कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २४५
हे अगरु के धूम से सुवासित केशोंवाली ! जलाशयों के तट पर अलकार के योग्य आभरण-जैसे पुष्पों से लदे हुए पौधे (हवा के झोंके से) श्वेत रेशमी वस्त्र जैसे जल में निमग्न होते हुए ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं, जैसे मृदु स्तनोंवाली युवतियाँ ही स्नान कर रही हों।
हे धनुष समान सुन्दर भ्रुकुटिवाली ! भ्रमर-बालक, बढ़े हुए पुष्पों में छेद करके उनके भीतर जाने का प्रयत्न न करते हुए 'कांगु' वृक्ष के चारों ओर स्थित पुष्पों पर चढ़कर सो रहे हों, वे ऐसे लगते हैं, जैसे स्वर्ण के फलकों पर जड़े नील रत्न हों; यह दृश्य भी देखो।
अपने मुँह में अधिक मधु को भर लेने के कारण आँख खोलकर नहीं देख सकने से, शीघ्र जाने का मार्ग नहीं देख पाते हुए, अंधे के जैसे हिलते-डुलते हुए जानेवाले बड़े भ्रमर, आगे-आगे जानेवाली भ्रमरियों को ही अपना नेत्र बनाकर जा रहे हैं।
हे हंस-तुल्य मृदु गतिवाली ! स्वर्णमय पुष्पों से लदी 'वेंगे' वृक्ष की अनेक शाखाएँ, कन्याओं के शृंगार करने की रीति का अभ्यास-सी करती हुई, तुम्हारे अलक से शोभायमान ललाट के ऊपर अपने नव मृदुल पुष्पों को लगा रही हैं, मानों वे (अपने पुष्पों को) बरसा रही हों।
हे अप्सराओं से भी अधिक सुन्दरी ! सुगंधित मंद मारुत के बहने से पुष्प-पुंजों का मकरंद पत्थरों से भरे कानन में इस प्रकार बिखरा पड़ा है, जिस प्रकार तुम्हारे मुक्ताहार से शोभित स्तन-तटों पर दाग१ फैले रहते हैं।
इन घने वृक्षों ने, मानो यह सोचकर कि तुम्हारे मृदुल चरण पत्थरों पर चलने के अभ्यस्त नहीं हैं, मार्ग-भर में पुष्पों को बिखेर रहा है, देखो। हे कोकिल-समान मधुर-भाषिणी ! अपनी शाखाओं में सुगंधित पुष्पों से भरी हुई लताएँ तुम्हारी डमरु-सदृश कटि की समता नहीं कर सकती।
हे करवाल-सदृश नयनोंवाली ! तुम्हारे कमल-सदृश चरणों तथा तुम्हारे चरण-तुल्य पल्लवों पर मँडरानेवाले इन भ्रमरों को देखो। सर्वत्र अंधकार फैलानेवाले तुम्हारे सुगंधित केशों के समान इन मेघों को देखो। तुम्हारे कंधों के समान इन कोमल बाँसों को देखो।
हरिणों, मयूरों तथा कोकिलों के संचरण से युक्त वह वन, विविध पुष्पों से भरी शाखाओं से पूर्ण है। यत्र-तत्र पक्षिगण हैं। विविध लताएँ सुन्दर ढंग से फैली हैं। अग्नि के वर्ण (के पल्लवों) से युक्त हैं। अतः, यह वन विविध चित्रकारी से युक्त यवनिका के समान दिखाई पड़ता है।
स्वर्ण-आभरणों से भूषित पुष्ट कंधोंवाले राम, यौवन से परिपूर्ण सीता से ये वचन कहते हुए, मधुर विहार-से करते हुए वन-मार्ग पर चले जा रहे थे। तब सूर्य पश्चिम दिशा में जा पहुँचा। तब दूर में चित्रकूट पर्वत को देखकर राम कह उठे, दोनों कर्म को जीतने-वाले मुनियों का निवासभूत पर्वत यही है।
१. यौवनवती नारियों के स्तनों पर कुछ दाग-से फैले रहते हैं जिनको तमिल में 'तेमल' कहते हैं। तमिल के प्राचीन साहित्य में यत्र-तत्र इसका वर्णन हुआ है।—अनु०