कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ कंब रामायण
(सीता के रूप मे) अवतीर्ण होकर उनसे वियुक्त रहने लगी थी; ऐसी वह (सीता) क्या इस वचन को सह सकती कि राम उसको छोड़कर चले जायेंगे ?
राम की उक्ति को सोच-सोचकर सीता ऐसी व्याकुल खड़ी रही, जैसे उसके प्राण ही निकल रहे हो। फिर, यह बोली कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करने का निश्चय अत्यन्त उचित ही है, किन्तु मुझे किस कारण से (अयोध्या मे ही) रहने को कह रहे हैं ?
तब राम ने कहा—शीतल अलक्तक-रस से अलंकृत तुम्हारे मृदुल चरण इस योग्य नहीं हैं कि राक्षस जैसे लगनेवाले पर्वतो मे, पिघली हुई लाख जैसे उष्ण पत्थरों पर तुम चलो।
यह सुनकर सीता ने उत्तर दिया—आप मेरे प्रति कृपाहीन और प्रेमहीन होकर मुझे छोड़कर जाने की बात कह रहे हैं, (आप के विरह में उत्पन्न होनेवाले) इस ताप के सामने प्रलयकालीन सूर्य का ताप भी कुछ नहीं होगा। वह विशाल अरण्य क्या आपके विरह से भी अधिक तापजनक है ?
प्रभु ने सीता के वचनो को सुना और साथ ही उन (सीता) के मन को भी पहचाना, वे यह भी नहीं चाहते थे कि सीता अपने नेत्रों से अश्रु-समुद्र को प्रवाहित करती रहे। इसलिए, वे सोचते खड़े रहे कि अब मेरा कर्तव्य क्या है।
उस समय, सीता अपने विशाल प्रासाद के भीतर गई। अपने योग्य वल्कल-वसन धारण करके विचार-मग्न प्रभु के निकट आकर उनके तालवृक्ष जैसे दीर्घ कर को पकड़कर खड़ी हो गई।
सीता का वह कार्य देखकर सब लोग धरती पर गिर पड़े। फिर भी मर नही गये। जब आयु के दिन अभी शेष थे, तब वे कैसे मर जाते ? जिनकी आयु समाप्त नहीं होती, वे युगान्त के समय मे भी जीवित ही रहते हैं।
सीता को देखकर, माताएँ, बहिनें, साथिनें, सखियाँ—सब जैसे अग्नि की ज्वाला मे गिर पड़ीं। तब कमलनयन रामचंद्र सीता के प्रति कहने लगे—
कुंद और मुक्ता को परास्त करनेवाले उज्ज्वल दाँतो से युक्त, हे देवि ! वन-गमन से होनेवाले कष्टो को तुम नहीं जानती हो। मेरे साथ चलने को सन्नद्ध हो गई हो, अतः तुम मेरे लिए अपार दुःख उत्पन्न कर रही हो।
क्षत्रिय-वंश के श्रेष्ठ राम के यह कहने पर कोकिल को परास्त करनेवाली मधुर वाणी से युक्त सीता, कोप के साथ बोली—आपको मेरे कारण ही संकट उत्पन्न होता है, कदाचित् मुझे छोड़कर जाने मे आपको सुख ही सुख है।
तब उदार गुणवाले राम कुछ उत्तर नही दे सके और सीता को साथ लेकर उस वीथी में, जहाँ नर-नारी, अश्रु-प्रवाह के कारण खेत के जैसे कीचड़ से भरी धरती पर पडे थे, चलकर बड़ी कठिनाई से आगे बढ़े।
राम आगे-आगे जा रहे थे, उनके साथ सीता वल्कल पहने पीछे-पीछे जा रही थी और उनके पीछे दृढ़ धनुर्धारी लक्ष्मण जा रहे थे। उस दृश्य को देखकर, उस नगर के लोगो को जो दुःख हुआ, उसका वर्णन करना संभव नही है।
उस समय कोई भी अमंगल उत्पन्न करने के कारण रोये नही। सब व्याकुल चित्त