कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २१५
वन जाने की आज्ञा देने में मुझ पर अधिक प्रेम रखनेवाले) चक्रवर्त्ती का कोई दोष नहीं हैं। जन्म देकर अब मुझे वन में जाने की आज्ञा देने में, अबतक हम पर वात्सल्य रखनेवाली माता (कैकेयी) का भी दोष नहीं है। इसमें (कैकेयी) के पुत्र भरत का भी दोष नहीं है! हे वत्स ! यह विधि का ही दोष है। इसके लिए तुम क्यों क्रोध करते हो?—यों श्रीराम ने कहा।
तब लक्ष्मण ने लुहार की विशाल भट्टी की अग्नि के समान, निःश्वास भरकर उत्तर दिया—ताप से भरे अपने इस हृदय को मैं कैसे शान्त करूँ ? मेरा यह धनुष उत्पात उत्पन्न करनेवाली (कैकेयी) के मन में सन्मति उत्पन्न करेगा और त्रिदेवों के वश में भी न रहनेवाली बहुत ही बलवान् नियति के लिए भी नियति बनेगा। आप देखेंगे।
लक्ष्मण के यों कहने पर राम ने उनसे कहा—हे तात ! वेदों के तत्त्व को जाननेवाले तुम, अपने मुँह में जो कुछ बात आती है, उसे कह रहे हो। तुमने जो कहा, वह धर्म का अनुसरण करनेवाले लोगों में नहीं देखा जाता। (तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कार्य करनेवाले) जब तुम्हारे माता-पिता ही हैं, तब उनपर क्रोध कैसे कर सकते हो १
चन्द्रकला को शिर पर धारण करनेवाले रुद्र के समान रोष से भरे हुए लक्ष्मण ने कहा—दूसरों को अपना स्वत्व दान करने की भीख पाये हुए हे उदार ! मेरे उत्तम पिता आप हैं। स्वामी आप हैं। जननी आप हैं। मेरे अन्य कोई नहीं हैं। आज आप मेरे धनुष के प्रभाव को देखें। और, उसने आगे का कार्य करने के लिए अपना हाथ उठाया।
तब वरद (राम) उनसे कहने लगे—माता (कैकेयी) ही. जिसने वर प्राप्त किया है, वास्तव में इस राज्य को पाने का अधिकार रखती हैं। उनके और मेरे पिता की आज्ञा से भरत इस राज्य का अधिकार प्राप्त करेगा। अब मैं जो ऐश्वर्य प्राप्त करनेवाला हूँ, वह है तपस्या। वह इस राज्य से भी अधिक सुखदायक है। उनसे बढ़कर वस्तु और क्या हो सकती है ?
राम आगे बोले—हे भाई! तुम्हारा यह कोप कैसे शांत होगा ? क्या इस संसार की माया से पृथक् रहकर पवित्र सन्मार्ग पर जीवन व्यतीत करनेवाले भाई (भरत) को युद्ध में मारकर, या महापुरुषों के द्वारा प्रशंसित अनुपम कार्य करनेवाले पिता (दशरथ) को पीड़ा देकर, अथवा जननी को परास्त करके?—कहो, कैसे शांत होगा ?
मन को प्रभावित करनेवाले वचन कहने में समर्थ (राम) के वचनों के उत्तर में लक्ष्मण ने कहा—शत्रुओं के द्वारा भी प्रशंसा पानेवाला मैं, बढ़े हुए दो पर्वतों के समान दो भुजाओं का भार व्यर्थ ही वहन कर रहा हूँ। तूणीर एवं दृढ धनुष को भी ढोने के लिए मैं उत्पन्न हुआ हूँ। अब (मेरे) क्रोध करने से क्या लाभ ?
तब दक्षिण की भाषा (-रूपी समुद्र) के पारगत तथा संस्कृत-भाषा के शास्त्र तथा विज्ञान की सीमा तक पहुँचे हुए राम ने लक्ष्मण से कहा—अबतक जिन पिता ने मुझे मधुर वचन कहकर तथा पाल-पोसकर बड़ा किया, उनके वचन का उल्लङ्घन करके तुम यदि कुछ करोगे, तो उससे तुम्हारी क्या हानि होगी ?'
१ अन्तिम वाक्य में लक्ष्मण की आलोचना अंतर्निहित है।—अनु०