भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 219

अयोध्याकाण्ड २०६

से शोभित वक्षवाला वृत्तेश, उसका पुत्र था चतुर्वेण्टज शलभांशन ( शलभोजन ? ), उसी का मैं पुत्र हूँ । मेरा नाम सुरेचन है ।

इस समय, अपने नेत्रहीन माता-पिता के लिए जल लेने यहाँ आया था, यहाँ यह विपदा उत्पन्न हुई । हे पर्वत-समान कधोंवाले ! तुमने ( मनुष्य ) न जानकर हाथी के भ्रम से बाण प्रयुक्त किया । यह नियति का कार्य है। अतः, तुम दुःखी मत होओ ।

तीव्र पिपासा से मेरे माता-पिता दुःखी हो रहे हैं। हे अनुपम ! तुम जल ले जाकर मेरे माता-पिता को दो और मेरी मृत्यु का समाचार देकर उनसे कहो कि स्वर्गलोक को जाते हुए तुम्हारे पुत्र ने तुमको प्रणाम किया है। यह कहकर वह मुनि-कुमार स्वर्गलोक में देवों के स्वागत का पात्र बनकर चला गया ।

अपने पुत्र की प्रतीक्षा में ही बैठे हुए उन वृद्ध तपस्वी-दंपतियों के निकट मैं उस उनके पुत्र को और जल को लेकर पहुँचा। तब वे बोले—हे वत्स ! तू इतना विलंब करके लौटा है । हम यह सोचकर दुःखी हो रहे थे कि तुझ पर कोई विपदा तो नहीं आई । हे चन्दन-गन्ध से युक्त भुजावाले ! आओ, हम तेरा आलिंगन करेंगे ।

तब मैंने कहा—हे स्वामिन् ! मैं अयोध्या का रहनेवाला एक राजा हूँ । मैं शिकार की खोज में अँधेरे में बैठा हुआ था। उसी समय आपका सत्यभाषी पुत्र कमण्डलु में जल भरने लगा । तब आँखों से देखे विना, केवल शब्द को सुनकर मैंने बाण चलाया ।

शर के लगने पर (आपके पुत्र ने ) जब शब्द किया, तब यह जानकर कि यह हाथी नहीं, किन्तु कोई मनुष्य है, दौड़कर वहाँ गया और उससे पूछा कि तुम कौन हो ? सब वृत्तान्त कहकर वह शान्त हो गया और देवों के द्वारा स्वागत पाकर स्वर्गलोक में जा पहुँचा ।

मैंने बाण से (आपके पुत्र को ) मारा, इससे आप मुझपर क्रोध न करें । उस निरपराध के जल भरने से उत्पन्न शब्द को सुनकर मैंने उस दिशा में शर छोड़ा, किंतु आँखों से उसे नहीं देखा । मेरे इस अपराध को क्षमा करें । यह कहकर मैंने उनके चरणों को अपने सिर पर रख लिया ।

( पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर ) वे मुनि-दंपति गिर पड़े, मूच्छित हुए लोटने लगे। फिर कहने लगे—आज सचमुच हमारे नयन फूट गये। वे शोक-समुद्र में डूब गये । हे तात ! हे तात ! कहकर चिल्ला उठे । कह उठे कि तुमने हमारे हृदय के टुकड़े- टुकड़े कर दिये । फिर बोले—( हे पुत्र ) तुम स्वर्गलोक में चले गये । अब हम यहाँ रह नहीं सकते । हम भी आ गये, आ गये ।

इस प्रकार शोक-मग्न मुनि-दंपति के चरणों को प्रणाम करके मैंने कहा—आज से मैं ही आपका पुत्र हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करता हुआ, मैं आपकी सेवा में निरत रहूँगा । आप किंचित् भी शिथिलमन न हों । शोक को दूर कर दें । मेरा कथन सुनकर उन्होंने कहा—हे दृढ़ धनुर्धारिन् ! सुनो, फिर वे यों बोले—

आँख का तारा जैसे पुत्र को खोकर भी प्राणी पर लालसा रखकर यदि हम भोजन करने बैठे रहेंगे, तो समाज के लोग हमारी निंदा करेंगे । हम भी स्वर्ग में जायेंगे ।