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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 549 में से

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पृष्ठ 248

२३८ कंब रामायण

सीता के दीर्घ केशपाश-रूपी मेघ-समुदाय खुलकर जल मे इस प्रकार विस्पदित हो रहे थे, जैसे गंगानदी के मध्य काले रगवाली यमुना नदी की धारा हो और उसमें अनेक भँवर दिखाई दे रही हो ।

भँवरों से युक्त, अनेक लहरो से भरी, शब्दायमान गंगा नदी की उस श्वेतधारा मे, जहाँ उन (सीता) की आँखों के जैसे मीन उछल रहे थे, स्नान करके सीता देवी जब जल से बाहर निकली, तब वे क्षीर-सागर में तत्काल (मथन-काल में) प्रकट हुई लक्ष्मी-सी लगती थी ।

पूर्वकाल मे गंगा नदी, विष्णु के अरुण कमल-समान चरण का स्पर्श करने से, सब लोगो के पापो को दूर करने की शक्ति से युक्त होकर प्रकट हुई थी । अब प्रभु के सारे शरीर का स्पर्श करने से क्या यह ससार कभी नरक मे जायगा ? (भाव यह है, गंगा नदी मे, राम के स्नान करने से ऐसी पवित्रता उत्पन्न हो गई कि अब ससार का कोई भी प्राणी नरक में नही जायगा ।)

राम, उस पवित्र जल में स्नान करके मुनियों के आवास मे पहुँचे । फिर, ज्ञानियो के ध्यान के विषयभूत परब्रह्म को नमस्कार करके प्रज्ज्वलित अग्नि मे होम किया । फिर, उन मुनियों के प्रेम के योग्य अतिथि बनकर भोजन स्वीकार किया ।

जिस विष्णु भगवान् ने बहुत कष्ट उठाकर अमृत उत्पन्न किया था और स्वयं उसे न पीकर देवो को दे दिया था, उसके अवतार राम ने, अब मुनियो के द्वारा दिये गये शाक-कंद का भोजन स्वीकार किया । अहो ! जिनका मन अत्यन्त शुद्ध है, उनके कार्य कभी त्रुटि-पूर्ण नही होते ।

उस समय सहस्र नौकाओ का अधिपति, दीर्घकाल से पवित्र गंगा मे नौका चलाते रहनेवाला, शत्रुध्वंसक धनुष को धारण करनेवाला, पर्वत के जैसे पुष्ट कंधोवाला, गुह नामक निषाद,---

पटह वाद्य से युक्त, श्वानो को पालनेवाला, अपने वडे-वडे पैरो में चमडे के जूत पहननेवाला, घनीभूत अधकार जैसे साकार हो गया हो--ऐसे रूपवाला, अपनी सेना के साथ इस प्रकार आया, जैसे जल-भरा मेघ ही समूल उठकर चला आया हो ।

उसकी सेना के लोग छोटे डडे से दुंदुभी को बजा रहे थे । 'पवे' नामक पटह-वाद्य बजा रहे थे । वह पल्लव-समान लाल रगवाले शरो को धारण करनेवाला था । अनेक नौकाओ का स्वामी था । मदस्रावी गडभागो से युक्त गज-यूथ के समान परिवार से घिरा था ।

कटि से जाँघो तक जाँघिया पहने हुआ था । गंगा की गहराई को जानने की महिमा से युक्त था । उसकी कटि से लाल रग का चर्म लटक रहा था । वह कटि में लपेटी हुई व्याघ्र की पूँछ से शोभायमान था ।

दाँतो की माला-जैसी लगनेवाली छोटे-छोटे उपलो की माला पहने था । उसके पैर ऐसे थे, जैसे पत्थरो के बने हो । उसके केश ऐसे थे, जैसे अधकार को बाँधकर रखा गया हो । उसकी ऊपर की ओर कुचित भौंहो पर धान से भरी वाली रखी हुई थी ।

उसके हाथो पर, ताड के पेडों से लटकनेवाले मोटे रेशों के जैसे बडे, घने और