करते हुए देखकर, उनकी दुःखद दशा पर अत्यन्त शोकाकुल हुए। उनका मन टूट-सा गया। उनकी आँखों से अश्रुओं के निर्झर बह चले। वे दुःख से भरी प्रतिमा-सदृश एक शिला पर निष्पद हो खड़े रहे।

पिछले दिन जन्म-रहित सूर्य मानो यह सूचित करते हुए अस्त हुआ था कि 'असंख्य जन्म लेते रहनेवाले ये जीव, पवित्र दिखाई पड़नेवाले स्वर्ग आदि (विनश्वर) लोकों को भूल जाये और (मोक्ष के एक मार्ग को) सोचकर जान लें और उस पर चलें; क्योंकि उनके मर जाने का यही ढंग है।' वही सूर्य मानो यह सूचित करते हुए अब उदित हुआ कि ये जीव ऐसे ही जन्म लेते हैं।

कीचड़ में उत्पन्न होनेवाले अति सुन्दर कमल-पुष्प, रथारूढ होकर प्रकट हुए उष्ण किरणधन सूर्य के मंडल के दर्शन से प्रफुल्ल हुए। विलक्षण अंजन-वर्ण सूर्य-जैसे प्रभु (राम) को देखकर सुन्दर 'वजि' लता जैसी सीता का मनोहर मुख-कमल प्रफुल्ल हुआ।

राम, प्रभातकालीन नित्य-कृत्य समाप्त करके शत्रुओं के लिए भयंकर अपने कन्धे पर धनुष को रखे हुए, वेदज्ञ मुनियों से अनुसृत होते हुए (आश्रम से) चल पड़े और प्रथम दर्शन में ही भक्ति से दास्य स्वीकार करनेवाले गुह को देखकर कहा—हे तात! हमको पार उतारने के लिए एक अच्छी नौका शीघ्र लाओ।

आज्ञा के यह वचन सुनकर गुह के नेत्रों से अश्रु बह चले, उसके प्राण व्याकुल हो गये, राम के चरणों से वियुक्त होने की इच्छा न होने से वह, सीता देवी के साथ शोभित होनेवाले नील कुवलय, अतसी पुष्प, समुद्र और सजल मेघ—इनकी समता करनेवाले राम के चरणों को नमस्कार करके यों कहने लगा—

हम कभी असत्य मार्ग पर चलनेवाले नहीं हैं। हमारा निवासस्थान वन ही है। हम अक्षुण्ण बल से युक्त हैं। आपकी आज्ञाओं का हम यथाविधि पालन करते रहेंगे। इसलिए सुन्दर पुष्पमालाधारी हे प्रभु! हम, दासों को आप अपने बन्धुजन समझें और हमारे ग्राम में चलकर चिरकाल तक सुख से रहें।

हमारे यहाँ मधु प्रभूत मात्रा में होता है, धान बहुत होता है, देवों के भी आहार

२४२कंब रामायण

के योग्य मास है। हम श्वान के जैसे आपके सेवक हैं। हमारे प्राण आपकी सेवा में निरत हैं। आपके विहार के लिए वन हैं। स्नान के लिए गंगा भी है। अतः, जबतक मैं यहाँ रहूँगा, तबतक आप भी आनन्द से हमारे संग रहे हमारे यहाँ पधारें।

पहनने के लिए रेशमी जैसे चर्म-वस्त्र हैं, विविध रस के भोज्य पदार्थ हैं। शृङ्खलाओं में लटकाये गये निद्रा करने के योग्य पर्यंक के जैसे तख्ते हैं। निवास के योग्य छोटे-छोटे कुटीर हैं। शीघ्रगामी (हमारे) चरण हैं और (विघ्न डालनेवालो को मारने-वाले) धनुर्धारी हमारे कर हैं। आप यदि शब्दधर्मा आकाश में स्थित किसी वस्तु को भी चाहेंगे, तो हम शीघ्र उसे ला देंगे।

