कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ | कब रामायण
वे दूत केकय-महाराज के सुन्दर नगर की ओर चल पड़े। अपूर्वज्ञान तथा तपस्या से सम्पन्न वसिष्ठ ने सेनापतियों में एक चतुर व्यक्ति को देखकर कहा कि तुम आवश्यक राज्य-कार्य पूर्ण करो। फिर, अपने कुल-धर्म के अनुष्ठान के योग्य स्थान मे जा पहुँचे। अब हम उस प्रजा की दशा के संबंध मे कहेगे, जो राम के साथ (अरण्य मे) जाकर निद्रामग्न हुई थी।
सहस्र उज्ज्वल किरणो से युक्त सूर्य, मानो यह कहता हुआ कि 'उत्तम गुणवान् पुत्र दशरथ स्वर्ग मे पहुँच गया, उनके (चारो) पुत्र नगर से बाहर कही रहते है, उन पुत्रो (भरत और शत्रुघ्न) के आने तक मै ही इस नगर की रक्षा करूँगा'—प्रकाशमय रथ पर आरूढ होकर उज्ज्वल कर-रूपी करवाल लिये हुए प्रकट हुआ। तब मत्स्यों से पूर्ण समुद्र ने नगाड़े बजाये। देवताओ ने स्तुति-पाठ किया, ससार के लोगो ने वन्दना की।
राम के पीछे-पीछे आये हुए लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे कि उतना दुःखी अन्य कोई नही हुआ था, बेसुध होकर निद्रा मे डूबे थे और यह सोचकर कि उदारगुण (राम) वहाँ रहते हैं, उसी स्थान मे ठहरे हुए थे, सब इस समय जग पडे। फिर, करुणा से पूर्ण विशाल कमल-सदृश नयनोवाले घनश्याम राम को कही न देखकर विकल हुए और यह कहकर कि कभी न बद होनेवाले हमारे नेत्रो ने आज बद होकर हमे धोखा दिया, दुःखी होकर धरती पर लोट गये।
वे लोग राम का अन्वेषण करने के लिए आठो दिशाओ में दौड़ते, किन्तु मार्ग-मध्य गिर पड़ते। यह कहते कि अहो। हमारे प्रभु हमे दुःख के समुद्र मे निमज्जित करके चले गये। उन्होने कितना क्रूर कार्य किया है। वह घना दंडकारण्य इसी धरती पर है, अपनी बुद्धि से हम उसे ढूँढ़कर पहचानेगे। हम यो चुप पडे नही रह सकते। हम उस वन की ओर गये हुए रथ के चक्रो के चिन्हो को पकड़कर आगे चलेंगे।
रथ के चक्रो के चिह्न को खोजते हुए जानेवाले लोगो ने रथ के चिन्हो को अयोध्यानगर की ओर लौटते हुए देखा। उससे उनके प्राण स्वस्थ हुए। वे सोचने लगे कि डरने की आवश्यकता नही। प्रभु अयोध्या पहुँच गये हैं। इस पर आनदित होकर वे यो घोष कर उठे, जैसे वज्रयुक्त आकाश और समुद्र एकत्र होकर शब्द कर उठे हो।
उन नगरवासियो ने विचार किया—वसन्त के साथी मन्मथ के रूप-गर्व को मिटानेवाले राम अयोध्या को लौट गये हैं। उनकी दशा इस प्रकार हुई, जैसे फुफकार करनेवाले सर्प के भयकर वक्र दंत के दंश से (उनके शरीर मे) बढे हुए विष को दूर करने का अपूर्व औषध, 'अमृत' उन्हे मिल गया हो और उससे उनके प्राण स्वस्थ हो गये हो।
ज्यो-ज्यो वे मार्ग मे बढते जाते थे, त्यो-त्यो उस रथ के चक्रों का ही चिह्न देखते थे। नगर से इतर अन्य किसी दिशा मे उन चिन्हो को न देखकर वे उत्तरोत्तर बढनेवाले आनन्द से भरकर अपने अयोध्यानगर मे उसी प्रकार पुनः आ पहुँचे, जिस प्रकार समुद्र प्रलय-काल में अपनी सीमा को पारकर ससार-भर मे वह चलता है और पुनः अपनी सीमा के अन्दर आ पहुँचता हैं।
नगर मे पहुँचने पर उन लोगो ने सुना कि चक्रवर्ती स्वर्ग सिधार गये। यह समाचार भी सुना कि दशरथ के स्वर्गवास करने का कारण राम का वन-गमन ही है। तब