भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

अयोध्याकाण्ड २२३

पुरुषों के वक्ष पर युवतियों के स्तन-रूपी नारिकेल अंचित नहीं हो रहे थे—(अर्थात्, वे आलिंगन नहीं कर रहे थे)। पुष्प-समुदाय, चंदन-लेप करनेवाले पुरुषों के केशों को तथा उनकी युवतियों के केशों को अलंकृत नहीं कर रहे थे।

बड़े गज, मुखपट्ट और उत्तम आभरणों से घृणा करते थे। सौध-समुदाय, शिखरों में पहनने योग्य सुन्दर अलंकारों से घृणा करते थे। ध्वजाएँ, आकर्षक सौंदर्य से रहित हो गई थीं। स्वर्णमय मनोहर प्राचीर, मृदुगतिवाले कबूतरों तथा कबूतरियों की सुन्दरता से रहित हो गये।

सुख-दुःख को समान रूप से देखनेवाले योगी भी अधिक पीड़ा से दुःखी हुए। फिर, उन साधारण संसारी व्यक्तियों के बारे में क्या कहा जाय, जो दुःख के समय, अपने पाप का फल मानकर व्याकुल होते हैं और सुख प्राप्त होने पर पुण्य का फल मानकर आनंदित होते हैं।

वह अयोध्यानागर, (प्राणियों के) शरीरों से निःश्वास के साथ बाहर न निकलनेवाले प्राणों के व्याकुल होने से, मनोहर शोभा के मिट जाने से, अत्यधिक पीड़ा कारक दुःख के बढ़ने से तथा न मिटनेवाली पंचेंद्रियों के अस्त-व्यस्त होने से, उन (दशरथ) के समान ही लगते थे, जो (राम के विरह में) अपने प्राण छोड़ रहे थे।

इस प्रकार, जब उस नगर के लोग अत्यन्त कातर होकर पीड़ित हो रहे थे, कहीं झुण्ड बाँधकर खड़े थे और कहीं बुद्धिभ्रष्ट हो रोते हुए पीछे-पीछे चल रहे थे, तब राम, जो सचरणमान विविध प्राणियों की एक आत्मा के समान थे, उज्ज्वल आभरण-भूषित स्तनवती जानकी के आवास में जा पहुँचे।

ज्यों ही सीता ने वल्कलधारी राम को एवं उनके पाश्र्वों में माताओं, मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओं को रोते हुए तथा धूलि-भरे शरीरों के साथ आते हुए देखा, त्यों ही वह चित्र-प्रतिमा जैसी सुन्दरी, स्तब्ध होकर उठ खड़ी हो गई।

इस प्रकार उठकर खड़ी होनेवाली उन सीता का आलिंगन करके उनकी सासों ने उन्हें अंजन-अंचित नयनों के नूतन नीर से नहलाया। तब जानकी, जो उस परिस्थिति का कारण नहीं जानती थीं, व्याकुल चित्त के साथ अपनी विशाल आँखों से राम को देखकर अश्रु-धारा बहाती हुई—

और विद्युत् के समान काँपती हुई बोलीं—हे स्वर्णवीर-वलयधारी ! इस दुःख का कारण क्या है ? क्या कीर्तिमान् चक्रवर्ती को कुछ विपदा हुई है ? क्या हुआ ? बताइए।

राम ने सीता से कहा—मेरा उपमा-रहित भाई (भरत) राज्य करेगा। अपने आश्रयभूत गुरुजनों की आज्ञा से, मैं मेघों से भरित घने वन में जाऊँगा और उस वन को देखकर फिर लौट आऊँगा। तुम दुःखी मत होओ।

'पति राज्य के अधिकार से वंचित हो गये और वन-गमन करनेवाले हैं'—इस विचार से सीता दुःखी नहीं हुईं। किन्तु 'तुम दुःखी मत होओ, मैं जा रहा हूँ'—राम का यह कठोर वचन ही (सीता को) अत्यन्त पीड़ित कर रहा था।

जब विष्णु भगवान् 'धर्म मिट जायगा, उसकी रक्षा करनी है।'—इस विचार से क्षीरसागर में अपने पर्यंक को छोड़कर अयोध्या में अवतीर्ण हुए थे, तब लक्ष्मी देवी भी