कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ कंब रामायण
छेदवाले वंशी की ध्वनि के समान, तंत्रियों से युक्त वीणा के नाद के समान, पीले मधु के समान और इक्षु-रस के खंड के समान माधुर्य से युक्त तोते की-सी बोलीवाली सीता के नयनों के जैसे लगनेवाले और खेतों को निरानेवाले किसानों के द्वारा खेतों से उखाड़कर फेंके गये कुवलय पुष्पों के पुंज को राम ने देखा।
'इसके द्वारा ढोये जानेवाले ये कुङ्कुमों से युक्त दो स्वर्ण-कलश हैं, अथवा मद-भरे गज के दंत-युगल हैं,' ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले स्तन-युगल से युक्त, मेघ-समान केशोंवाली सीता, पर्वताकार कंधोंवाले राम के संग बड़े आनन्द से, दुःख का लेशमात्र भी अनुभव नहीं करती हुई और मार्ग में, ईख पेरनेवाले कोल्हुओं (इक्षु-यंत्र) आदि को देखती हुई चली।
विविध शंखों से उत्पन्न मणियों से भरे, फैली हुई कमल-लताओं से शोभायमान जलाशयों से भरे एवं हंसों के विश्राम-स्थान बने हुए शीतल उद्यानों को, दोनों पार्श्वों में शंखकीटों से युक्त सैकत श्रेणियों को, विविध पुष्पों को बिखेरनेवाले वृक्षों से भरे वनों को तथा स्वर्ण को बहा लानेवाली नदियों को देखकर वे मन में आनन्दित होते हुए चले।
वहाँ के जलाशयों में, जहाँ बड़ी-बड़ी भैंसें धान की बालियों को चबाते हुए ऐसी खड़ी रहती थीं कि (उन बालियों का) रस उनके मुँह से बहकर उनकी टाँगों पर से होकर नीचे की ओर बहता रहता था, जहाँ (जलाशयों में) 'शेल' और 'कयल' (नामक) मछलियाँ इस प्रकार ऊपर उछल पड़ती थीं कि मधु-पूर्ण कमल पुष्पों में रहने-वाले भ्रमर (भयभीत होकर) झट ऊपर उड़ जाते थे, जहाँ युवतियाँ लाल टाँगोंवाले मत्त राजहंसों के समान स्नान करती थीं, ऐसे सुन्दर दृश्यों से युक्त उस कौशल देश को पार करके वे तीनों आगे चले।
सूर्य के समान उज्ज्वल आभरणों से युक्त वे तीनों खेतों और वृक्षों से पूर्ण 'मरुदम प्रदेश' (उपजाऊ भूमि) पारकर, विशाल वीचियों से युक्त उस गंगा नदी पर जा पहुँचे, जहाँ वेदों को जाननेवाले पाप-रहित मुनि रहते थे।
गंगा नामक उस दिव्य नदी पर रहनेवाले सब तपोधन मुनि आनन्द से यह कहते हुए कि 'हमारी शरण तथा लक्ष्य-भूत परमतत्त्व अब हमारे सम्मुख प्रकट हुआ है', सुन्दर नयनोंवाले रामचन्द्र के दर्शन के लिए जा पहुँचे।
वे मुनि चिन्तन करके कहने के लिए असाध्य माधुर्य से परिपूर्ण तथा स्वर-रूप वेदों के द्वारा प्रतिपादित अमृत-स्वरूपी (राम) को अपने चर्म-चक्षुओं से देखकर इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए, जिस प्रकार उन (मुनियों) से भिन्न लोग (अर्थात्, सांसारिक व्यक्ति) स्त्रियों के पास इन्द्रिय-सुख पाकर प्रसन्नचित्त होते हैं।
बाँस के दण्डों को धारण करनेवाले उन मुनियों ने उज्ज्वल कमल-समान नेत्रोंवाले राम को, अपने नयन-पुटों से, समुद्र में उत्पन्न दिव्य माधुर्य से युक्त अमृत जैसे पिया। आगे जाकर उनका स्वागत करके एवं मधुर गानों से उनकी स्तुति करके आनन्दित हुए।
घर से भागे हुए अपने पुत्र को ढूँढ़-ढूँढ़कर भी कहीं न पाकर दिन-भर दुःखी रहनेवाले माता-पिता अपने सम्मुख उस पुत्र के आ जाने पर जिस प्रकार आनन्दित