कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २०७
तुम्हारे विरह को नगर के लोग भले ही सह ले, देवतालोग भले ही दुःखी न हों, तो भी हे स्वर्णमय रथवाले ! हे मेरे यशकारक ! हे मेरे प्राण ! तुमको जन्म देनेवाला, मैं तुम्हारे महत्त्व को जानता हूँ। अब अपनी दशा के बारे मे मैं क्या कहूँ ? मैं नहीं जिऊँगा । मैं नहीं जिऊँगा ।
मृदु सिकता से पूर्ण गम्भीर समुद्र से घिरी हुई विशाल पृथ्वी को, इस राज्य को, अक्षय संपत्ति को और अन्य सब वस्तुयो को छलनामयी कैकेयी को ही देकर यश पानेवाला मेरा उदार मन अब मेरे प्राण मिटा देगा, मेरे प्राण मिटा देगा ।
शब्दायमान समुद्र से आवृत्त इस पृथ्वी के निवासियो मे, देवताओ मे तथा पाताल के निवासियो मे तुम्हारे सदृश सद्गुणो से भूषित कौन हैं ? हे स्वर्णतुल्य ! जब परशुराम यह कहता हुआ आया था कि मेरे सामने खड़े रह सकनेवाला वीर कौन है ? तब दृढ़ चित्त के साथ तुमने उसका सामना करके उसे परास्त किया था। ऐसे तुमको छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?
तुम वन को जानेवाले हो, यह सुनकर भी मैं जीवित रहा। फिर भी, यदि अब मैं उत्तम स्वर्गलोक को नही जाऊँ, तो कठोरहृदय कहला सकता हूँ ? हे पुत्र ! यदि तुम वन में निवास करोगे और मैं इस कैकेयी को देखता हुआ इस नगर में रहूँगा, तो मेरा स्वभाव नीच ही तो कहा जायगा ।
लक्ष्मी तथा भू-देवी बड़ी तपस्या करके ही तुम्हारे बलवान् वक्ष का आलिंगन कर सकीं। तुम से वियुक्त होकर वे नहीं रहेंगी, नही रहेंगी। मैं पापी, तुम से वियुक्त होकर मर जाऊँगा । हे वत्स ! तुम्हारे विरह मे भी यदि मैं जीवित रहा, तो क्या मैं भी कैकेयी के समान नही हो जाऊँगा ?
तुमको उत्तम आभरणो, किरीट, स्वर्ण-आसन, श्वेतच्छत्र तथा विशाल वक्ष पर आसीन जयलक्ष्मी के साथ शोभायमान होते हुए देखना चाहता था, किन्तु इसके विपरीत वल्कल, कृष्णाजिन आदि से युक्त रहते हुए तुमको कैसे देख सकता हूँ ? ऐसी अवस्था में प्राण छोड़ देना ही मेरे लिए अच्छा है ।
इस प्रकार विविध वचन कहते हुए चक्रवर्ती यों व्याकुल हुए, जैसे उनके जीवन का अन्त आ पहुँचा हो । तब मृदुल कृष्णाजिनधारी मुनिवर (वसिष्ठ) ने उनसे कहा— हे राजन् ! चिंतित मत होओ। मैं उस राम को आज वन जाने से रोक लूँगा ।
मुनिवर के वचन सुनकर मनुष्य-रूप मे स्थित (वैवस्वत) मनु-सदृश चक्रवर्ती, ऐसे लगते थे, जैसे तुरत प्राण छोड़नेवाले हों, यह विचार कर कि यदि ये विशुद्ध स्वभाववाले मुनिवर कहेगे, तो राम वन-गमन न करेगा, किंचित् स्वस्थ हुए और एकाकी हो अत्यन्त विकल होनेवाले अपने प्राणो को रोके रहे ।
चक्रवर्ती को व्याकुलप्राण तथा प्रज्ञाहीन देखकर तथा यह सोचकर कि उनकी मृत्यु हो गई है, कौशल्या अत्यन्त व्याकुल हुई और कहा—हे पुत्र ! इस नगर के साथ हमको भी तुमने छोड़ दिया । फिर कहा—हे प्रभो ! क्या गृहस्थ-जीवन में आप इसी