कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीयोध्याकाण्ड २१३
युक्त क्षुद्र श्वान को देना चाहती है। अहो ! इस नारी की बुद्धि भी अच्छी है ! इस प्रकार कहकर गंगा के अधिपति ¹ (लक्ष्मण) हाथ-पर-हाथ मारकर हँस पड़े।
लक्ष्मण ने चारो ओर रत्नो से जटित करवाल को अपने पार्श्व मे बाँध लिया, धनुष को उठा लिया। शीतल मेरु पर्वत पर स्थित वॉवी के समान तूणीर को पीठ पर बाँध लिया और रक्त स्वर्ण से निर्मित कवच से अपने उन्नत कन्धों तथा वक्ष को आवृत कर लिया।
उनके पैरो के वीर-कंकण ऐसी ध्वनि कर रहे थे कि उनसे समुद्र भी लज्जित होते थे। धरती को छूनेवाली (उनके धनुष की) डोरी की बड़ी ध्वनि युगान्त काल में सप्त समुद्रो के जल को पीकर गरजनेवाले मेघ की ध्वनि से भी तिगुनी अधिक थी।
स्वयं (अर्थात् लक्ष्मण) और उनके ज्येष्ठ भ्राता (राम) इन दोनो को छोड़कर, अन्य सब त्रिलोकवासी प्राणी 'ऐसा सोचकर कि विशाल आकाश, धरती, इत्यादि पाँचो अपार भूत ऊपर से नीचे की ओर गिर रहे हैं,' भय से काँपने लगे। ऐसा उस लक्ष्मण का वीर-वेष था।
लक्ष्मण गरजकर बोले—युद्ध में आये सब वीरो को मिटाकर मैं भूमि का भार कम करूँगा। उनकी देहो से धरती को पाट दूँगा। मेरे प्रभु (राम) को आज ही मै विजयप्रद मुकुट पहनाऊँगा। जो मुझे रोकनेवाले हो, आवे, रोके।
देव, मर्त्य, विद्याधर, नाग तथा अन्य सब स्थानो के निवासी पड़े रहे। भूमि की सृष्टि, रक्षा तथा प्रलय करनेवाले स्वय त्रिदेव भी क्यो न मेरा सामना करने आवे, तो भी मै नारी की इच्छा (अर्थात्, कैकेयी की इच्छा) पूर्ण नही होने दूँगा।
चक्रवर्त्ती-कुमार लक्ष्मण आकाश के मध्य-स्थित सूर्य के समान उग्रता दिखा रहे थे। उस नगर मे वे इस प्रकार घूम रहे थे, जैसे सुन्दर शिखरो से युक्त मन्दर-पर्वत पूर्वकाल मे क्षीरसमुद्र के मध्य घूमा था।
उस समय राम, विरोधकारी क्रूरता से पूर्ण कैकेयी के द्वारा उत्पादित उत्पात से व्याकुल होकर, सान्त्वना देने पर भी शान्ति न पानेवाली सुमित्रा के पास थे। उन्होंने अपने सहचर बलवान् अनुज (लक्ष्मण) के धनुष-रूपी मेघ से उत्पन्न, ब्रह्माण्ड को भेदनेवाले टकार- रूपी गर्जन को सुना।
तुरत वे, अन्यत्रदुर्लभ शोभा से युक्त आभरणो की कान्ति को चारो ओर बिखेरते हुए, वक्ष पर उज्ज्वल मुक्तामाला से शोभित होते हुए, किसी से शान्त न होनेवाली
१ लक्ष्मण को गंगा का अधिपति कहा गया है। इसकी विविध प्रकार से व्याख्या की गई है •
(क) कोशल देश की सीमा में गंगा बहती है, अतः कोशल के राजा गंगापति माने जाते हैं।
(ख) सरयू नदी का एक नाम है 'रामगंगा'। कोशल देश में उस नदी के बहने से वहाँ के राजा गंगापति हुए।
(ग) सब नदियों के लिए गंगा शब्द का व्यवहार साधारण है • अतः यहाँ गंगा का अर्थ सरयू है और उस देश का राजा लक्ष्मण गंगापति है।
(घ) गंगा को स्वर्ग से धरती पर लानेवाले थे भगीरथ . उनके वंश में उत्पन्न होनेवाले लोग गंगापति कहे गये हैं। —अनु०