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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

अयोध्याकाण्ड २२१

होकर राम के पीछे-पीछे चलनेवाला दो पुत्रों की जननी (सुमित्रा) का यह पुत्र (लक्ष्मण) ही इस नगर-भर में राम का अनन्य बन्धु है ।

कुछ लोग यह कहते हुए कि पत्थर से भी अधिक कठोर अपने हृदयो को हम फरसे से काट देंगे—दौड़ जाते थे और मार्ग-मध्य अपने अश्रुओं के कारण उत्पन्न कीचड़ में फिसलकर गिर पड़ते थे।

कुछ लोग अपने शरीर पर से रत्नाभरणों को उतारकर फेंक देते थे। विद्युत्-समान कांति से युक्त अपने शरीर पर से रंग-बिरंगे वस्त्रों को फाड़कर फेंक देते थे और छोटे फटे वस्त्र पहन लेते थे।

कुछ लोग कह रहे थे—संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अनेक पुत्रों के होने पर भी, यदि उनका कोई एक पुत्र किसी अवयव से हीन होकर उत्पन्न होता है, तो अपने प्राण छोड़ देते हैं। किन्तु इन चक्रवर्ती का, जो अपने ज्येष्ठ पुत्र को अरण्य में भेजकर अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं, उनका मन लोहे से भी अधिक कठोर है।

कुछ लोग कह रहे थे—यह रामचन्द्र मेघ के अतिरिक्त अन्य किसी उपमान से हीन श्रेष्ठ करुणा की मूर्त्ति है, इसके अतिरिक्त इसमें दूसरी कोई कमी नहीं है। यदि नगर की सारी प्रजा इसके साथ ही अरण्य में जा बसे, तब भी क्या कैकेयी अपने प्रिय पुत्र के साथ इस पृथ्वी का शासन करती रहेगी ?

कुछ-कुछ झुकी हुई सूक्ष्म कटि को दुखानेवाले स्तन-भार से युक्त स्त्रियाँ रोदन की ध्वनि के साथ, घने 'कान्तल' पुष्प-सदृश अपने अरुण करों को सिर पर रखे हुए, लताओं के समान एक ओर खड़ी रहीं।

चन्द्र को छूनेवाले शिखरों से युक्त प्रासादों की ऊपरी मंजिलों में खड़ी हुई स्त्रियों की आँखों से निरंतर बहनेवाले आँसू उनके स्तनों को भिंगो रहे थे। वे स्त्रियाँ पर्वत-शिखरों पर स्थित मयूरों के समान दुःखी हो रही थीं।

मेघ-सदृश अगरु-धूम से भरे सौधों के विशाल वातायनों से (राम को) देखनेवाली गद्गद स्वरवाली स्त्रियों की अंजन-लगी आँखों से अश्रुजल निर्झर के समान बह रहा था। वे स्त्रियाँ पिंजरस्थ शुक के समान रो रही थीं।

सौधों की ऊपरी मंजिलों से देखनेवाले लोगों की आँखों से बड़ी-बड़ी अश्रुधाराएँ निकलकर सौधों के बाहर बह रही थीं। अतः, ऐसा लगता था, मानो वे सौध भी चक्रवर्त्ती-कुमार (राम) के प्रति दुःखी होकर रो रहे हैं।

स्त्रियाँ अपने शिशुओं को भूल गईं। पुत्र अपनी माता को भूल गये। इस प्रकार, उस नगर के लोग व्याकुल होकर बड़ी पीड़ा से प्रजा-रहित-से होकर बड़े शब्द के साथ रो रहे थे।

'कामर' (नामक) राग के समान मृदु स्वरवाली सब सुन्दरियाँ वीथी में एक हो गईं, जिससे धवल प्रासाद, सुन्दर दृश्य तथा सुगंधित केशोंवाली लक्ष्मी से विहीन कमल के समान लगते थे।

शर-विद्ध हरिणियों विकल हो रही हों—इस प्रकार...