कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ | कम्ब रामायण
होने से कोश में रखे हुए भाले से युक्त हे प्रभो ! आप पूर्वजों से प्राप्त अपना समस्त स्वत्व खोकर जा रहे हैं; तो क्या हमें भी छोड़ जाना चाहते हैं ?
लक्ष्मण के यह कहने पर रामचन्द्र कुछ नहीं कह सके और पर्वत-सदृश कंधोंवाले लक्ष्मण का वदन देखते रहे। लक्ष्मण के मन की पीडा को जानकर अपने सुगन्धित विशाल कमल जैसे नयनों से अश्रुधार बहाते हुए खड़े रहे।
उसी समय प्रेम-भरे तथा पवित्र तप से संपन्न मुनिवर (वसिष्ठ) राजसभा से वहाँ आये। दोनो मनोहर राजकुमारों ने उनके प्रति सिर झुकाया। (उन्हें देखकर) मुनिवर दुःखनामक महासमुद्र में डूब गये।
तत्त्वज्ञान से संपन्न मुनिवर ने उन (राम-लक्ष्मण) के वदन को तथा उनके मन को भी देखा। उनकी कटि में बंधे वल्कल की शोभा को देखा। फिर क्या कहना है ! उस समय उत्पन्न मनोवेदना के कारण मुनिवर अपने को भी भूल गये।
जो दिन (रामचन्द्र के) राजतिलक के उत्सव के लिए निश्चित हुआ था; उस सुखदायक दिन में राम ने, दुःखदायक विधि के प्रभाव से; वल्कल धारण किया। स्वयं चतुर्मुख ही नियति को बदलने का प्रयत्न क्यों न करे, तो भी नियति का विधान आकर घेर ही लेता है। ऐसी नियति को कौन मिटा सकता है ?
यह उत्पात, केवल कठोर कैकेयी के कारण ही उत्पन्न नहीं हुआ है। यह पुण्य-स्वरूप (राम) ऐसा दुःख पाने के योग्य भी नहीं हैं; तो किस कारण से यह सब संघटित हुआ ? यह किसका षड्यन्त्र है ? यह सब भविष्य में प्रकट होगा। इस प्रकार वसिष्ठ ने सोचा।
कोदण्ड तथा विशाल कमल-सदृश नयनों से शोभित वीर (राम) के समीप आकर वसिष्ठ ने कहा—हे वत्स ! तुम यहाँ से जाकर उन्नत पर्वतों से युक्त वन को देखोगे। किन्तु, अति विशाल सेना से युक्त चक्रवर्त्ती को जीवित नहीं पाओगे।
तब आदिशेष के पर्यंक से हटकर पृथ्वी पर अवतीर्ण (श्रीराम) ने वसिष्ठ से कहा—चक्रवर्त्ती की आज्ञा को शिर पर धारण कर उसका पालन करना मेरा कर्त्तव्य है। उनके शोक को दूर करना आपका कर्त्तव्य है। यही न्याय है ।
तब वसिष्ठ ने कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा नहीं दी है कि तुम 'कंटकपूर्ण अरण्य में जाओ। हाँ, शत्रुओं के शर के समान वचन कहनेवाली क्रूर कैकेयी की ओर से पैनाये गये भाले को धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती ने उनको वर दिये हैं।
उज्ज्वल धर्म की रक्षा के लिए उत्पन्न राम ने कहा—मेरे पिता ने मेरी माता को वर दिये। मेरी माता ने मुझे (वन जाने की) आज्ञा दी। मैंने वह आज्ञा शिरोधार्य की। सबके साक्षी बने हुए आप क्या हमको रोकने का विचार कर रहे हैं ?
तब वसिष्ठ अवाक् होकर, धरती पर अश्रु बहाते हुए खड़े रहे। पर्वताकार कंधों-वाले राम, मुनिवर को प्रणाम करके चक्रवर्त्ती के स्वर्णमय प्राचीरों से युक्त प्रासाद के द्वार पर जा पहुँचे।
वल्कलों से शोभायमान, लक्ष्मण से अनुसृत, प्रभूत आनन्द से भरित और कमल से