कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० कंब रामायण
हे अलंकृत अश्ववाले ! तुम भी हमारे जैसे ही अपने पुत्र के विरह में (संसार का जीवन समाप्त करके) स्वर्ग में जाओगे। हे निरंतर अमल प्रकाश से शोभित श्वेतच्छत्रवाले ! तुमने प्रार्थना की है कि मैं आपकी शरण में हूँ। आप मेरी रक्षा करें। अतः, हम तुमको भयंकर शाप नहीं दे रहे हैं। आज अपने प्यारे पुत्र से, जो आज्ञा दिये बिना ही, इंगित-मात्र से सब कुछ जानकर हमारी इच्छा पूरी करता था, वियुक्त होकर जिस प्रकार हम स्वर्ग जा रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी विशाल स्वर्गलोक में जाओगे। यह कहकर वे स्वर्गलोक को सिधार गये। मैं अपने मन में किंचित् भी व्याकुल न हुआ, किन्तु उनकी मृत्यु के पश्चात्, उनके इस वचन से कि मेरे मधुर वचनवाला पुत्र होनेवाला है, आनन्दित होता हुआ नगर को लौटा। उस मुनि के कथन के अनुसार अब राम का वन-गमन और मेरा प्राण-त्याग दोनों अवश्य संघटित होनेवाले हैं। इसमें किंचित् भी परिवर्त्तन नहीं होगा- चक्रवर्ती ने यों कहा। चक्रवर्ती इस अत्यन्त दुःखदायक कथा को कहकर व्याकुल हो पड़े रहे। तब कौशल्या शोकोद्विग्न होकर मूर्च्छित हो गई। मुनिवर (वशिष्ठ) विधि के परिणाम से उत्पन्न होनेवाली दुःख-परंपरा को देखकर व्याकुल हुए और शीघ्र चलकर— प्रभूत कीर्त्तिमान्, पुण्यवान् तथा पर्वत-सदृश उन्नत मत्तगजों से युक्त चक्रवर्त्ती के मनोहर प्रासाद के सम्मुख, उत्तम सभा में जा पहुँचे, जहाँ नगाड़े बज रहे थे और राजा लोग राम के अभिषेक के लिए एकत्र थे। शस्त्रधारी राजाओं ने आये हुए मुनिवर को देखकर पूछा—हे पिता ! क्या कोई विघ्न उपस्थित हुआ है ? अपार पीड़ा से रोने की यह ध्वनि कैसी सुनाई पड़ रही है ? यह हमें बताकर हमारे मन को शान्त करें। मुनि ने उन राजाओं से कहा—कैकेयी ने चक्रवर्ती से दो वर प्राप्त किये थे। अप्रतिहत दंडनीतिवाले राजा ने भी वे वर उसे दिये थे। कैकेयी ने उन वरों में से एक से राम को वन-गमन की आज्ञा देने के लिए (राजा को) सहमत किया है, यही घटित हुआ है। चक्रवर्ती की आज्ञा से कैकेयी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र (भरत) आदिशेष पर स्थित पृथ्वी की रक्षा करेगा। ऊँचे कंधोंवाला, सीता का पति, राम वन में जाकर रहेगा। अभिन्नमत्स्यस्वभाववाले मुनिवर के वचन अपने कानों में पड़ने के पूर्व ही- अघट प्रेम से युक्त राजा लोग, मुनिगण, अन्य लोग एवं कंचुक-बद्ध स्तनोंवाली स्त्रियाँ, सब दशरथ के समान ही (मूर्च्छित हो) गिर पड़े। सबके शरीर, जैसे घाव पर आग रख दी गई हो, ऐसे ही पीड़ित होकर जलने लगे। वे निःश्वास भरते हुए और गद्गद वचन कहते हुए धरती पर गिरकर लोटने लगे। उनकी आँखों से बहनेवाला जल समुद्र के समान था। उस समय सब दिशाओं में जो बड़ी रोदन-ध्वनि निकली, वह स्वर्ग तक गूँज उठी। प्रभंजन के चलने से कंपित होनेवाली पुष्पलता के समान स्त्रियाँ अत्यंत दुःख में