कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ कम्ब रामायण
उस समय, प्रेम की उमंग से युक्त भरद्वाज मुनि यह समझकर कि चिरकाल से की गई अपनी तपस्या आज फलीभूत हो रही है, जन्म-व्याधि के लिए औषध-समान राम का स्वागत करने के लिए सम्मुख आये।
वे (भरद्वाज मुनि) छत्रधारी थे। दीर्घ दंडधारी थे। कमंडलु से युक्त थे। अधिक जटा से शोभायमान थे। मनोहर वल्कल वस्त्र पहने थे। मार्ग पर इस प्रकार चलते थे कि उनके कारण अन्य प्राणियों को कुछ कष्ट न हो। उनकी जिह्वा पर चारो वेद नर्त्तन करते थे।
प्रतिदिन रक्तवर्ण अग्नि को प्रज्ज्वलित करनेवाले थे। चतुर्मुख के द्वारा सृष्ट सब प्राणियों को अपने प्राणों के समान सुरक्षित करनेवाली शीतल करुणा से परिपूर्ण थे। वे ऐसी महिमा से संपन्न थे कि विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न न होने पर भी सप्त लोकों की सृष्टि कर सकते थे।
उन महर्षि के आने पर अनघ (रामचन्द्र) ने पुष्यो का अर्घ्य देकर तीन बार उनको प्रणाम किया। उन उत्तम महर्षि ने राम को गले से लगाकर कहा—हाय ! तुमको यह (मुनि का) वेष धारण करना पड़ा और मन से पीड़ित होकर नेत्रों से आँसू वहाने लगे।
फिर मुनिवर ने राम से पूछा—शत्रुओं के विनाशक हे वीर ! इस अवस्था मे ही तुम सारे संसार का शासन करने की क्षमता रखते हो। ऐसे कार्य को छोड़कर हम जैसे मुनियो के आवासभूत वन मे अपने लिए अनुपयुक्त वेष धारण करके, अनुज-सहित आये हो। इसका क्या कारण है ?
फिर, राम के द्वारा सारा वृत्तान्त कहे जाने पर उन उत्तम तपस्वी ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा—अहो ! इस अवस्था में ऐसा घटित हुआ यह विधि का दुष्कृत्य है। इस विशाल धरती का दुर्भाग्य है (कि तुम राजा नही वने)।
मेरे मित्र (दशरथ) ने पहले यह कहकर कि अरुण मुखवाली तथा मधुरभाषिणी सीता के साथ तुम जल-पूर्ण समुद्र से आवृत इस धरती का शासन करो, पुनः किस प्रकार तुम्हारे जैसे अपने अनुपम पुत्र को अरण्य में जाने की आज्ञा दी और यों आज्ञा देकर वे कैसे जीवित रह सके ?
'सुख और दुःख दोनो परिवर्तनशील होते रहते हैं'—यह नियति है। इनके कारण हमारे पूर्वजन्मकृत पुण्य-पाप होते हैं। अतः, अब मेरे दुःखी होने से कुछ लाभ नहीं है।—यों विचार कर वे (भरद्वाज महर्षि) शांत हुए और पुनः राम का आलिंगन कर उन्हे अपने आवास मे ले चले।
उन पवित्र मुनिवर ने अपने आश्रम मे जाकर उनका यथोचित सत्कार किया। उत्तम फल और कंद भोजन के लिए दिये और मधुर वचन कहे। यों अपने प्राण-सदृश पुत्र-जैसे उन (राम, लक्ष्मण और सीता) के प्रति प्रेम दिखाया, जिससे वे तीनो बहुत आनंदित हुए।
वे तीनो उस आश्रम मे सुख से रहे। तब भरद्वाज महर्षि ने यह सोचकर कि इन रामचन्द्र के सग रहने मे मै तर जाऊँगा, सब प्रकार से सत्कार करके फिर प्रभु के मुख