कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २१७
की ओर देखकर कहा—हे उत्तम पुष्प-माला से भूषित वक्षवाले ! मुझे एक बात कहनी है—
यह स्थान जल, पुष्प, कन्द और फल से समृद्ध है। यहाँ रहने से पूर्वकृत पाप भी कट जाते हैं और पुण्य बढ़ता है। अतः, हम लोगों के साथ तुमलोग भी यही रहो। श्रेष्ठ तपस्या करनेवालों के लिए इस स्थान से बढ़कर अन्य कोई उत्तम स्थान नहीं है।
यहाँ गङ्गा नदी के साथ काली (यमुना) नदी और सरस्वती का सङ्गम है। अतएव, मैं इस स्थान को छोड़कर और कहीं नहीं जाता हूँ। कमल-तुल्य नयनोंवाले (हे राम) ! यह ब्रह्मा के लिए भी दुर्लभ तीर्थस्थान है। हम जैसे लोगों के लिए यह सुलभतया प्राप्त होनेवाला नहीं है। ऐसे स्थान पर तुम रहो।
महान् तपस्या से संपन्न भरद्वाज ने प्रेम से इस प्रकार कहा। तब राम ने उत्तर दिया—हे उदारचित्त ! यह स्थान जल-संपन्न कोशल देश से बहुत दूर नहीं है। यदि मैं इस स्थान में रहूँगा, तो कोशल देश के लोग यहाँ आयेंगे।
तब भरद्वाज महर्षि ने कहा—हे तात ! तुम्हारा कथन सत्य ही है। यहाँ से एक खात (खात = दस मील) दूर चलने पर देवताओं के लिए भी वन्द्य चित्रकूट पर्वत है। वह स्वर्ग से भी अधिक सुखदायक है। वहाँ जाकर तुम सुख से निवास करो।
राम आदि तीनो व्यक्ति, प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहनेवाले भरद्वाज के चरणों को नमस्कार करके, 'कौन्ने' (वृक्षविशेष) के वाजे तथा बाँसुरी बजानेवाले ग्वालों के निवास-भूत 'मुल्लै' प्रदेश (अरण्य-प्रदेश) को पार करके चले और जब अरुण किरण (सूर्य) उदयाचल से चलकर आकाश के मध्य में पहुँचा, तब उस यमुना नदी के निकट जा पहुँचे, जहाँ हरिण-शावक जल पिया करते थे।
धूलि से धूसर शरीरवाले वे तीनो उस (यमुना) नदी को देखकर प्रसन्नचित्त हुए और उसको नमस्कार करके उसमें स्नान करने का कर्तव्य पूरा किया। फिर, मधुर स्वादवाले कन्द और फल का आहार किया और उस नदी का जल पिया। तब राम ने कहा—इस नदी के पार हम कैसे जायें ? तब लक्ष्मण ने—
झुकनेवाले बाँसों को काटकर 'मणे' (नामक एक) लता से उनको बाँधकर एक नाव बनाई। उस पर पर्वत समान पुष्ट कंधोंवाले राम अपनी देवी-सहित आसीन हुए। लक्ष्मण दोनों हाथों से उस नाव को ढकेलते हुई तैरकर उस बड़ी नदी के पार पहुँचे।
जहाँ गन्ने के कोल्हुओं से इक्षु-रस का प्रवाह बहकर खेतों को सींचता रहता है, उस अयोध्या के प्रभु राम के अनुज ने अपनी मंदरपर्वत-समान, पुष्प-भूषित दोनो भुजाओं से, बारी-बारी से यमुना-जल को ढकेलना आरंभ किया। तब जल आगे बढ़कर उदयाचल के निकटस्थ पूर्वी समुद्र को भी पार कर चला और पीछे की ओर बढ़ा हुआ जल पश्चिमी समुद्र में जा पहुँचा।
सुन्दर वल्कल धारण किये हुए वे तीनो उस यमुना-धारा को पार कर दूसरे तट पर पहुँचे और कुछ दूर चलकर एक ऐसे उजड़े हुए मरु-प्रदेश के निकट पहुँचे, जहाँ वृक्षों की शाखा, कन्द और मूल, झुलस गये थे। जहाँ की धरती अग्नि के समान जल रही थी और जो उसका स्मरण करनेवाले के मन को भी झुलसा देती थी।