आपकी आज्ञा का पालन करनेवाले पाँच सौ निषाद हैं। वे देवों से भी अधिक शक्तिशाली हैं। यदि आप एक दिन भी हमारे झोपडे में ठहरेंगे, तो उससे हम तर जायेंगे। उससे उत्तम कोई दूसरा जीवन हमारे लिए नही होगा—यों गुह ने निवेदन किया।

तब गुह की प्रार्थना सुनकर महिमामय प्रभु ने अपने मन को कृपा से भरकर, उज्ज्वल मंदहास करके कहा—हे वीर ! हम गंगा में स्नान करके, वन में रहनेवाले महात्माओ की सेवा में रहकर कुछ ही दिनों में पुनः तुम्हारे आवास में आनन्द के साथ आ पहुँचेंगे।

इंगित को जाननेवाला गुह, शीघ्र जाकर एक दीर्घ नौका ले आया। कमल-समान नयनोंवाले राम ने निकट-स्थित वंद्य ब्राह्मणों को देखकर कहा—मुझे आज्ञा दें। फिर, अर्धचन्द्र-सदृश ललाटवाली (सीता) एव अपने अनुज के साथ उस नौका पर आरूढ हुए।

शरीर के प्राण जैसे (राम) ने आज्ञा दी—नदी में नौका को शीघ्रता से चलाओ। दीर्घ वीचियों से पूर्ण नदी में वह दीर्घ नौका बाल-हंस की गति से शीघ्र चलने लगी। तब तट पर स्थित वेदज्ञ मुनि अग्नि में पड़े मोम के जैसे पिघल उठे।

दुग्ध-सदृश मीठी बोलीवाली सीता और सूर्य-समान रामचन्द्र, 'शैल' (नामक) मछलियों से पूर्ण गंगा के अति पवित्र जल को उछाल-उछालकर खेल रहे थे। दीर्घ डाँडो से खेई जानेवाली वह नौका अनेक टाँगोंवाले एक बड़े केकड़े के समान शीघ्रता से चली जा रही थी।

चंदन (वृक्षो) से युक्त सैकत श्रेणी-रूपी विशाल स्तनोंवाली गंगा-नदी ने, उज्ज्वल रत्न-समुदाय से युक्त ओर सुगंधित कमलपुष्पों की अरुण आभा से शोभायमान, स्वच्छ तरंग-रूपी अपने हाथों से, अकेले ही उस नौका को उठाकर मंद-मंद (गति से) दूसरे तट पर पहुँचा दिया।

उस किनारे पर पहुँचकर प्रभु ने अपने मित्र (गुह) से पूछा—चित्रकूट को जाने का मार्ग कौन-सा है, बताओ। तब भक्ति में अपने प्राण भी देने के लिए सन्नद्ध उस गुह ने (राम के) चरणों पर नत होकर कहा—हे उत्तम ! श्वान-तुल्य इस दास का एक निवेदन है।

श्वान-तुल्य मैं, यदि आपके संग चलने का भाग्य प्राप्त करूँ, तो वन में आपके चलने के लिए मार्ग बनाऊँगा। अति उत्तम फल और मधु ढूँढकर ला दूँगा। आपके

अयोध्याकाण्ड २४३

निवास के योग्य स्थान बनाऊँगा। एक क्षण भी आप को छोड़कर पृथक् नहीं रहूँगा।

(आपके आश्रम के) चारो ओर क्रूर व्याघ्रों को ढूँढ़-ढूँढ़कर मिटा दूँगा और अति पवित्र प्राणियों के आवासभूत वन को ढूँढ़कर वहाँ आप को पहुँचा दूँगा। आपकी इच्छित वस्तुएँ ढूँढ़कर ला दूँगा। मैं आपकी किसी भी आज्ञा को पूर्ण करने की शक्ति रखता हूँ। मैं रात्रिकाल में भी मार्ग में चल सकता हूँ।

