भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 249

अयोध्याकाण्ड २३६

सुन्दर केश बढ़े थे। उसका वक्ष विशाल शिला के समान था। उसका रंग तैल लगाये गये अन्धकार के समान था।

उसकी कटि मे, रक्त के चिन्हों से युक्त कटार थी। उसकी दृष्टि ऐसी भयंकर थी कि विषैला सर्प भी उसके आगे काँप जाय। वह उन्मत्त के जैसे असंबद्ध वचन बोलता था। उसकी कटि इन्द्र के वज्र के समान अत्यन्त दृढ़ थी।

शरीर को पुष्ट करनेवाले मांस और मछली खाने से उसके मुँह मे दुर्गन्ध आ रही थी। उस (मुँह) पर हँसी नहीं थी। बिना क्रोध के भी उसके देखने पर (उसकी आँखों से) चिनगारियाँ निकलती थीं। उसकी कण्ठ-ध्वनि यम को भी डरानेवाली थी।

तरंगों से भरे गंगा नदी के तट पर स्थित श्रृंगवेर नामक गाँव मे उसका निवास था। ऐसा वह (गुह), आश्रम में ठहरे हुए उदार पुरुष (राम) के दर्शन करने के लिए मधु, मछली आदि उपहार लेकर आया।

अपने परिवार के लोगों को दूर पर खड़ा करके, खूब तपाये गये बाण से युक्त अपने धनुष को भी दूर रखकर, कटि में बँधे कटार को भी उतारकर, निष्कलंक तथा प्रेमपूर्ण चित्त के साथ, वह राम के आवास-भूत उस आश्रम के द्वार पर पहुँचा।

वह निषादों का गजा, प्रेम से द्रवित हो वहीं खड़ा रहा। फिर पुकारकर कहा— हे स्वामी ! मैं, श्वान के समान क्षुद्र, आप का दास, आप की सेवा मे उपस्थित हुआ हूँ।

गुह के यों कहने पर लक्ष्मण उसके निकट आये और उससे पूछा—तुम कौन हो ? किस कार्य से आये हो ? तब गुह ने प्रेम के साथ उन्हें नमस्कार करके कहा— हे देव ! मैं श्वान-समान दास नाव चलानेवाला हूँ। आप के चरणों का दर्शन करने के लिए आया हूँ।

तब लक्ष्मण गुह से वही ठहरने को कहकर अपने ज्येष्ठ भाई के पास पहुँचे और निवेदन किया—हे विजयशील। पवित्र चित्तवाला, माता से भी अधिक प्रेम से युक्त, वीची-भरे गंगा में नाव चलानेवाला निषाद-पति गुह, अपने बड़े परिवार के साथ आपके दर्शनार्थ आया है।

उदार (राम) ने आदेश दिया—उसे मेरे पास ले आओ। सद्गुणवाले लक्ष्मण ने जाकर गुह को वह आदेश सुनाया, तो गुह प्रेमाधिक्य से तुरन्त भीतर प्रविष्ट हुआ और सुन्दर नेत्रोंवाले राम के दर्शन कर नेत्र-लाभ पाया। फिर काले केशों से युक्त अपने शिर पर कर जोड़कर, शरीर झुकाकर, नमस्कार करके, कर से अपना मुँह बंद किये खड़ा रहा।

राम ने गुह से कहा—बैठो। किन्तु गुह बैठा नही। असीम प्रेम से युक्त होकर उसने कहा—हे देव ! आपके भोजन के लिए अत्युत्तम मधु और मछली लाया हूँ। आपका चित्त कैसा है ? यह सुनकर वीर (राम) वृद्ध तपस्वियों की ओर देखकर मुस्कुराये$^१$ और फिर बोले—


१. कंब ने मांसाहार की काफी निन्दा की है। रामचन्द्र जी, इस रचना में, मांसाहारी नहीं हैं। यही कारण है कि गुह के लाये भोजन को, उसके प्रेम को और उसके भोलेपन को देखकर राम मुस्कराये।