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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 549 में से

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पृष्ठ 212
२०२कंब रामायणं

शिला-सदृश दृढता से युक्त पातिव्रत्यवाली कौशल्या को सांत्वना देने के लिए राम ने उसके मन में बैठनेवाले, सुन्दर, सारगर्भित और कहने योग्य ये वचन कहे —

मुझे ऐसा भाग्य प्राप्त हुआ है कि मेरा उत्तम भाई राज्य पा रहा है। मेरे पिता ऐसे सत्यवादी हैं कि भूलकर भी असत्य नही कहते। मै अरण्य मे निवास करके फिर वापस आऊँगा। जन्म पाने से, इससे बढ़कर और क्या भाग्य प्राप्त हो सकता है ?

आकाश, धरती, समुद्र तथा अन्य भूत भले ही मिट जावें, तो भी चक्रवर्त्ती की आज्ञा मेरे लिए अनुल्लंघनीय है। आप दुःखी न हो।

राम के वचन सुनकर कौशल्या ने कहा—हे तात ! तो मै भी यह नही कह सकती कि चक्रवर्त्ती की आज्ञा के अनुसार तुम ( अरण्य में ) मत जाओ। तुमको छोड़कर मेरे प्राण रह नही सकते। अतः, तुम अपने साथ मुझे भी वन में ले चलो।

तब राम ने कहा—हे माता। मुझसे वियुक्त हो चक्रवर्त्ती दुःख-सागर मे डूबे हैं। ऐसी दशा मे उन्हे सांत्वना दिये बिना मेरे साथ वन में जाने का आपका निश्चय करना उचित नही है। कदाचित् , आपने धर्म का ठीक-ठीक विचार नही किया।

दृढ धनुर्धारी भाई भरत को राज्य सौंपकर जब चक्रवर्त्ती राज्य की सम्पत्ति से पृथक् हो तपस्या में निरत होंगे, तब उनके साथ रहकर आप भी अपूर्व व्रतो का आचरण करेंगी।

आप क्यो इस प्रकार व्याकुल हो रही हैं ? देवता भी महान् तपस्या के आचरण से ही तो उन्नत हुए हैं। (मेरे वनवास के) ये जितने वर्ष हैं, वे देवो के चौदह दिन^१ ही तो हैं।

पहले कौशिक मुनि की कृपा से मैने जो विद्याएँ प्राप्त की और उन्हें प्राप्त करने के पश्चात् जो कार्य करके मै भाग्यवान् हुआ, वे व्यर्थ नहीं हुए। अब भी ऐसे मुनियो की आज्ञा का पालन करना मेरे लिए उत्तम ही है।

मै महान् तपस्वियो की सेवा करके, अलभ्य ज्ञान प्राप्त करके, दोषहीन अनुपम विद्याएँ सीखकर एव देवो का प्रेम भी पाकर इस नगर मे लौट आऊँगा, आप देखेंगी।

मगरमच्छों से पूर्ण समुद्र से आवृत्त पृथ्वी को खोदनेवाले, भ्रमरो से गुजरित पुष्पमालाएँ धारण करनेवाले सगर-पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करके अपने प्राणो को त्याग दिया और उस कार्य से प्रभूत कीर्त्ति के पात्र बने।

हरिण को धारण करनेवाले शिवजी के हाथ के परशु के जैसे शस्त्र को रखनेवाले परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा का उल्लघन न करके अपनी माता का सिर काट दिया था। अतः, मेरे लिए पिता की आज्ञा उपेक्षणीय है—यह सोचना भी उचित नही है।

राम ने इस प्रकार के अनेक वचन कहे। उनको सुनकर सत्यरूपी उज्ज्वल आभरण से युक्त कौशल्या सोचने लगी कि राम कोशल देश को अवश्य छोड़कर जानेवाला है।

फिर, कौशल्या यह विचार कर कि भरत पृथ्वी का राज्य करे, किन्तु मै चक्रवर्त्ती से


१. इस पृथ्वी में सूर्य का जो उत्तरायण और दक्षिणायन हे, वे देवो के लिए दिन और रात हैं। अत', मनुष्यो का एक वर्ष देवो का एक दिवस माना गया है।