कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २३७
होते हैं, उसी प्रकार वे मुनि (राम के दर्शन से) आनन्दित हुए और बड़े आदर के साथ अपनी तपस्या के योग्य आश्रमों में ले गये।
राम आदि के पथ-श्रम को मिटाने के लिए उन मुनियों ने अश्रु के नवीन जल से उन्हें स्नान कराया, अपने मधुर वचन-रूपी धनी पुष्प-मालाएँ पहनाईं तथा अक्षय प्रेम-रूपी भोजन कराया।
वे मुनि, अरण्य के स्वच्छ शाक, कन्द और फल ढूँढ़कर ले आये और राम आदि से प्रार्थना की, 'हे उत्तम! समीपस्थ गंगा में स्नान करके, अग्निहोत्र १ करके इन फलों का आहार करो।
राम ने स्त्री-कुल के लिए दीपक समान (सीता) देवी को अपने अरुण कर से पकड़े हुए, देवी के द्वारा प्रशंसित होते हुए, उस गंगा नदी में स्नान किया, जो (गंगा) पूर्वकाल में ब्रह्मदेव के द्वारा अपने कर से उत्पन्न जल से उन (राम) के (अर्थात्, विष्णु के एक अवतार त्रिविक्रम के) चरण के धोने से वह चली थी।
कभी विनष्ट न होनेवाली (गंगा) नदी ने, कर जोड़कर (राम से) कहा— संसार के लोग मुझमें स्नान करके अपने पाप दूर करते हैं; आज मैं, मुझे उत्पन्न करने-वाले तुम से (स्पर्श पाकर) सब पापों से मुक्त हो गई।
कठोर नयनोंवाले हाथी की सूँड़-जैसी भुजावाले, जटा से बहनेवाले श्वेत गंगाजल से युक्त, पातिव्रत्य से पूर्ण देवी (सीता) के देखते हुए स्नान करनेवाले वे (राम), विषधर सर्प को हाथ में (आभरण बनाकर) धारण करनेवाले, पातिव्रत्य से पूर्ण देवी (पार्वती) के देखते हुए नृत्य करनेवाले, श्वेत गंगाधारा से युक्त जटावाले तथा चन्द्रकला को शिर पर धारण करनेवाले शिव के समान लगत थे।
हिलनेवाले जल से भरी गंगा नदी की तरंगों के मध्य वे (राम) ऐसे लगते थे, जैसे रजत-समान श्वेत वर्णवाले (विष्णु) क्षीर-सागर में, लता-जैसी कटिवाली कमलवासिनी (लक्ष्मी) के संग, शयन से उठकर खड़े हुए हों।
अलक्तक (महावर) रस से अलंकृत मृदु चरणोंवाली, चित्र-समान सुन्दरी सीता ने स्नान (के लिए जल में प्रवेश) किया, तो उनकी कटि की सुन्दरता से परास्त होकर 'वंजि' नामक लता, लज्जा से जल में अपना मुँह छिपाने लगी। (उनकी) मंद गति से हारकर राजहंस दूर हट गये। उनके चरण-जैसे लगनेवाले कमल जल में अदृश्य हो गये। मीन वहाँ से हट गये।
महादेव के जटाजूट में रहकर भी जो गंगा नदी 'आक', 'पुन्नाग' आदि विविध पुष्पों की गंध से युक्त नहीं हुई थी, वह सुन्दर केशोंवाली सीता देवी के कुन्तल में स्थित कस्तूरी-गंध तथा सद्योविकसित पुष्पों की गंध से भर गई।
लहरों पर फेन के उठ-उठकर हिलते रहने से, श्वेत केशोंवाली स्त्री के समान लगनेवाली गंगा, (पातिव्रत्य धर्म में) प्रसिद्ध सीता को एकाकी देखकर स्वयं, धाई के समान अपने करों (अर्थात्, लहरों) को बढ़ाकर उसे स्नान कराने लगी।
१. औपासन-होम करना गृहस्थ का नित्य कार्य कहा गया है।