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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

अयोध्याकाण्ड २४१

जिन (लक्ष्मण) की देह-कांति सूर्य की किरणों से आवृत्त मेरु की स्वर्णमय आभा को मात करनेवाली थी, जो जगमगाते हीरकों के आभरण पहनने योग्य थे, और जो सिंह के सदृश (बलवान्) थे, ऐसे लक्ष्मण ने, निद्रा नामक सुन्दरी के उनके सम्मुख प्रकट होने पर उससे कहा—जब हम सुन्दर प्राचीरों से घिरी अयोध्या में लौटकर जायेंगे तब तुम मेरे पास आना। (तबतक तुम मेरे पास मत आना)।

वीरता के आगार, करवाल-धारी लक्ष्मण की आज्ञा का उल्लंघन न कर सकने के कारण निद्रा-देवी लक्ष्मण के चरणों को प्रणाम करके और यह कहकर कि जब तुम प्राचीरों से घिरी स्वर्ग लोक-जैसी अयोध्या मे आओगे, तब मै तुम्हारे चरणों के आश्रय में आऊँगी, वहाँ से चली गईं।

निद्रादेवी के यों प्रणाम करके चले जाने के पश्चात् लक्ष्मण, अपने प्रभु को निरंतर उत्तम कमल के आसन पर रहनेवाली लक्ष्मी (के अवतार सीता) के साथ उस प्रकार (भूमि पर) शयन करते हुए देखकर, उनकी दुःखद दशा पर अत्यन्त शोकाकुल हुए। उनका मन टूट-सा गया। उनकी आँखों से अश्रुओं के निर्झर बह चले। वे दुःख से भरी प्रतिमा-सदृश एक शिला पर निष्पद हो खड़े रहे।

पिछले दिन जन्म-रहित सूर्य मानो यह सूचित करते हुए अस्त हुआ था कि 'असंख्य जन्म लेते रहनेवाले ये जीव, पवित्र दिखाई पड़नेवाले स्वर्ग आदि (विनश्वर) लोकों को भूल जाये और (मोक्ष के एक मार्ग को) सोचकर जान लें और उस पर चलें; क्योंकि उनके मर जाने का यही ढंग है।' वही सूर्य मानो यह सूचित करते हुए अब उदित हुआ कि ये जीव ऐसे ही जन्म लेते हैं।

कीचड़ में उत्पन्न होनेवाले अति सुन्दर कमल-पुष्प, रथारूढ होकर प्रकट हुए उष्ण किरणधन सूर्य के मंडल के दर्शन से प्रफुल्ल हुए। विलक्षण अंजन-वर्ण सूर्य-जैसे प्रभु (राम) को देखकर सुन्दर 'वजि' लता जैसी सीता का मनोहर मुख-कमल प्रफुल्ल हुआ।

राम, प्रभातकालीन नित्य-कृत्य समाप्त करके शत्रुओं के लिए भयंकर अपने कन्धे पर धनुष को रखे हुए, वेदज्ञ मुनियों से अनुसृत होते हुए (आश्रम से) चल पड़े और प्रथम दर्शन में ही भक्ति से दास्य स्वीकार करनेवाले गुह को देखकर कहा—हे तात! हमको पार उतारने के लिए एक अच्छी नौका शीघ्र लाओ।

आज्ञा के यह वचन सुनकर गुह के नेत्रों से अश्रु बह चले, उसके प्राण व्याकुल हो गये, राम के चरणों से वियुक्त होने की इच्छा न होने से वह, सीता देवी के साथ शोभित होनेवाले नील कुवलय, अतसी पुष्प, समुद्र और सजल मेघ—इनकी समता करनेवाले राम के चरणों को नमस्कार करके यों कहने लगा—

हम कभी असत्य मार्ग पर चलनेवाले नहीं हैं। हमारा निवासस्थान वन ही है। हम अक्षुण्ण बल से युक्त हैं। आपकी आज्ञाओं का हम यथाविधि पालन करते रहेंगे। इसलिए सुन्दर पुष्पमालाधारी हे प्रभु! हम, दासों को आप अपने बन्धुजन समझें और हमारे ग्राम में चलकर चिरकाल तक सुख से रहें।

हमारे यहाँ मधु प्रभूत मात्रा में होता है, धान बहुत होता है, देवों के भी आहार