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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

अयोध्याकाण्ड २३१

पाँच घड़ी के अन्दर वह (सुमन्त्र) प्राचीरों से सुरक्षित अयोध्यानगर में आ पहुँचा और जाकर कुलगुरु (वसिष्ठ) के चरणों पर नत हुआ। वे मुनिवर भी सब वृत्तांत सुनकर व्यथित-चित्त हुए और भविष्य को जानकर बोले—हाय! चक्रवर्त्ती के प्राण अब गये।

मुनिवर यह कहते हुए कि उदारगुण दशरथ स्थायी रहनेवाले अपवाद के डर से (राम को) रोक नहीं सके। धर्म की रक्षा करनेवाले राम ने मेरे कथन को भी माना नहीं। नियति को कौन जीत सकता है? इस प्रकार रोते हुए वे सुमंत्र के साथ गज-प्रासाद में गये।

मन्त्रिगण यह सोचकर कि राम रथ पर लौट आये हैं—चन्द्र के चारों ओर परिवेषण के समान दशरथ को घेरकर आये। किन्तु वहाँ राम को न देखकर और अजस्र अश्रु धारा बहानेवाले सुमंत्र की दशा को देखकर अपने आनन्द को भूल गये।

'रथ आ गया'—यों वहाँ के सब लोग बोल उठे। उसे सुनकर और यह सोच-कर कि राम आ गये, दशरथ मूर्च्छा से उठे। कमल-समान अपने नेत्र खोलकर देखा। फिर अपने सम्मुख महान् तपस्वी (वसिष्ठ) को देखकर उनसे पूछा—क्या महावीर (राम) लौट आया?

मुनिवर, 'नहीं आये' कह सकने में असमर्थ हो अत्यंत विकल होकर चुपचाप रहे। सद्गुणों से पूर्ण मुनिवर का मुख सूचित कर रहा था कि राम नहीं लौटे। तब दशरथ फिर मूर्च्छित हो गये। मुनिवर दुःखी होकर यह कहते हुए कि मैं चक्रवर्ती की पीडा को नहीं देख सकता, वहाँ से दूर हट गये।

तब चक्रवर्त्ती ने अपने सारथि को देखकर पूछा—मेरा वत्स (राम) दूर है या समीप में है? उत्तर में सुमंत्र ने ज्योंही यह कहा कि वे उनके अनुज तथा मिथिला में उत्पन्न लक्ष्मी-सदृश देवी तीनों सीधे बढ़े हुए बाँसों से भरे वन में गये, त्योंही दशरथ के प्राण भी शरीर को छोड़कर निकल गये।

उस समय, उस स्थान पर, इन्द्र आदि सब देवता आकर एकत्र हुए और यह सोचकर आनन्दित हुए कि हमारे पिता (विष्णु) के पिता हमारे निकट आनेवाले हैं। उन्होंने रुद्र समान एक अनुपम विमान में उन (दशरथ) को बिठाकर, नारायण के नाभि-कमल में उत्पन्न ब्रह्मा के लोक से भी ऊपर स्थित उस (वैकुंठ) लोक में पहुँचाया, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती।

उत्तम कुलजात मयूर-सदृश कौशल्या, दशरथ की दशा को देखकर आशंकित हुई और उनकी देह का स्पर्श करके देखा। तब यह जानकर कि इनके प्राण निकल गये, देह स्पन्दन-हीन हो गई है, अत्यन्त व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ी और यों तड़प उठी, जैसे कोई अस्थिहीन कीड़ा, कड़ी धूप में पड़कर तड़प उठा हो।

वह कौशल्या, जिन्होंने ब्रह्मा प्रभृति सारी सृष्टि के कारणभूत विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने का बड़ा सुकृत किया था, अब पति के वियोग से इस प्रकार विकल होकर विलाप करने लगीं जैसे चन्द्रमा ने अमृत को खो दिया हो, जैसे कोई नाग अपने माणिक्य को खोकर मूर्च्छित हुआ हो और जैसे क्रौंची अपने साथी को खोकर रो पड़ी हो।