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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 549 में से

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पृष्ठ 242
२३२कंब रामायण

जिनको कुछ कमी नहीं थी, ऐसे दशरथ हम पर कृपाहीन होकर अब हमें छोड़कर चले गये। मृत्यु के कारणभूत किसी व्याधि के बिना ही मर गये। यों कहकर वे (कौशल्या) इस प्रकार तड़पकर गिरी, जैसे आकाश से वर्षा के न गिरने से किसी सूखनेवाले जलाशय में रहनेवाली मछली तड़पती हो।

जो पुत्रवान् होते हैं, उनका एक ही सुख नहीं, अनेक सुख मिलते हैं। वे अपने पितरों को नरक से मुक्त करते हैं। इस लोक में अपने माता-पिता के जीवन की रक्षा करते हैं। जो पुत्र पाकर जीवन व्यतीत करते हैं, उनको कोई विपदा उत्पन्न नहीं होती। किन्तु मेरा पुत्र (राम) तो यहाँ आकर यह नहीं कह रहा है कि तुम डरो नहीं, (इसके विपरीत) वह अपने पिता की मृत्यु का कारण बन रहा है। यों कहती हुई कौशल्या कातर होकर बिलखने लगीं।

हाय ! दशरथ को, किसी व्याधि से या युद्ध में भाले, करवाल आदि शस्त्र से मृत्यु नहीं मिली। किन्तु अपने जाये पुत्र से ही मृत्यु प्राप्त हुई (अर्थात्, अपना प्यारा पुत्र ही मृत्यु का कारण बना)। अहो, केकड़ा, मोती की सीप, फल देनेवाले केले का पेड़ और बाँस के जैसे दशरथ भी (अपने जाये पुत्र के कारण ही) मृत्यु-ग्रस्त हो गये। यों कहकर वह मूर्च्छित हो गिरी।

मेघ के मध्य कौंधनेवाली बिजली के समान दशरथ के वक्ष पर गिरकर बिलखनेवाली कौशल्या कहने लगी, मनोहर दीर्घ केशों से युक्त कैकेयी ! बुद्धि की चातुरी से तुमने राज्य प्राप्त किया। अपरिवर्तनीय वचन तुमने प्राप्त किये। तुमने एक साथ अपने सारे मनोरथ पूर्ण कर लिये, अहो !^१

अनुपम गजराज से वियुक्त होकर, गहरे प्रेम के कारण विकल होनेवाली हथनी के समान कौशल्या कहने लगी—हे राजन् ! तुमने पूर्वकाल में एक अपूर्व रथ में बैठकर शंबरासुर के युद्ध में उसे निहत किया था। तुम्हारी कृपा से देवता लोग सुखी हुए थे। आज तुम स्वयं उन (देवों) के अतिथि बन गये।

वह कौशल्या, जिन्होंने राम को जन्म दिया था, जिससे देवता लोग भी श्रुति (अर्थात्, वेद) के सारभूत परमपुरुष के दर्शन कर सके, कहने लगी—हे राजन् ! तुम क्या अपने पूर्व अनुष्ठित यज्ञों के फल भोगने के लिए गये हो ? या सत्य का व्रत लेने से उत्पन्न निःश्रेयस् का अनुभव करने के लिए गये हो ? या श्रेष्ठ मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म-मार्ग पर चलने से प्राप्त परमसुख का अनुभव करने के लिए गये हो ?

जब चक्रवर्ती की पत्नियों में पट्टमहिषी कौशल्या इस प्रकार के वचन कह-कहकर विलाप कर रही थी, उसी समय, उनकी सहेली जैसी सुमित्रा भी विकलता से रोती हुई बेसुध पड़ी रही। सारे अन्तःपुर में ऐसी दशा थी, जैसे युगान्त आ गया हो। आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली (दशरथ की) अन्य देवियों भी आकर एकत्र हो गईं और बड़ा कातर शब्द करके रो पड़ीं।


१. अन्तिम पंक्तियों में यह भाव ध्वनित हुआ है कि अपने पति को मारने की तुम्हारी इच्छा भी पूरी हो गई।