मैं 'कवलै' आदि कंदो को पर्वतो पर से खोदकर ला दूँगा। प्राणों के आधारभूत स्वच्छ जल, चाहे कितनी भी दूर हो, वहाँ जाकर ला दूँगा। धनुष आदि अनेक शस्त्र मेरे पास हैं। मैं किसी से डरता नहीं हूँ। हे मल्लयुद्ध में चतुर कंधोंवाले ! आपके कमल-तुल्य चरणो से मैं कभी अलग नहीं होऊँगा।

हे अनुपम सुन्दर वक्षवाले ! यदि आप स्वीकार करेंगे, तो मैं अपनी सेना के साथ आपके साथ रहूँगा और कभी आप से पृथक् नहीं होऊँगा। यदि मेरे लिए असाध्य कोई शत्रु होगा, तो पहले मैं उसके साथ युद्ध करके अपने प्राण त्याग दूँगा और (अपने ऊपर) अपवाद नहीं आने दूँगा; आप आज्ञा दें कि मैं भी आपके साथ चलूँ।

गुह के वचन सुनकर निर्मल-रूप प्रभु ने उत्तर दिया—तुम मेरे प्राण-तुल्य हो। मेरा अनुज तुम्हारा अनुज है। सुन्दर ललाटवाली यह (सीता) तुम्हारी भाभी हैं। शीतल समुद्र से घिरी सारी धरती तुम्हारी संपत्ति है : मैं तुम्हारी सेवा के अधिकार (स्वत्व) में बँधा हुआ हूँ।

जब दुःख हो, तभी सुख होता है। अतः, यह सोचकर कि 'मैं (गुह), तुमको (राम को) कभी भविष्य में देखूँगा; किन्तु इस बीच दारुण वियोग-दुःख को भोगना पड़ेगा' दुःखी मत होओ। (तुमसे मिलने के) पहले हम चार भाई थे। अब, अंतहीन प्रेम से युक्त हम पाँच भाई हो गये हैं।

हे उज्ज्वल तीक्ष्ण भाले को धारण करनेवाले ! जबतक मैं वन में निवास करूँगा, तबतक तुम्हारा भाई यह लक्ष्मण मेरे कष्टों का भार वहन करने के लिए मेरे साथ रहेगा। मुझे दुःख देनेवाले शत्रु कहाँ हैं ? तुम जाओ और मेरे जैसे ही (अपने आश्रित जनों की) रक्षा में निरत रहो। जब मैं उत्तर की ओर लौटकर आऊँगा, तब तुम्हारे आवास में आकर ठहरूँगा। अपने दिये वचन से मैं कभी विमुख नहीं होऊँगा।

तुम्हारा भाई भरत, अयोध्या की प्रजा की रक्षा करने के योग्य गुणों से सम्पन्न है। यहाँ के बंधुओं की रक्षा करनेवाला (तुम्हारे सिवा) कौन है ? इसलिए तुम जाओ, तुम्हारे बन्धु मेरे बन्धु हैं; वे लोग दुःखी होंगे। मेरी आज्ञा से यहाँ के मेरे बन्धुओं की रक्षा करते हुए तुम यहाँ रहो। इस प्रकार राम ने कहा।

तब गुह, राम की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकने तथा (राम से) वियोग के दुःख को भी दूर नहीं कर पाने के कारण व्याधि-ग्रस्त-सा दिखाई पड़ा और विदा हुआ। प्रभु अपने अनुज एवं आभरण-भूषित देवी के साथ घने वृक्षों से भरे वन में दूर तक जानेवाले मार्ग पर चल पड़े। (६-७७)

अध्याय ७

वन-प्रवेश पटल

जिन वारनारियों की संगति को क्षुद्र जन प्राप्त करना चाहते हैं, उनके मन के जैसे ही, 'यह आर्द्र है या नहीं' ऐसा निश्चय करने के लिए असाध्य वसन्त ऋतु, रामचन्द्र के वन में आते ही, आकाश में सर्वत्र जल-भरे मेघों को दिखाने लगी ।

