कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ कंब रामायण
इस प्रकार अंतिम प्रार्थना करने पर भी सुमंत्र को वज्र का घोष ही (अर्थात्, मैं नहीं लौटूंगा) सुनाई पड़ा, जिससे अत्यंत व्याकुल होकर तड़पनेवाले सर्प के समान व्याकुल होकर सुमंत्र राम के चरणों को पकड़कर धरती पर लोट गया और विविध वचन कहकर रोने लगा।
तब उन राम ने, जो निग्रह करने योग्य इन्द्रियों तथा मन के लिए अगोचर, पर परिशुद्ध बुद्धि के लिए गोचर हैं, अपने विशाल हाथों से उठाकर उस सुमंत्र को गले लगा लिया और उसके अश्रुओं को पोंछकर पृथक् ले जाकर उससे कहा—
इस संसार में हमारा जन्म हुआ है। उस (जन्म) के साथ घटित होनेवाली सब बातों को, उचित बुद्धि से, सोचकर समझने की शक्ति तुम रखते हो। यह सोचकर कि विपदा उत्पन्न हुई है, क्या तुम असाधारण रूप से उत्पन्न होनेवाले अपयश को एवं धर्म के तत्त्व को भूल जाओगे?
श्रेष्ठ धर्म सब कार्यों से आगे रहकर यश को स्थिर बनाता है और मृत्यु के पश्चात् भी शाश्वत फल प्रदान करता है। ऐसे धर्म का आचरण करते समय, क्या यदि सुख हो, तो हम उसका आचरण करेंगे, पर यदि कष्ट हो, तो क्या उस (धर्म) को छोड़ देना उचित होगा?
शत्रुओं के उज्ज्वल शस्त्रों को वीरता के साथ अपने वक्ष पर सहन करना शूरता नहीं है। मृत्यु का भी सामना होने पर, अथवा सारी संपत्ति को खोने की आवश्यकता पड़ने पर भी, धर्म का परित्याग न करना ही शूरता है।
(शत्रुओं के) शरीर को भेदकर उसमें स्थित प्राणों के अपहारक भाले को धारण करनेवाले हे राम! यदि मैं वन-गमन से होनेवाले कष्टों का विचार करके नगर को लौट जाऊँगा, तो क्या वैवस्वत मनु का यह कुल, जिसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैली हुई है, धर्मच्युत नहीं कहलायेगा?
'आचरण के लिए दुस्साध्य सत्य का अनुसरण करनेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) ने अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज दिया—ऐसी'—प्रख्याति उन चक्रवर्त्ती के लिए एक तपस्या ही होगी और उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके वन जाना मेरे लिए भी तपस्या ही है। अतः, हे मेरे पितृ-तुल्य! तुम इससे दुःखी मत होओ।
(नगर में लौटकर) तुम पहले मुनिवर (वसिष्ठ) को नमस्कार करना और मेरे प्रणाम एवं मेरे वचनों को उन्हें सुनाना। उन मुनिवर से यह निवेदन करना कि वे स्वयं चक्रवर्त्ती के पास जाकर मेरा मनोभाव उनसे प्रकट करें।
मुनिवर के द्वारा ही मेरे भाई (भरत) को यह सन्देशा देना कि वह नीति-मार्ग पर दृढ़ रहकर वेदज्ञ ब्राह्मणों तथा स्वर्गलोकवासियों के लिए हितकारी कार्य करें तथा अपने आचरण से, मेरे वियोग में उत्पन्न सब लोगों के दुःख को दूर करे। फिर, रामचन्द्र ने सुमंत्र से कहा—
तुम (वसिष्ठ मुनिवर से) यह कहना कि इस समय मेरे मन को यह बात किंचित् भी पीड़ा नहीं दे रही है कि मेरी छोटी माता के कारण एक बड़ा दुःख मुझे उत्पन्न हुआ है।