भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222
२१२कंब रामायण

कुछ लोग कहते—कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राज्य तो माँगा, किन्तु राम को देश से निष्कासित क्यो कर रही है ? इसका कारण इतना ही है कि इसने ऐसा पाप-कार्य करने का निश्चय कर लिया है । और, कोई यह कहकर व्याकुल होते कि यह कैकेयी रक्त अधरवाली गणिका-तुल्य है, क्योकि इसके हृदय मे पति के प्रति गाढानुरक्ति नही है ।

कुछ लोग कहते थे—क्या चक्रवर्ती ने घोर तपस्या करके अपने प्राणो को छोडने का निश्चय किया है ? नही तो, क्या इस ससार के रहनेवाले सब लोगों को मारकर इसे समूल विनष्ट करने का यह उपाय है ? अहो ! कैकेयी को दशरथ का यह वर देना भी भला है । भला है ।

रामचन्द्र, जिन्होंने प्राप्त राज्य को उस (कैकेयी) को दे दिया है, स्वय ज्येष्ठ होकर जन्म पाने के कारण त्रिलोक के राज्य के अधिकारी हैं। हम सब उनसे पृथक् न होकर वन मे जाकर उनके साथ निवास करेंगे । वैसा करने से झाड तथा वृक्षों से भरा हुआ कानन भी कुछ दिनो मे नगर बन जायगा ।

दशरथ का यह कार्य भी कैसा विचित्र है ? अपने उपमा-रहित ज्येष्ठ पुत्र को पहले राज्य देकर फिर न्याय-भ्रष्ट होकर उनके अनुज को वह राज्य दे रहे हैं। क्या यह सत्य के विरुद्ध नही है ?

नगर के लोग कहते—विजयमाला-भूषित धनुष को धारण करनेवाले राम को जो पृथ्वी प्राप्त हुई है, उसे दूसरा कोई कैसे अपना सकता है ? सीता देवी इस नगर को छोड़कर जायेंगी, तो क्या राज्यलक्ष्मी भी (उसी प्रकार वन मे न जाकर) छलनामयी कैकेयी के पुत्र को अपनायगी ?

बिना बत्ती को बढ़ाये और बिना तेल डाले ही जलनेवाले और पवन के झोंके से भी विकृत न होनेवाले दीप के सदृश (शरीर-कातिवाली) स्त्रियाँ, क्या अब काँपती हुई, अरुण कमल-समान विशाल नयनवाले प्रभु की कृपा-दृष्टि प्राप्त किये बिना, जीवित रह सकेंगी ? हाय ! यह कैसा दुर्भाग्य है ।

जब इधर ऐसा हो रहा था, तब कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) ने यह सुना कि स्वभावतः तीक्ष्ण रहनेवाले भाले की समता करनेवाली आँखों से युक्त विमाता ने क्रूरता सहित, अपने वर से पृथ्वी (के राज्य) को माँग लिया है और ज्येष्ठ भ्राता को वन दे दिया है । यह सुनते ही वह, किसी के द्वारा प्रज्वलित न होनेवाली प्रलय-काल की अग्नि के समान, क्रोध से उमड़ उठा ।

(लक्ष्मण के) नयनो की कोरो से आग बरस पड़ी । भौंहो के रोम ललाट पर चढ़ गये । उनकी उग्रता से गगन का सूर्य भी अस्त-व्यस्त होने लगा । उनकी देह से स्वेद बह चला । उनके अन्तर की प्राणवायु बाहर प्रकट हुई । यो अति ऊँचे आकारवाले लक्ष्मण अपने आदिरूप (अर्थात् आदिशेष १) की ही समता करने लगे ।

यह कैकेयी सिंह-शावक के लिए रखे हुए स्वाद-भरे मांस को, विकृत नयनों से


१ लक्ष्मण आदिशेष के अवतार हैं ।