भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 549 में से

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पृष्ठ 218

२०८ कब रामायण

प्रकार मेरा साथ देनेवाले हैं ? -- ( अर्थात्, आप गृहस्थ-जीवन मे मेरा सहारा देनेवाले हैं ; अब वैसा न करके मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं--यह क्या धर्म है ? ) कौशल्या ने फिर कहा—हे सत्यस्वरूप ! हे ससार के राजाओ के राजाधिराज । यदि आप अपने प्राणो को इस प्रकार पीडित करेंगे, तो सारा ससार इससे दुःखी होगा । मुनिवर के साथ कदाचित् हमारा पुत्र लौट आयगा । इसलिए, हे राजन् ! आप चितित न हो । इस प्रकार के विविध वचन कहकर कौशल्या, चक्रवर्ती के शरीर पर, पैरों पर और मुँह पर अपने अरुण करों को फेरती हुई राजा को सात्वना देने लगी । तब चक्रवर्ती धीरे-धीरे प्रज्ञावान् होकर बोले--क्या दृढ धनुर्धारी मेरा पुत्र लौट आयगा ? लौट आयगा ? चक्रवर्ती बोले--क्रूर तथा छलनामयी कैकेयी ने कुबड़ी की बातो को सुनकर मेरे पूर्व दिये वरों के द्वारा मेरे प्राण लेने का निश्चय कर लिया । अपने महिमा-पूर्ण सुत तथा स्वयं ( अपने लिए ) पृथ्वी का राज्य पाने के अतिरिक्त हाय ! मेरे ज्येष्ठ पुत्र को वन में जाने को कहा--वन में जाने को कहा । फिर चक्रवर्ती ने कौशल्या से कहा--हे कौशल्ये ! स्वर्ण अगद-धारी राम वन- गमन से नही रुकेगा, मेरे प्यारे प्राण भी गये बिना नही रहेगे । इसका एक और कारण भी है सुनो, पूर्व मे एक मुनि ने मुझे एक शाप दिया था । यों कहकर पूर्व घटित सारा वृत्तात सुनाने लगे । चक्रवर्ती ने कहा--पूर्वकाल मे एक दिन मैं आखेट की उमंग मे बड़े वन मे गया था और हाथियो और सिंहो को ढूँढ़ रहा था । फिर, एक सुन्दर नदी-तट पर जा पहुँचा, जहाँ हाथी सचरण करते थे । वहाँ हाथ मे धनुष-बाण लिये हुए छिपकर खड़ा रहा । उसी वन में एक अंधा तपस्वी, अपनी अंधी पत्नी-सहित रहता था। उनका प्रिय पुत्र ही उन मुनि-दंपति का एकमात्र सहारा था । वह मुनि-पुत्र नदी मे जल भरने के लिए आया । यह न जानकर, बल्कि कोई आगत आखेट समझकर मैने शर-संधान किया । तब वह मुनिकुमार आहत होकर धरती पर लोट गया और विलाप करने लगा । मैने उस मुनिकुमार द्वारा नदी मे जल भरने के शब्द को सुन, यह समझकर शर छोड़ा था कि कोई हाथी जल पी रहा है । मैने आँखो से देखकर शर-संधान नही किया । किंतु, हाथी की ध्वनि के बदले नर की ध्वनि सुनकर आशकित होकर मैं उस स्थान पर जा पहुँचा । वहाँ मैने उस कुमार को शर से विद्ध होकर छटपटाते हुए देखा । उसके हाथ से कमडलु लुढ़क गया था । तब मेरे शरीर, मन तथा धनुष शिथिल हो गये । उस मुनि- बालक पर गिरकर मैंने दुःख के साथ पूछा--हे वत्स ! हाय ! तू कौन है ? कह । किंचित् भी असत्य से परिचय न रखनेवाले उस ( अबोध ) बालक ने कहा— मत्स्यावतार लेनेवाले (वेदो को चुरानेवाले राक्षस को मारकर वेदो की रक्षा करनेवाले ) भगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न चतुर्मुख ने वेदोक्त प्रकार से जिन अनेक प्राणियो की सृष्टि की, उनमें मनुष्यों के चातुर्वण्यों में से प्रथम वर्ण में मेरा जन्म हुआ । चतुर्मुख की वंश-परंपरा में उत्पन्न काश्यप का पुत्र था विद्युत्-समान यज्ञोपवीत