कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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कव रामायण
हुई उत्तम कर्णाभरणो से युक्त सुदरियाँ घन-पटल के समान केशपाशो को धरती पर फैलाये अपने आभरण बिखेरते हुए झुण्डो में जा रही थी।
पर्वत-समान सौधो की पताकाएँ संकुचित हो गई। उत्तम भेरियो के शब्द थम गये। विविध वाद्यो के नाद दब गये। प्रासादो के प्राचीरो से बाहर की वीथियो की धूल धरती में चारों ओर बहनेवाली अश्रुधारा से दब गई।
रसोईघर धूम-हीन हो गये। ऊँचे सौध अगरु-धूम से विहीन हो गये। शुको के पात्र दूध से विहीन हो गये और उत्तम रत्न-जटित पालने और उनमे सोनेवाले शिशु, स्त्रियो के आगमन से विहीन हो गये—(अर्थात्, पालनों में स्थित बच्चो के रोने पर भी माताएँ नही आती थी।)
सबके मुख प्राण-हीन जैसे कान्ति-रहित हो गये। मेघ-समूह वर्षा-रहित हो गये। घोडे, स्वच्छ जल से युक्त अश्व-शालाओ को छोड़कर चले गये। मत्तगज, पुष्पो के मधु को पीनेवाले भ्रमरो के जैसे, अपने आनन्द को छोड़कर चले गये।
छत्र छाया नही कर रहे थे। दीर्घ नयनोवाली रमणियो के केश पुष्पो से शोभित नही हो रहे थे। पुरुषो के पाट-युगल वीर-वलयो से युक्त नही थे। क्रोधी मन्मथ के बाण भी उष्णता-विहीन हो गये। हस अपनी इसिनी को छोड़कर चल पड़े।
वीथियाँ, अश्वो की किंकिणियो की ध्वनि, भेरियो के चर्म-आवरण की ध्वनि और मेघ-समान शब्द करनेवाले रथों की ध्वनि से रहित होकर स्वच्छ वीचियो से युक्त जल की ध्वनि से विहीन समुद्र के समान लगने लगी।
गजवीथियो मे रोदन की ध्वनियो को छोड़कर वाद्यो की ध्वनियाँ नहीं होती थी। वीणा-तन्त्रियो के क्रमबद्ध स्वरो की ध्वनि नही होती थी। अनिमेष नयनोवाले देवो के उत्सवो मे उत्पन्न होनेवाली ध्वनि भी नही हो रही थी।
स्पष्ट शब्दवाले नूपुरो से प्रतिध्वनित सौध, अब शब्द-रहित थे। मेखलाओ के सबध मे भी यही बात थी। जलचर पक्षी नही बोल रहे थे। उद्यान मे भी ऐसी ही बात थी। पुष्पों में भ्रमर शब्द नहीं कर रहे थे। हाथी भी ऐसे ही हो गये।
खेत, जल को भूल गये—(अर्थात्, किसान खेतो को सींचने की बात भूल गये।) लाल अधरवाली सुन्दरीयों के कर, नवजात शिशुओ को भूल गये। प्रज्वलित होमाग्नियाँ, घृत को भूल गईं—(अर्थात्, ब्राह्मण उनमे घृत का होम करना भूल गये।) आत्मज्ञानी आत्मतत्त्व को भूल गये। बटू, शब्द को भूल गये—(अर्थात्, वेदो का वाचन बन्द हो गया)।
झुण्डों मे नृत्य करनेवाले अब रो पड़े। अमृत-समान मधुर सप्त स्वरो मे गान करनेवाले अब रो पड़े। अपने प्रियतमो के साथ प्रणय-कलह मे कुपित तथा पुष्पमालाओ से ग्रथित सुन्दरीयाँ अब रो पड़ीं। अपने प्रियतमो से मिलकर (आनन्दित) रहनेवाली सुन्दरीयाँ भी अब रो पड़ीं।
हाथी जलाशयों के पास जाकर अपनी सूँड, जल पीने के लिए नहीं बढ़ाते थे। घोड़े मुँह मे घास नहीं लेते थे। पक्षी अपने बच्चो के लिए आहार नही लाते थे। गायें अपने बछड़ों को दूध नहीं पिलाती थी और उनके थन व्याकुलता से द्रवित हो रहे थे।