भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

अयोध्याकाण्ड २३५

उनके हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गये और वे मूच्छित होकर गिर पड़े। उनके महान् शोक का वर्णन करना हमारी शक्ति के परे है। प्रत्येक व्यक्ति के प्राणों के निर्गमन के लिए एक समय निश्चित होता है। अतः, वैसा गंभीर दुःख होने पर भी उनके प्राण शरीर को छोड़कर कैसे निकल सकते थे ?

वे चक्रवर्त्ती की कुछ सेवा नहीं कर सके। वन को गये हुए राम के साथ रहकर उनकी कुछ सेवा नहीं कर सके। दुस्सह दुःख-रूपी कारागार में बंदी होकर वे तड़प रहे थे; तब अपूर्व तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ मुनिवर ने उनको, यह कहकर कि मैं भी तो अपवाद से डरकर इन प्राणों को रखे हुए हूँ और इस शोक का अनुभव कर रहा हूँ, और कई प्रकार से समझाकर उन्हें शांत किया।

मुनिवर की आज्ञा से जलमध्य-स्थित वडवाग्नि से डरकर वेला को न लाँघनेवाले-समुद्र के समान, नगर के लोग दुःख-सागर में निमग्न ही रहे। अब हम, उदारगुण पिता की आज्ञा, 'देवों के सुकृत' से, अर्धरात्रि में वन-मार्ग पर चलनेवाले दृढ़ धनुर्धारी राम के कार्यों का वर्णन करेंगे। ( १-८७ )


अध्याय ६

गंगा पटल

'इनके शरीर का रंग अंजन-सा है, या मरकत-समान है, अथवा तरंगों से पूर्ण समुद्र-जैसा है, या वर्षाकालिक मेघ-समान है ?' ऐसा सन्देह उत्पन्न करनेवाले अनुपम तथा अनश्वर सौंदर्य से युक्त रामचन्द्र, 'नहीं है' ऐसा कहने योग्य कटि से युक्त अपनी पत्नी तथा अपने अनुज के साथ इस प्रकार चले कि सूर्य की कांति उनके शरीर से फूटनेवाली किरणों में अदृश्य होने लगी।

भ्रमरकुल-समान और अनुपम काली मिट्टी के समान घने केशोंवाली, क्षीरसागर में उत्पन्न अमृत-जैसी मृदु-मधुर बोलीवाली, पूर्ण तपस्या के समान व्यापारों से युक्त, आकाश (शून्य)-जैसी कटिवाली सीता के साथ, वृषभ-जैसी गतिवाले रामचन्द्र ने मस्त हंसों तथा हंसिनियों के विहार को देखा।

( मन्मथ के ) पंच बाणों तथा राम के तीक्ष्ण बाण को भी परास्त करनेवाले तथा विष को जीतनेवाले नयनों से युक्त सीता ने देखा कि रामचन्द्र के चरण, रेखावाले मत्त भ्रमरों की गुंजार से भरे कमलपुष्पों का उपहास कर रहे हैं।

अत्यन्त सुगंध और मकरंद से भरे अलकों से युक्त चन्द्रखंड-सदृश ललाटवाली (सीता) के साथ प्रवाल-समान अधरवाले रामचन्द्र इस प्रकार चले, जैसे उज्ज्वल आभरणों से भूषित कोई मेघ, बिजली के साथ आ रहा हो या कोई मत्तगज, करिणी के साथ आ रहा हो।