कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 549 में से
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कंब रामायणं
प्रभु ने सोचा—जानकी में इस मरुप्रदेश को पार करने का सामर्थ्य नहीं है। तुरंत ही सूर्य, चन्द्र के समान शीतल किरणें फैलने लगा। उष्णता से झुलसे हुए वृक्ष पल्लवों से भर गये। दारुण अग्नि से पूर्ण प्रदेश में कमल-वन छा गये।
भूने हुए बीज जैसे उपल-खंड, बिखेरे गये पुष्पों के समान मृदु और शीतल हो गये। छिन्न तथा जली हुई लताएँ कोमल पल्लव निकालने लगीं। वहाँ के फुफकार करनेवाले विषधर सर्प, उनके विष-दंतों में अमृत प्रकट हो जाने से, अत्यन्त आनन्दित हो उठे।
मेघ उमड़-घुमड़कर गरज उठे और शीतल जल-बिन्दु बरसाने लगे। तीक्ष्ण शर लिये हुए व्याध लोग भी प्राणियों पर मुनियों के समान ही दया दिखाने लगे। बाघिनें भूख से हीन हो गईं और सम्मुख आनेवाले प्राणियों का आलिंगन करने लगीं। हरिण-शावक उनके थनों से दूध पीने लगे।
शिलाओं के बिलों में रहनेवाले दारुण विषधर सर्प अब पीडा-मुक्त होकर ऐसे शान्त हो रहे, जैसे वे तरंगायित शीतल जल में पड़े हों, वहाँ के वनों के बाँस जो पहले जल उठते थे, अब मुक्ता-समान दाँतोंवाली नवयुवतियों के कंधों के जैसे ही सुन्दर दिखाई देने लगे।
हरित कवल के समान हरियाली बिछ गई। स्थान-स्थान पर मयूर पंख फैलाकर युवतियों के समान नृत्य-भंगियाँ दिखाने लगे। उनके पार्श्वों में भ्रमर गवैयो के समान नृत्य के अनुकूल संगीत गाने लगे।
अकाल में भी पेड़ों में फल लग गये। बिना मूलवाले पौधों में भी कंद उत्पन्न हो गये। सर्वत्र पुष्पलताएँ आभरण-भूषित युवतियों के समान दिखाई देने लगीं। उत्तम शील से बढ़कर अन्य कौन-सी तपस्या आचरणीय है? (अर्थात्, शील ही सबसे बड़ी तपस्या है।)
व्याधों के निवास ऋषियों के आश्रम जैसे हो गये, माणिक्य-कांतिवाले इन्द्र-गोप (कीट) स्थान-स्थान पर फैल गये। कोकिल घने वृक्षों में बैठी विरह-पीड़ित कोकिल-बालाओं को गा-गाकर शांत करने लगे। करीर के वृक्ष भी हरे-भरे होकर कोमल पल्लवों से भर गये।
वह वन पहले इस प्रकार झुलसा हुआ था, जिस प्रकार एक निश्चित अवधि देकर युद्ध करने के लिए जानेवाले वीरों को गाढ आलिंगन करके भेज देने के पश्चात् उनकी विरहिणी पत्नियों का मन झुलस जाता है। अब वह इस प्रकार लहलहा उठा, जिस प्रकार उन योद्धाओं के लौट आने पर उन युवतियों का मन लहलहा उठता है।
उस मरु-प्रदेश को उन तीनों ने धीरे-धीरे पार किया फिर वे उस चित्रकूट पर्वत पर जा पहुँचे, जहाँ मत्तगज, आकाश में प्रकाशमान चन्द्र के बादलों के मध्य छिप जाने पर, मेघ को देखकर हथिनी समझ लेते हैं और ताड़ (वृक्ष)-जैसी अपनी विशाल सूँड को पसारकर उस (मेघ) को छूने की चेष्टा करते हैं। (१-४७)