सूर्य अपनी किरण, चन्द्रिका के जैसे (शीतल) बनाकर फैला रहा था। वहाँ के घने वृक्ष छाया दे रहे थे। आकाश के बादल ओसकण-जैसी बूँदों की वर्षा कर रहे थे। मंद अनिल पुष्पों की गंध लेकर मृदु गति से बह रहा था। ऐसे समय में वे तीनों, मोरों के नृत्य को देखते हुए वन-मार्ग में प्रसन्नता के साथ चले ।

तब रामचन्द्र सीता को वन के विविध दृश्य दिखाने लगे। हे सुगंधित पुष्पमाला धारण करनेवाली ! कलापी-तुल्य ! यौवनपूर्ण हरिण के समान दृष्टि से शोभायमान। (देखो) मधुर निद्रा करनेवाले इन्द्रगोप सर्वत्र फैले हुए हैं और कनैंल के स्वर्णवर्ण पुष्पों की राशियाँ पड़ी हैं। उन सबका दृश्य ऐसा ही है, जैसे अनेक रत्नजटित स्वर्णहार पड़े हों ।

भ्रमरों के गान और मेघ-रूपी मर्दल-वाद्य के साथ अपने पंख फैलाकर मनोहर नृत्य दिखानेवाले, लजीले-से ये मयूर, जैसे तुम्हारे सौंदर्य को अनेक नेत्रों से देखकर आनन्दित हो रहे हैं ।

सुन्दर आम्र-पल्लव के समान शरीर-कांति से युक्त, हे सुन्दरी ! मनोहर आभा से युक्त रक्तवर्ण मुख और हरित देह-कांति से शोभायमान शुक, लावण्यपूर्ण 'कादल' पुष्प पर बैठे हुए ऐसे लगते हैं, जैसे तुम्हारे हाथ पर बैठे हों, ऐसे शुकों को देखो ।

तैल-लगे दीर्घ बरछे के जैसे तथा हथेली के विस्तार से भी बड़े नयनों में शोभायमान, हे देवी ! अनेक मयूर और यौवन से युक्त हरिण, तुम्हारी देह की सुषमा को देखकर और अपने ही कुल का व्यक्ति समझकर तुम्हारे निकट आते हैं, देखो ।

सुन्दर 'कुरा' पुष्पों एवं उनके आस-पास फैले हुए 'पिडुवु' वृक्ष के पुष्पों की राशियों में सोकर उठनेवाले एक मयूर की देह-गंध को पाकर उसकी मयूरी, यह सोचकर कि उसने अन्य किसी मयूरी की संगति की है, उससे रूठ गई है, यह दृश्य भी देखो ।

हे अरुंधती के समान (पतिव्रता) ! अमृत से भी अधिक मनोहर । अशोक पुष्पों पर 'शेरुन्दि' के स्वर्ण के रंगवाले पुष्प पड़े हैं और उनपर भ्रमर-कुल मत्त हो रहते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है, जैसे सोने के टुकड़ों पर कोयले डालकर (नाली से) हवा फूँकी जा रही हो और उससे अग्नि की ज्वाला ऊपर उठ रही हो, यह दृश्य भी देखो ।

हे उभरे हुए स्तनोंवाली ! चित्र के लिए असाध्य सौंदर्यवाली ! देखो, एक मयूर 'कादल' पुष्प की कली को ध्यान से देखकर उसे कोई सर्प समझ लेता है और उसे अपनी चोंच में उठा लेता है, यह दृश्य देखकर मधु-पूर्ण कुंदपुष्प हँस पड़ते हैं।

पर्वत पर निवास करनेवाला व्याघ्र-शावक, घने अंधकार-जैसे हाथी के बच्चे और गाय के बछड़े, अपना सहज बैर छोड़कर एक साथ खेल रहे हैं, यह दृश्य देखो ।

