कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७
वन-प्रवेश पटल
जिन वारनारियों की संगति को क्षुद्र जन प्राप्त करना चाहते हैं, उनके मन के जैसे ही, 'यह आर्द्र है या नहीं' ऐसा निश्चय करने के लिए असाध्य वसन्त ऋतु, रामचन्द्र के वन में आते ही, आकाश में सर्वत्र जल-भरे मेघों को दिखाने लगी ।
सूर्य अपनी किरण, चन्द्रिका के जैसे (शीतल) बनाकर फैला रहा था। वहाँ के घने वृक्ष छाया दे रहे थे। आकाश के बादल ओसकण-जैसी बूँदों की वर्षा कर रहे थे। मंद अनिल पुष्पों की गंध लेकर मृदु गति से बह रहा था। ऐसे समय में वे तीनों, मोरों के नृत्य को देखते हुए वन-मार्ग में प्रसन्नता के साथ चले ।
तब रामचन्द्र सीता को वन के विविध दृश्य दिखाने लगे। हे सुगंधित पुष्पमाला धारण करनेवाली ! कलापी-तुल्य ! यौवनपूर्ण हरिण के समान दृष्टि से शोभायमान। (देखो) मधुर निद्रा करनेवाले इन्द्रगोप सर्वत्र फैले हुए हैं और कनैंल के स्वर्णवर्ण पुष्पों की राशियाँ पड़ी हैं। उन सबका दृश्य ऐसा ही है, जैसे अनेक रत्नजटित स्वर्णहार पड़े हों ।
भ्रमरों के गान और मेघ-रूपी मर्दल-वाद्य के साथ अपने पंख फैलाकर मनोहर नृत्य दिखानेवाले, लजीले-से ये मयूर, जैसे तुम्हारे सौंदर्य को अनेक नेत्रों से देखकर आनन्दित हो रहे हैं ।
सुन्दर आम्र-पल्लव के समान शरीर-कांति से युक्त, हे सुन्दरी ! मनोहर आभा से युक्त रक्तवर्ण मुख और हरित देह-कांति से शोभायमान शुक, लावण्यपूर्ण 'कादल' पुष्प पर बैठे हुए ऐसे लगते हैं, जैसे तुम्हारे हाथ पर बैठे हों, ऐसे शुकों को देखो ।
तैल-लगे दीर्घ बरछे के जैसे तथा हथेली के विस्तार से भी बड़े नयनों में शोभायमान, हे देवी ! अनेक मयूर और यौवन से युक्त हरिण, तुम्हारी देह की सुषमा को देखकर और अपने ही कुल का व्यक्ति समझकर तुम्हारे निकट आते हैं, देखो ।
सुन्दर 'कुरा' पुष्पों एवं उनके आस-पास फैले हुए 'पिडुवु' वृक्ष के पुष्पों की राशियों में सोकर उठनेवाले एक मयूर की देह-गंध को पाकर उसकी मयूरी, यह सोचकर कि उसने अन्य किसी मयूरी की संगति की है, उससे रूठ गई है, यह दृश्य भी देखो ।
हे अरुंधती के समान (पतिव्रता) ! अमृत से भी अधिक मनोहर । अशोक पुष्पों पर 'शेरुन्दि' के स्वर्ण के रंगवाले पुष्प पड़े हैं और उनपर भ्रमर-कुल मत्त हो रहते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है, जैसे सोने के टुकड़ों पर कोयले डालकर (नाली से) हवा फूँकी जा रही हो और उससे अग्नि की ज्वाला ऊपर उठ रही हो, यह दृश्य भी देखो ।
हे उभरे हुए स्तनोंवाली ! चित्र के लिए असाध्य सौंदर्यवाली ! देखो, एक मयूर 'कादल' पुष्प की कली को ध्यान से देखकर उसे कोई सर्प समझ लेता है और उसे अपनी चोंच में उठा लेता है, यह दृश्य देखकर मधु-पूर्ण कुंदपुष्प हँस पड़ते हैं।
पर्वत पर निवास करनेवाला व्याघ्र-शावक, घने अंधकार-जैसे हाथी के बच्चे और गाय के बछड़े, अपना सहज बैर छोड़कर एक साथ खेल रहे हैं, यह दृश्य देखो ।