कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४२ | कंब रामायण |
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के योग्य मास है। हम श्वान के जैसे आपके सेवक हैं। हमारे प्राण आपकी सेवा में निरत हैं। आपके विहार के लिए वन हैं। स्नान के लिए गंगा भी है। अतः, जबतक मैं यहाँ रहूँगा, तबतक आप भी आनन्द से हमारे संग रहे हमारे यहाँ पधारें।
पहनने के लिए रेशमी जैसे चर्म-वस्त्र हैं, विविध रस के भोज्य पदार्थ हैं। शृङ्खलाओं में लटकाये गये निद्रा करने के योग्य पर्यंक के जैसे तख्ते हैं। निवास के योग्य छोटे-छोटे कुटीर हैं। शीघ्रगामी (हमारे) चरण हैं और (विघ्न डालनेवालो को मारने-वाले) धनुर्धारी हमारे कर हैं। आप यदि शब्दधर्मा आकाश में स्थित किसी वस्तु को भी चाहेंगे, तो हम शीघ्र उसे ला देंगे।
आपकी आज्ञा का पालन करनेवाले पाँच सौ निषाद हैं। वे देवों से भी अधिक शक्तिशाली हैं। यदि आप एक दिन भी हमारे झोपडे में ठहरेंगे, तो उससे हम तर जायेंगे। उससे उत्तम कोई दूसरा जीवन हमारे लिए नही होगा—यों गुह ने निवेदन किया।
तब गुह की प्रार्थना सुनकर महिमामय प्रभु ने अपने मन को कृपा से भरकर, उज्ज्वल मंदहास करके कहा—हे वीर ! हम गंगा में स्नान करके, वन में रहनेवाले महात्माओ की सेवा में रहकर कुछ ही दिनों में पुनः तुम्हारे आवास में आनन्द के साथ आ पहुँचेंगे।
इंगित को जाननेवाला गुह, शीघ्र जाकर एक दीर्घ नौका ले आया। कमल-समान नयनोंवाले राम ने निकट-स्थित वंद्य ब्राह्मणों को देखकर कहा—मुझे आज्ञा दें। फिर, अर्धचन्द्र-सदृश ललाटवाली (सीता) एव अपने अनुज के साथ उस नौका पर आरूढ हुए।
शरीर के प्राण जैसे (राम) ने आज्ञा दी—नदी में नौका को शीघ्रता से चलाओ। दीर्घ वीचियों से पूर्ण नदी में वह दीर्घ नौका बाल-हंस की गति से शीघ्र चलने लगी। तब तट पर स्थित वेदज्ञ मुनि अग्नि में पड़े मोम के जैसे पिघल उठे।
दुग्ध-सदृश मीठी बोलीवाली सीता और सूर्य-समान रामचन्द्र, 'शैल' (नामक) मछलियों से पूर्ण गंगा के अति पवित्र जल को उछाल-उछालकर खेल रहे थे। दीर्घ डाँडो से खेई जानेवाली वह नौका अनेक टाँगोंवाले एक बड़े केकड़े के समान शीघ्रता से चली जा रही थी।
चंदन (वृक्षो) से युक्त सैकत श्रेणी-रूपी विशाल स्तनोंवाली गंगा-नदी ने, उज्ज्वल रत्न-समुदाय से युक्त ओर सुगंधित कमलपुष्पों की अरुण आभा से शोभायमान, स्वच्छ तरंग-रूपी अपने हाथों से, अकेले ही उस नौका को उठाकर मंद-मंद (गति से) दूसरे तट पर पहुँचा दिया।
उस किनारे पर पहुँचकर प्रभु ने अपने मित्र (गुह) से पूछा—चित्रकूट को जाने का मार्ग कौन-सा है, बताओ। तब भक्ति में अपने प्राण भी देने के लिए सन्नद्ध उस गुह ने (राम के) चरणों पर नत होकर कहा—हे उत्तम ! श्वान-तुल्य इस दास का एक निवेदन है।
श्वान-तुल्य मैं, यदि आपके संग चलने का भाग्य प्राप्त करूँ, तो वन में आपके चलने के लिए मार्ग बनाऊँगा। अति उत्तम फल और मधु ढूँढकर ला दूँगा। आपके