कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ | कंब रामायण
प्रलयकालीन अग्नि को भी शांत करनेवाले कालमेघ के समान, अनुपम और मृदुल वचन-रूपी वर्षा की बूँद बरसाते हुए आये।
उज्ज्वल स्वर्ण-समान देह तथा मेघ-समान विशाल हाथों से शोभायमान लक्ष्मण को विद्युत्-समान क्रोधाग्नि प्रकट करते हुए देखकर रामचंद्र ने कहा—हे मेरे वत्स! कभी क्रोध न करनेवाले तुम अब युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गये हो। यों धनुष उठाने का क्या कारण है?
तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया सत्य को मिटाकर, तुम्हारे असाधारण राज्य को तुम से छीननेवाली और काले मनवाली उस (कैकेयी) की आँखों के सामने ही तुमको राज-मुकुट पहना दूँगा। उसमें विघ्न डालने के लिए स्वयं देवता भी क्यों न आवें, उनको मैं तूल को जलानेवाली अग्नि के समान जला दूँगा।
जबतक यह दृढ़ धनुष मेरे हाथ में रहेगा, तबतक वे देवता भी कुछ विघ्न उत्पन्न करने का साहस नहीं कर सकते। यदि वे विघ्न उत्पन्न भी करें, तो भी मैं अपने शर का लक्ष्य बनाकर उन्हें जला दूँगा और चतुर्दश भुवन की रक्षा का भार अभी आप को सौंप दूँगा। आप उसे स्वीकार करें—यों लक्ष्मण ने कहा।
अपने अनुज की बातें सुनकर राम ने कहा—तुम्हारी बुद्धि सदा शास्त्र विहित न्याय के अनुकूल मार्ग में चलती है। किन्तु, आज नीति के विरुद्ध, अविनाश्वर धर्म को भी मिटाता हुआ, यह क्रोध तुम्हारे मन में कैसे उत्पन्न हुआ?
ज्येष्ठ भ्राता के यह कहने पर, लक्ष्मण अपने दाँतों को प्रकट करते हुए हँस पड़े और कहा—आपके पिता ने कहा कि यह विशाल पृथ्वी तुम्हारी है, तो इस पृथ्वी को स्वीकार करके, पुनः उसे खोकर आप वन को जा रहे हैं। ऐसे समय में मुझे क्रोध उत्पन्न न होकर और किस समय उत्पन्न होगा?
मेरी आँखों के सामने ही आपको राज्य देकर, फिर 'नहीं' कह देनेवाले तथा क्रूर मनवाले चक्रवर्ती के समान ही प्रेमहीन माता (कैकेयी) तुम को अरण्य भेज रही हैं, ऐसे समय में क्या मैं दुःखदायक इन्द्रियों से युक्त इस देह को धारण करके अपने प्राणों की रक्षा करता रहूँगा?
यही मेरे क्रोध का कारण है। इस प्रकार, लक्ष्मण के अपना कथन समाप्त करने के पूर्व ही, अपने बछड़े पर प्रेम रखनेवाली गाय के समान, विविध योनियों में उत्पन्न प्राणियों की रक्षा करनेवाले, अपने करों में आजानुचक्र तथा दृढ़ कोदंड धारण करनेवाले, गनु नामक उन्नत स्कंधोंवाले वीर के वंश में उत्पन्न श्रीराम ये वचन करने लगे।
विद्युत् को अपनी कांति से परास्त करनेवाला तथा सूर्य-किरण एवं अग्नि से निर्मित माला को धारण करनेवाले (हे लक्ष्मण)। मुकुटधारी चक्रवर्ती ने जब राज्य का भार मुझे देने की बात कही, तब यह विचार किये बिना ही कि यह राज्य पीछे अनेक कष्ट उत्पन्न करेगा, मैं उसे स्वीकार करने को राजी हो गया। यह मेरा ही अपराध है। इसमें चक्रवर्ती का क्या दोष है?
गङ्गा ... में, सुख पाने में नदी का कोई दोष नहीं होता। उसी प्रकार (मुझे