अयोध्याकाण्ड २४५

हे अगरु के धूम से सुवासित केशोंवाली ! जलाशयों के तट पर अलकार के योग्य आभरण-जैसे पुष्पों से लदे हुए पौधे (हवा के झोंके से) श्वेत रेशमी वस्त्र जैसे जल में निमग्न होते हुए ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं, जैसे मृदु स्तनोंवाली युवतियाँ ही स्नान कर रही हों।

हे धनुष समान सुन्दर भ्रुकुटिवाली ! भ्रमर-बालक, बढ़े हुए पुष्पों में छेद करके उनके भीतर जाने का प्रयत्न न करते हुए 'कांगु' वृक्ष के चारों ओर स्थित पुष्पों पर चढ़कर सो रहे हों, वे ऐसे लगते हैं, जैसे स्वर्ण के फलकों पर जड़े नील रत्न हों; यह दृश्य भी देखो।

अपने मुँह में अधिक मधु को भर लेने के कारण आँख खोलकर नहीं देख सकने से, शीघ्र जाने का मार्ग नहीं देख पाते हुए, अंधे के जैसे हिलते-डुलते हुए जानेवाले बड़े भ्रमर, आगे-आगे जानेवाली भ्रमरियों को ही अपना नेत्र बनाकर जा रहे हैं।

हे हंस-तुल्य मृदु गतिवाली ! स्वर्णमय पुष्पों से लदी 'वेंगे' वृक्ष की अनेक शाखाएँ, कन्याओं के शृंगार करने की रीति का अभ्यास-सी करती हुई, तुम्हारे अलक से शोभायमान ललाट के ऊपर अपने नव मृदुल पुष्पों को लगा रही हैं, मानों वे (अपने पुष्पों को) बरसा रही हों।

हे अप्सराओं से भी अधिक सुन्दरी ! सुगंधित मंद मारुत के बहने से पुष्प-पुंजों का मकरंद पत्थरों से भरे कानन में इस प्रकार बिखरा पड़ा है, जिस प्रकार तुम्हारे मुक्ताहार से शोभित स्तन-तटों पर दाग१ फैले रहते हैं।

इन घने वृक्षों ने, मानो यह सोचकर कि तुम्हारे मृदुल चरण पत्थरों पर चलने के अभ्यस्त नहीं हैं, मार्ग-भर में पुष्पों को बिखेर रहा है, देखो। हे कोकिल-समान मधुर-भाषिणी ! अपनी शाखाओं में सुगंधित पुष्पों से भरी हुई लताएँ तुम्हारी डमरु-सदृश कटि की समता नहीं कर सकती।

हे करवाल-सदृश नयनोंवाली ! तुम्हारे कमल-सदृश चरणों तथा तुम्हारे चरण-तुल्य पल्लवों पर मँडरानेवाले इन भ्रमरों को देखो। सर्वत्र अंधकार फैलानेवाले तुम्हारे सुगंधित केशों के समान इन मेघों को देखो। तुम्हारे कंधों के समान इन कोमल बाँसों को देखो।

हरिणों, मयूरों तथा कोकिलों के संचरण से युक्त वह वन, विविध पुष्पों से भरी शाखाओं से पूर्ण है। यत्र-तत्र पक्षिगण हैं। विविध लताएँ सुन्दर ढंग से फैली हैं। अग्नि के वर्ण (के पल्लवों) से युक्त हैं। अतः, यह वन विविध चित्रकारी से युक्त यवनिका के समान दिखाई पड़ता है।

स्वर्ण-आभरणों से भूषित पुष्ट कंधोंवाले राम, यौवन से परिपूर्ण सीता से ये वचन कहते हुए, मधुर विहार-से करते हुए वन-मार्ग पर चले जा रहे थे। तब सूर्य पश्चिम दिशा में जा पहुँचा। तब दूर में चित्रकूट पर्वत को देखकर राम कह उठे, दोनों कर्म को जीतने-वाले मुनियों का निवासभूत पर्वत यही है।


१. यौवनवती नारियों के स्तनों पर कुछ दाग-से फैले रहते हैं जिनको तमिल में 'तेमल' कहते हैं। तमिल के प्राचीन साहित्य में यत्र-तत्र इसका वर्णन हुआ है।—अनु०

