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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 549 में से

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पृष्ठ 250

२४० || कंब रामायण

ये वस्तुएँ मन में स्थित प्रेम के आधिक्य को प्रकट करनेवाली हैं और बडे आदर के साथ लाई गई हैं। अतः दुर्लभ अमृत से भी ये अधिक उत्तम हैं। प्रेम से लाये जाने के कारण ये पवित्र हैं, अतः मुझ जैसो के लिए ये योग्य ही हैं। अब जैसे मैने इन वस्तुओ को स्वीकार कर लिया है (तुम इनको स्वय स्वीकार कर लौटाकर ले जा सकते हो)।

सिंह-सदृश वीर राम ने पुनः कहा— आज यहाँ रहकर हम कल गंगा पार करेंगे। अतः, तुम अपने परिवार के लोगो के साथ अपने नगर में जाकर सुख से वास करो और प्रभात के समय नौका लेकर गगा-तट पर आ जाओ।

मेघ के जैसे काले रंगवाले राम के यह कहने पर प्रेम-भरे गुह ने निवेदन किया— हे सारे ससार के स्वामी ! आपको इस वेष मे देखकर भी अभी तक मै, चोर ने, अपनी इन आँखो को नोचकर फेंक नही दिया। अब आप को छोड़कर मै अपने आवास में नहीं लौट सकता। हे प्रभु । अपनी शक्ति-भर मै आपकी सेवा करता रहूँगा।

विजयमाला से भूषित कोदंड-धारी पुरुषोत्तम ने गुह की बात सुनकर अपने भाई और देवी सीता की ओर दृष्टि फेरी और कहा—यह अपार भक्तियुक्त है। और फिर, करुणा-पूर्ण मन से कहा—सबसे उत्तम स्नेह-गुण से सपन्न हे मित्र । तुम यही रहो।

तब गुह ने राम के चरणो को प्रणाम किया और उमड़नेवाले आनन्द के साथ, पटह-वाद्यों से युक्त समुद्र के समान अपनी सेना को बुलाकर रामचन्द्र के आवास के चारो ओर रहकर उसकी रक्षा करने की आज्ञा दी और वह स्वय हाथ मे धनुष लेकर और उसपर शर को भी चढ़ाकर, कटार को अपनी कटि के वस्त्र मे खोंसकर, गरजते मेघ के समान (ध्वनि के साथ) राम के चरणो की स्तुति करता हुआ खड़ा रहा।

गुह ने लक्ष्मण से प्रश्न किया—हे मनुकुल मे उत्पन्न ! सुन्दर अयोध्या नगर को छोड़कर यहाँ आने का कारण बताओ। तब राम के वनवास से दुःखी लक्ष्मण ने सब वृत्तांत कह सुनाया। (राम की) भक्ति से पूर्ण गुह ने अत्यत दुःखी होकर कहा—विशाल भूदेवी ने, तपस्या से सपन्न होकर भी, (तप के) फल को प्राप्त नही किया। यह कैसा अनर्थ है ? और अपनी आँखो से अश्रु बहाता हुआ खड़ा रहा।

जिन्होने अधकार के जैसे सर्वत्र फैले हुए शत्रुओ को पराजित करके भगाया, मव दिशाओ मे अपना अधिकार स्थापित किया, अत्युन्नत स्थान मे रहकर अनुपम आज्ञा-चक्र चलाया, श्रेष्ठ कीर्त्ति को स्थापित किया, अपने शासन-काल मे इस विशाल ससार क मव¹ लोगो के मन मे रहकर सब पर कृपा की, और अब जो मृत हो गये हैं, ऐसे युद्ध-वीर दशरथ के ममान ही अरुण किरणवाला सूर्य भी अस्त हो गया।

संध्याकालीन नित्य कृत्यो को यथाविधि ममाप्त करके वीर (रामचन्द्र) और क्षीर-समुद्र मे उत्पन्न अमृत समान (सीता) देवी ने धरती पर बिछाई गई 'नाणल' घास की बनी चटाई पर विश्राम किया, कनिष्ठ (लक्ष्मण) दृढ धनुष हाथ में लिये, प्रभात होने तक अपलक खड़े रहकर पहरा देते रहे।


१. इम पद में प्रयुक्त 'मव' विशेषण दशरथ और सूर्य—दोनों के लिए समान है।