कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २३३
उन्होने अपने प्राणो के साथी को मृत पड़े हुए देखा, तो वे भय के कारण विष-पान किये हुए व्यक्ति के जैसे कंपित हो उठीं। उन्होने अपने मन मे ठान लिया कि निष्कलंक गुणवाले दशरथ का अनुसरण करके देवलोक मे जाना ही उत्तम हैं। इसलिए, भय और व्याकुलता के उत्तरोत्तर बढ़ते रहने पर भी वे मूर्च्छित हो नही गिरी (अर्थात्, दशरथ का सहगमन करने का दृढ निश्चय करके धीरता के साथ खड़ी रही) अहो ! क्या प्रेम से भी बढ़कर कठोर वस्तु कुछ है ?
कलंकहीन चन्द्र-जैसे मुखवाली वे देवियाँ ऐसी खड़ी थी कि समुद्र से आवृत्त धरती में, देव-लोक में, उससे परे स्थित अन्य लोको में भी पातिव्रत्य से युक्त स्त्रियो मे इन देवियो से बढ़कर कोई नहीं थी। अरण्य की किसी नदी की धारा से पर्वत के घिर जाने पर, उसके शिखर के अंचल पर एकत्र होनेवाले मयूरो के समूह के समान उन देवियो का समूह स्थिर खड़ा था।
अपने पुत्र से वियुक्त होकर तथा अत्यन्त पीडाजनक कड़वे वचनों से अपने प्राण त्यागकर भी अन्त तक सत्य पर दृढ रहनेवाले चक्रवर्त्ती की देह को वे स्त्रियाँ पकडे हुए रो रही थी। वे ऐसी थी, मानो मोहजनक माया-रूपी मकरो से भरे जीवन-रूपी समुद्र के पार (एक व्यक्ति को) पहुँचाकर लौटी हुई नौका मे स्वयं भी जाने का प्रयत्न कर रही हो ?
इस प्रकार जब साठ सहस्र देवियाँ रो रही थी तथा निष्कलंक गुणवाली कौशल्या तथा सुमित्रा विकल हो मूर्च्छित पड़ी थी, तब रत्नमय रथ का सारथ्य करनेवाले सुमन्त्र ने जाकर मुनिवर (वसिष्ठ) को दशरथ की दशा का समाचार दिया। वे वेदज्ञ मुनि तुरन्त आये और विधि के विधान के बारे मे सोचते हुए दुःख-मग्न हो रहे।
मुनिवर यह सोचकर कि हमारे चक्रवर्ती वर देकर पुत्र से वियुक्त होने के दुःख से अब मुक्त हो गये, चिन्तित हुए। तरंगो से क्षुब्ध सागर में किसी नौका के टूट जाने और उस नौका के नायक के मर जाने पर किंकर्त्तव्यविमूढ हो रहनेवाले पतवार चलानेवाले व्यक्ति के समान वे (किंकर्त्तव्यविमूढ़) हो रहे।
सस्कारादि क्रियाएँ सम्पन्न करने के लिए यहाँ कोई पुत्र नही है। जो घटित होना है, वह अवश्य घटित होगा ही। अब क्या किया जाय ? यो विचार करके फिर यह निश्चय किया कि भ्रान्ति मे पड़ी क्रूर कैकेयी के पुत्र (भरत) के आने पर सब अन्तिम क्रियाएँ पूर्ण करेंगे और स्त्रियो के समुद्र-मध्य पडे दशरथ के शरीर को तेल के समुद्र मे निमज्जित करके रखा।
राजा की पत्नियो को देखकर वसिष्ठ ने कहा—जिस दिन इन (चक्रवर्त्ती) के अन्तिम सस्कार किये जायेगे, उस दिन इनकी देह का आलिंगन करके रक्तवर्ण अग्नि-ज्वाला मे अपने प्राण छोड़ना। यो उनको वहाँ से हटाकर दोनो पट्टमहिषियो (कौशल्या और सुमित्रा) को कलंकहीन प्रासाद मे भेजा। फिर, संदेशवाहको को यह कहकर कि 'शीतल पुष्पमालाओ से भूषित भरत को जाकर ले आओ', और यह लिखकर कि 'यह चक्रवर्त्ती की आज्ञा है'—भेज दिया।