कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३० | कंब रामायण |
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तथा उस शत्रुघ्न को भी अपना अनुज नहीं मानता हूँ। मैं केवल एकाकी ही जन्मा हूँ। मेरा बल किंचित् भी कम नहीं है।
इस समय आर्य (राम) ने अपने भाई को देखकर कहा—हे तात ! ऐसे अशोभनीय वचन कहना उचित नहीं। तब सारथि अपने मन में व्यथित होकर धरती पर गिरकर उनको प्रणाम करके रथ की ओर बढ़ा।
सुमन्त्र ने रथ-रूपी यन्त्र को ठीक किया। उसमें घोड़े जोते। सबकी दृष्टि में साफ दिखाई देनेवाले मार्ग से अपने रथ को लौटाकर ले चला। उसने निपुणता से रथ को ऐसे चलाया कि कोई भी व्यक्ति निद्रा से नहीं जग सका।
उस अर्धरात्रि में, प्रभु (राम) भी देवी का पातिव्रत्य, अपनी उदारता, कलंक-हीन कृपा, विवेक, सत्य, कार्य में निपुण अपने धनुष तथा अनुज (लक्ष्मण), इन सबको साथ लेकर चल पड़े।
तब दिव्य प्रकाश से युक्त चन्द्रमा ऐसे उदित हुआ, मानो मायावी जीवन व्यतीत करनेवाले राक्षसों का साथी बनकर उनके क्रूर कार्यों में सहायता देनेवाले तथा राम-लक्ष्मण के (वन-गमन में) विघ्न-सा बने हुए, अंजन सदृश अंधकार को भगाने के लिए आकाश ने अपने हाथ में दीपक ले लिया हो।
वह अनुपम शीतल चंद्रमा इस प्रकार प्रकाशित हुआ, जैसे उस धर्मदेवता का प्रसन्न मुख हो, जो उसके प्राणों का विनाश करनेवाले पाप को मिटाने में समर्थ, वज्र-सदृश धनुष से युक्त राम-लक्ष्मण को वन-गमन के लिए सहमत करनेवाले सुकृत का विचार करके बड़ी प्रसन्नता से उन (राम-लक्ष्मण) के दर्शनार्थ वहाँ आया हो।
ऊँचे बढ़े हुए बाँसों से युक्त उस वन में पैदल चलनेवाले राम की दुःख-दशा को देखकर, दुःखी होकर ही मानो रक्त-कमल सुकुलित हुए थे। कुवलय-पुष्प भी सर्प के सिर का रूप धारण कर पीड़ित हो झुके थे। अब दूसरे पुष्पों के बारे में कहने की आवश्यकता ही क्या है ?
चन्द्रमा अपनी चंद्रिका फैला रहा था, मानो इस विचार से कि धनुष जैसी भौंहो-वाली (सीता) के मृदुल चरणों को चलने में क्लेश न हो। उसने कानन में सफेद रूई बिछा दी हो। उस प्रकाश में अंजनपर्वत-सदृश सुन्दर पुरुष (राम) तथा वह कनिष्ठ भ्राता—जो ऐसा था, मानो प्रभु (राम) को उत्तम स्वर्ण के आवरण से आवृत्त कर रखा हो—धीरे-धीरे पग बढ़ाते हुए चले।
क्षीण कटि से पीन स्तनों का भार वहन करनेवाली, लक्ष्मी कहलानेवाली तथा घने केश-भार से युक्त सीता, जल के बुद्बुदों से भी अधिक मृदुल अपने छोटे चरणों को रखती हुई रामचन्द्र के पीछे-पीछे चली। क्या कलंक-रहित प्रेम से भी बढ़कर दृढ़ कोई वस्तु हो सकती है ?
सूर्य के उदयाचल पर आने के पूर्व, लक्ष्मी के पति (राम) दक्षिण दिशा में दो योजन दूर चले गये। अब उस सुमन्त्र के संबंध में कहेंगे, जो निर्भर-जैसे बहते नयन, आहत मन तथा अकेलापन साथ लिये तीव्रगामी अश्व-जुत रथ पर चला था।