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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 549 में से

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पृष्ठ 229

अयोध्याकाण्ड २१६

भी अधिक सुन्दर वदन से युक्त राम के निश्चय को जानकर उस नगर के लोगो को जो दुःख हुआ, अब हम उसका वर्णन किसी प्रकार से करेगे ।

ब्राह्मणो, अपूर्व तपस्या से युक्त मुनियो, राजाओ तथा उस देश के निवासियो के हृदय की दशा के बारे मे हम क्या कहे ? (इस घटना से) देवता लोग भी इतने दुःखी हुए कि उन्होने भविष्य मे उत्पन्न होनेवाले सुख को भी त्याग दिया ।

देव-रमणियो की समता करनेवाली नारियाँ ( वल्कलधारी ) राम को देखकर अपने करो से अपनी मदभरी आँखो पर इस प्रकार प्रहार करने लगी, जैसे कमलपुष्प पर मँडरानेवाले मत्त भ्रमरो को घने पल्लवो से उड़ा रही हो ।

कुछ लोग ( राम के प्रति ) अछीण अनुराग के कारण राम के पिता के पूर्व ही स्वर्ग मे जा पहुँचे। क्या इसका कारण उनका द्विविध कर्म-बन्धन को तोड़ देना था ? या उनके व्याकुल प्राणो का लौटकर नही आना था ?

कुछ गिर पड़े। कुछ सिसक-सिसककर रो उठे। कुछ अपनी आँखो से बहनेवाले अश्रुओ से ढक गये ! कुछ इस प्रकार कातर हो उठे, मानो उनके केशो में आग लग गई हो ।

कुछ लोग, जो इस प्रकार दुःखी थे, जैसे प्रभूत संपत्ति को खो बैठे हो और जो इक्षुरस-समान ( मधुर ) वचनवाले थे, आँखो से आँसू न बहाते हुए लौह-सदृश हृदयो के साथ स्तम्भ हो खड़े रहे। कदाचित् अपार दुःख से उनकी बुद्धि भ्रात हो गई थी ।

कुछ लोगो के शरीर से निकले हुए प्राण एक दशा में स्थिर नही रहे और ऐसे हो गये कि अभी चले, अभी चले। कुछ के प्राण बाहर निकलकर पुनः शरीर में लौट आये। कुछ लोगो की आँखो से, अश्रुओं के सूख जाने से, रक्त ऐसे बहने लगा, जैसे घाव से बहता है।

दो सूँडोवाले हाथी-जैसे ( भुजाओवाले ) अनेक वीरो ने अपने बड़े करवाल से अपने शिर को काट डाला और एक हाथ में ( अपना शिर ) रखकर उसे उछालने लगे और कुछ वीरो ने अपने कमल-नेत्रो को कटार से भोककर निकाल दिया ।

उनके ( स्त्रियों के ) आभरण बिखर पड़े। आभरणो के रत्न बिखर पड़े। पुष्पहार-जैसी मेखलाएँ बिखर गई । रमणियो के उज्ज्वल मंदहास अदृश्य हो गये। उनके सुन्दर वदन ( जो पहले कभी चन्द्रमा से परास्त नही होते थे, अब ) चन्द्रमा से परास्त हो गये ।

चक्रवर्त्ती की पवित्र पातिव्रत्यवाली साठ सहस्र पत्नियाँ अश्रु बहाती हुई राम के पीछे-पीछे चली ओर अपने मुँह खोलकर वीची-भरे समुद्र के समान शब्द करती हुई रो पड़ीं।

वे स्त्रियाँ, जिनके राम के अतिरिक्त अन्य कोई पुत्र नही था, इस प्रकार ( भूमि पर ) गिरकर रोती थी, जैसे मयूर, कोकिल और हस पंखो से हीन होकर धरती पर आ गिरे हो ।

उन स्त्रियो की अमृत से भी अधिक मधुर वाणी, अविराम रूप में निःश्वास भरते हुए रोते रहने के कारण, वंशी तथा तन्त्री से युक्त मधुर नादवाले याक्-वाद्य से हार गई ।

अहो ! क्या ( राम के ) जाने योग्य स्थान अरण्य है ! कहकर वे स्त्रियाँ विलाप कर रही थी। उनके वदनो से विशाल चहार-दिवारी से युक्त प्रासाद एक