कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०६ | कम्ब रामायण |
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प्रेमवाले पुत्र पर प्रेम से व्याकुल हो और आपका अनिन्दनीय गौरव निंदास्पद हो जाय, तो संसार के लोग उस सत्य को स्वीकार नही करेंगे।'
उत्तम कौशल्या-रूपी हंसिनी ने सोचा कि मेरा पुत्र वन को गये बिना नही रहेगा। वह बार-बार यह आशंका करती हुई कि पुत्र-विरह में चक्रवर्त्ती जीवित नही रहेंगे, अत्यन्त शोक-मग्न हुई। वह फिर सोचती कि यदि पुत्र पिता की प्राण-रक्षा के लिए देश में ही रहेगा, तो उससे पति का यश मिट जायगा। यह विचार कर चिंतित होती। अतः, वह अपने पुत्र से भी यह नही कह सकी कि तुम वन मे मत जाओ। अहो। अहो। कौशल्या कैसे शोक से संतप्त हुई थी।
पुष्पमालांलंकृत दशरथ ने उस (कौशल्या) के वचनो से जान लिया कि उत्तम कीर्त्तिवाला राम नगर में नही रहेगा। अवश्य वन मे जायगा। उससे वे शोकोद्विग्न हुए और बोले—हे मुझ पापी के अवलंब। आओ। हे पुत्र ! मेरे सम्मुख आओ।
पुनः दशरथ अपने पुत्र के प्रति कहने लगे—हे पुत्र। मेरे नयनो से मेरे प्राण भी द्रवित होकर बह रहे हैं। मेरी मृत्यु अब निश्चित है। चतुर्वेदी के ज्ञाता ब्राह्मण अग्नि के सम्मुख तुम्हारा अभिषेक करने के लिए जो तीर्थ-जल लाये हैं, उनको मेरे मुँह मे डालकर (अर्थात्, मेरी मृत्यु के इस समय मे मेरे मुँह में गंगाजल डालकर) फिर तुम विशाल वन में जाकर रहो।
हे पुत्र। बड़ी सेना के बल से संपन्न राजाओ को इक्कीस बार अपने फरसे से मारनेवाले, शक्ति में अपना उपमान स्वय ही बने हुए (परशुराम) को भी तुमने धनुष से परास्त कर दिया था। किन्तु मै (पापी) ने, 'कुलक्रम से प्राप्त मुकुट को धारण करो,' ऐसा कहकर तुरन्त ही तुमको जटामय ऊँचा मुकुट दिया।
हे श्याम ! हे स्वच्छ मन ! हे अरुण नयनो तथा करो से शोभायमान ! हे क्षमा-गुण से पूर्ण ! त्रिपुर-दाह के समय शिव के उपयोग में आनेवाले धनुष को तोड़नेवाले ! मै एकाकी हो गया हूँ। इस बुढ़ापे की अवस्था मे तुम मुझे छोड़ चले। अब मै जीवित रहना नही चाहता।
स्वर्ण से भी अधिक उज्ज्वल स्वर्ण। यश के भी यश ! बिजली से भी अधिक कान्तिपूर्ण धनुष को धारण करनेवाले। सत्य के सत्य ! मै इतना क्षुद्र नही हूँ कि अपनी आँखों के सामने ही तुमको वन जाने दूँ। तुम्हारे वन जाने के पूर्व ही मै स्वर्गलोक को चला जाऊँगा।
मेरा मन प्रेम से पिघलनेवाला है। मेरा शरीर प्रेम के कारण प्राण छोड़नेवाला है। मै तुम्हारे समान (कठोरहृदय) नही हूँ। मैने अपनी जिन आँखों से तुमको जानकी का पाणि-ग्रहण करके अयोध्या में प्रवेश करते हुए देखा था, उनसे अब तुमको नगर छोड़कर जाते हुए नही देख सकता।
१. भाव यह है—जिस सत्य को आपने स्वीकार किया है, उसके परिणामो को दृढता के साथ सहने में ही गौरव है। उसके परिणामभूत दुःख को देखकर व्याकुल होने में अगौरव ही है। —अनु०