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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

अयोध्याकाण्ड | २२५

के साथ यह सोचकर कि राम के पहले ही हम वन में पहुँच जायेंगे, कोलाहल-ध्वनि बढ़ाते हुए, आगे बढ़ चले।

विजयमाला से भूषित भाले को धारण करनेवाले रामचंद्र अपने पिता के सौध-द्वार पर पहुँचे। वहाँ अपनी माताओं के प्रति कर जोड़कर विनती की कि आप लोग यही रहकर चक्रवर्त्ती को सान्त्वना दें। यह सुनकर माताएँ मूर्च्छित होकर गिर गईं।

सञ्ज्ञा लौटने पर उन्होंने गद्गद कंठ से पुत्र (राम) को आशीष दिये। पुत्र-वधू की प्रशंसा की। कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) की प्रस्तुति की और देवताओ से प्रार्थना की कि हे कुल-देवताओ! इनकी रक्षा करना।

उन माताओं के बड़ी कठिनाई से हटने पर, राम ने मुनिवर वसिष्ठ को प्रणाम किया। फिर, स्वयं अपने प्राण-समान भाई और सीता के साथ एक रथ पर आरूढ होकर चल पड़े। (१-२४०)


अध्याय ५

तैल-निमज्जन पटल

विशाल सेना से युक्त चक्रवर्त्ती से कभी वियुक्त न होनेवाली उनकी पत्नियाँ (राम के साथ न जाकर) रुक गईं। उस दिव्य नगर में स्थित चित्र भी प्राणहीन होने के कारण (जाने से) रह गये। इनको छोड़कर, पिता की आज्ञा से (वन) जानेवाले राम के साथ न जानेवाला वहाँ कोई नहीं रहा।

वह स्वर्णमय रथ, उसके चारो ओर उष्ण अश्रु-जल के प्रवाहित होने से, धीरे-धीरे चल रहा था और उस दिव्य मत्स्य (विष्णु के मत्स्यावतार) के समान लगता था, जिसने सप्त लोकों को एक करनेवाले महान् समुद्र के जल में संचरण करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया था।

सूर्य मानों राम को वन जाते हुए नहीं देखना चाहता हो, (इसलिए) वह पर्वत के मध्य जा छिपने के लिए त्वरित गति से बढ़ चला। तब गायें और भैंसे अपने गोष्ठों में आकर प्रविष्ट हुईं। धूप मिट गई और नक्षत्र चमकने लगे।

कमलभव ब्रह्मा के द्वारा चन्द्र के खंडों को लेकर निर्मित उज्ज्वल ललाटवाली सुन्दरियों के वदन के समान कमल-पुष्पों के समूह, अश्रुजल-रूपी मद्य के प्रवाहित होने से शोभाहीन होकर मुँह झुकाये खड़े रहे।

सन्ध्याकाल में सूर्य के अस्तंगत होने से आकाश-प्रदेश, मंथरा के वचन-रूपी विष से विकृत हुए कैकेयी के मन के समान ही, अपनी अरुणिमा को (प्रकाश को) छोड़कर अन्धकार से भर गया।