कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २०५
चक्रवर्त्ती अपने मुँह से रामचन्द्र को वन जाने को कहे, इसके पूर्व ही तुमने (राम को वन जाने को) कह दिया। वह वन के दुस्तर मार्ग मे गये बिना नही रहेगा। तुम वह कठोर अग्नि हो, जो कीर्त्ति तथा अपने पति के प्राणो को जला रही हो। तुम्हारे सदृश कठोर और कौन होगा ? इससे बढ़कर क्रूर कार्य और क्या हो सकता है ?
निष्कलक मुनि के ये वचन सुनकर व्याकुल होनेवाले चक्रवर्त्ती ने जिह्वा मे विष रखनेवाली उस स्त्री को देखकर कहा-हे पापिन। क्या 'कठोर वन मे जाओ', कहकर मेरे प्राण (-सदृश राम) को तुमने भेज दिया ? क्या वह चला भी गया ?
हे पापिन ! तुम्हारे मनोभाव को अब मैने स्पष्ट जान लिया। तुम्हारे विंवाधर के विष को अनेक दिनो तक मैने पिया है। अतः, तुमने मेरे प्राणों को समूल खा लिया। मैने अग्नि समझ तुमको पत्नी के रूप मे नही अपनाया। किंतु अपने जीवन का अत करने के लिए एक यम को ही खोजकर अपनाया था।
मेरे नयन-समान राम को तुमने छल से वन मे भेज दिया। उससे मुझे तुम निहत कर रही हो। तुम अपयश से लज्जित नही होती हो। अब अनेक वचन कहने से क्या लाभ ? हे अधम क्रूरे ! तुम्हारे कठ का मगल-सूत्र¹ ही तुम्हारे पुत्र भरत का रक्षा-बंधन होगा।
इस प्रकार अनेक वचन कहने पर भी कैकेयी का मन पिघला न देखकर चक्रवर्त्ती मुनि से बोले-हे मुनिवर ! मै अभी कहे देता हूँ, यह (कैकेयी) मेरी पत्नी नही है। इसे मैने त्याग दिया। राजा बननेवाले उस भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता। वह पुत्रोचित कार्य (अर्थात्, पिता का मृत्यु-संस्कार) करने की योग्यता नही रखता।
अत्यन्त वेदना से पीडित चक्रवर्त्ती ने उत्तम कौशल्या को देखकर पूछा-क्या राम (वन जाने के पूर्व) जैसे मुझसे नही मिला, वैसे तुमसे भी मिले बिना ही चला गया ? तब कौशल्या, राम के विरह मे चक्रवर्त्ती की उस पीड़ा को देखकर अपने पूर्व विचार को (अर्थात्, दशरथ से यह प्रार्थना करनी है कि राम को वन मे न भेजें) छोड़कर स्वयं व्याकुल हो उठी।
अब कौशल्या को भी यह ज्ञात हो गया कि यह सब सपत्नी का कार्य है, चक्रवर्त्ती पहले वर देकर फिर पश्चात्ताप से मूर्च्छित हुए। यद्यपि वह (कौशल्या) अपने पति को सान्त्वना देने के लिए यह कहती रही कि हे राम ! तुम वन मे न जाओ, किंतु यह सोचकर मन मे चिंतित हुई कि यदि दशरथ के वचन सत्य न हो, तो संसार मे उन्हे अपयश उत्पन्न होगा।
अपने पति के दुःख से दुःखी होनेवाली कौशल्या ने (चक्रवर्त्ती से) कहा-हे बलवान् ! दृढ सत्य को अपनाकर, उस पर स्थिर रहकर, फिर यदि आप अपने अभिन्न
१ अंतिम वाक्य का यह भाव है कि 'मंगल-सूत्र' सुहाग का चिह्न है। कैकेयी का सुहाग अब अधिक काल तक नही रहेगा। उसके मिटने से भरत की रक्षा भी समाप्त होगी। अर्थात्, दशरथ के मर जाने पर भरत अनाथ हो जायगा और उसे दुःखी होना पड़ेगा।—अनु०