२४६ कम्ब रामायण

उस समय, प्रेम की उमंग से युक्त भरद्वाज मुनि यह समझकर कि चिरकाल से की गई अपनी तपस्या आज फलीभूत हो रही है, जन्म-व्याधि के लिए औषध-समान राम का स्वागत करने के लिए सम्मुख आये।

वे (भरद्वाज मुनि) छत्रधारी थे। दीर्घ दंडधारी थे। कमंडलु से युक्त थे। अधिक जटा से शोभायमान थे। मनोहर वल्कल वस्त्र पहने थे। मार्ग पर इस प्रकार चलते थे कि उनके कारण अन्य प्राणियों को कुछ कष्ट न हो। उनकी जिह्वा पर चारो वेद नर्त्तन करते थे।

प्रतिदिन रक्तवर्ण अग्नि को प्रज्ज्वलित करनेवाले थे। चतुर्मुख के द्वारा सृष्ट सब प्राणियों को अपने प्राणों के समान सुरक्षित करनेवाली शीतल करुणा से परिपूर्ण थे। वे ऐसी महिमा से संपन्न थे कि विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न न होने पर भी सप्त लोकों की सृष्टि कर सकते थे।

उन महर्षि के आने पर अनघ (रामचन्द्र) ने पुष्यो का अर्घ्य देकर तीन बार उनको प्रणाम किया। उन उत्तम महर्षि ने राम को गले से लगाकर कहा—हाय ! तुमको यह (मुनि का) वेष धारण करना पड़ा और मन से पीड़ित होकर नेत्रों से आँसू वहाने लगे।

फिर मुनिवर ने राम से पूछा—शत्रुओं के विनाशक हे वीर ! इस अवस्था मे ही तुम सारे संसार का शासन करने की क्षमता रखते हो। ऐसे कार्य को छोड़कर हम जैसे मुनियो के आवासभूत वन मे अपने लिए अनुपयुक्त वेष धारण करके, अनुज-सहित आये हो। इसका क्या कारण है ?

फिर, राम के द्वारा सारा वृत्तान्त कहे जाने पर उन उत्तम तपस्वी ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा—अहो ! इस अवस्था में ऐसा घटित हुआ यह विधि का दुष्कृत्य है। इस विशाल धरती का दुर्भाग्य है (कि तुम राजा नही वने)।

मेरे मित्र (दशरथ) ने पहले यह कहकर कि अरुण मुखवाली तथा मधुरभाषिणी सीता के साथ तुम जल-पूर्ण समुद्र से आवृत इस धरती का शासन करो, पुनः किस प्रकार तुम्हारे जैसे अपने अनुपम पुत्र को अरण्य में जाने की आज्ञा दी और यों आज्ञा देकर वे कैसे जीवित रह सके ?

'सुख और दुःख दोनो परिवर्तनशील होते रहते हैं'—यह नियति है। इनके कारण हमारे पूर्वजन्मकृत पुण्य-पाप होते हैं। अतः, अब मेरे दुःखी होने से कुछ लाभ नहीं है।—यों विचार कर वे (भरद्वाज महर्षि) शांत हुए और पुनः राम का आलिंगन कर उन्हे अपने आवास मे ले चले।

उन पवित्र मुनिवर ने अपने आश्रम मे जाकर उनका यथोचित सत्कार किया। उत्तम फल और कंद भोजन के लिए दिये और मधुर वचन कहे। यों अपने प्राण-सदृश पुत्र-जैसे उन (राम, लक्ष्मण और सीता) के प्रति प्रेम दिखाया, जिससे वे तीनो बहुत आनंदित हुए।

वे तीनो उस आश्रम मे सुख से रहे। तब भरद्वाज महर्षि ने यह सोचकर कि इन रामचन्द्र के सग रहने मे मै तर जाऊँगा, सब प्रकार से सत्कार करके फिर प्रभु के मुख