कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २२६
अतः, मेरे प्रति उनकी जैसी कृपा है, वैसी ही कृपा उस (कैकेयी अथवा भरत) पर भी रखे।
तुम यहाँ से लौटकर महान् तपस्वी (वसिष्ठ) के साथ राजप्रासाद में जाओ और मेरे पिता के अपार दुःख को शांत करने का उपाय करो। उन चक्रवर्ती की कृपा मेरे उस भाई (भरत) पर भी बनी रहे, ऐसा उपाय करो—यही मेरी प्रार्थना है।
मुखपट्ट से भूषित, मदस्रावी हाथियों की सेना से युक्त चक्रवर्ती को वसिष्ठ के द्वारा मेरा यह सन्देश पहुँचा देना कि चौदह वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् मैं नगर को लौट आऊँगा और उनके चरणों को प्रणाम करूँगा। वे दुःखी न हों।
मेरी तीनों माताओं को क्रम के अनुसार मेरा प्रणाम पहुँचाना। फिर, चक्रवर्ती के दुःख को शांत करते हुए उनके निकट रहना—इस प्रकार राम ने, जो वेदों के लिए भी अज्ञेय हैं और अब वन में जाकर रहते हैं, सुमंत्र से कहा।
अनुपम महान् रथ को चलाने में समर्थ सुमंत्र ने, यह विचार कर कि दासता से विमुख होना एक सेवक का कर्त्तव्य नहीं है, राम के चरणों पर नत हुआ। फिर, यह सोचकर कि पूर्व कर्मों के कारण हमें दुःख भोगना पड़ता है, भाले-जैसे नेत्रवाली जानकी को नमस्कार करके उनकी ओर देखा।
तब सीता ने (सुमंत्र से) कहा—'चक्रवर्ती को तथा सासों को मेरा नमस्कार कहना। फिर, मेरी प्यारी बहिनों से कहना कि सोने के रंगवाली मेरी सारिका को और तोते को सावधानी से पाले।
सीता के वचन सुनकर, सारथि (वनवास से) अधीर न होनेवाली उन (सीता) के दुःख का विचार करके व्यथित हुआ, और यह कहता हुआ कि 'विपदा उत्पन्न होने पर उसे दूर करने में कौन समर्थ होता है और प्राण छोड़ना भी सुगम नहीं है'—पहले भीतर-ही-भीतर व्याकुल हुआ, फिर ऐसा रो पड़ा कि महावीर राम के समझाने पर भी वह शान्त नहीं हुआ।
सदा स्थिर रहनेवाले प्रेम से युक्त सुमंत्र, अपने दुःख से किंचित् शान्त-सा होकर राम को पुनः-पुनः नमस्कार करके उनसे विदा हुआ। फिर लक्ष्मण से उसने पूछा कि आपका क्या सन्देश है।
तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया—'जिन सत्यसंध ने, पहले मेरे भाई को राज्य देने का वचन देकर पुनः सारी संपत्ति को सुगन्धित केशोंवाली एक नारी को दे दिया, उनको चक्रवर्ती मानकर क्या अब भी कोई संदेश देना उचित होगा?
फिर भी, उन असत्यहीन चक्रवर्ती से, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र के वन में जाकर कंद-मूल खाते रहते समय, स्वयं राजोचित भोजन करते रहते हैं, यह कहना कि उनके शरीर में स्थित प्राण इस संसार को छोड़कर अभी तक स्वर्ग नहीं गये, अतएव मैं उनकी दृढ़ता की प्रशंसा करता हूँ।
उज्ज्वल करवालधारी राजा भरत से कहना—'मैं, राजा होने के अधिकारी मेरे-प्रभु (राम) का भाई (होने योग्य) नहीं हूँ (क्योंकि मैं अपने पिता से लड़कर उन्हें राज्य नहीं दिलवा सका)। राज्य का शासन करनेवाले उस भरत का भी भाई नहीं हूँ