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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

अयोध्याकाण्ड २०१

कौशल्या के यह पूछने पर राम ने अपने अरुण कर जोड़कर कहा—आप के प्रेम का पात्र, उत्तम गुणवाला मेरा भाई भरत ही उन्नत किरीट को धारण करनेवाला है।

तब उस (कौशल्या) देवी ने, जो राम आदि चारों पुत्रों पर निष्कलंक प्रेम रखती थी और भेदभाव से रहित थी, कहा—(ज्येष्ठ की रहते हुए, कनिष्ठ को राज्य का अधिकार नहीं है, इस) परिपाटी के अनुसार यह (भरत का राजतिलक) नहीं हो सकता। बस इतना ही; नहीं तो वह (भरत) सब से अधिक गुणवान् है, उसमें कोई कमी नहीं है।

कौशल्या ने राम से पुनः कहा—हे पुत्र! चक्रवर्ती की आज्ञा का निषेध करना तुम्हारा धर्म नहीं है। इस आज्ञा को अपने लिए हितकर समझकर तुम अपने भाई भरत को राज्य दे दो और उसके साथ एक होकर चिरकाल तक जियो।

माता का कथन सुनकर पवित्र, हर्ष-भरे हृदयवाले तथा दोषहीन गुणवाले राम ने कहा—चक्रवर्ती ने मुझे सन्मार्ग पर चलने के लिए एक आज्ञा दी है।

कौशल्या ने पूछा—वह आज्ञा क्या है ? तब राम ने कहा—चक्रवर्ती ने आज्ञा दी है कि मैं चौदह वर्ष-पर्यंत महान् अरण्य में ऋषियों के साथ निवास करके फिर लौट आऊँ।

वह वचन रूपी अग्नि कर्णाभरण से भूषित (कौशल्या के) कानों में प्रविष्ट होने, इसके पूर्व ही वह दुःखी हुई, कृशगात्र हुई, भ्रांतचित्त हुई, रोईं, मूर्च्छित हुई और गिर गई।

उसने (राम से) कहा—हे पुत्र! चक्रवर्ती ने तुम्हारे प्रति पहले जो कहा था कि तुम इस विशाल धरती का अवलंब बनकर इसकी रक्षा करो, वह क्या धोखा था या वह विष ही था ? मेरे पाँचों प्राण भयभीत हो रहे हैं।

कौशल्या (अत्यन्त पीडा के कारण) कभी एक हाथ से दूसरे को मलती, कभी अपने प्यारे पुत्र के अधिष्ठान बने हुए, वटपत्र की समता करनेवाले अपने उदर को, कंकणधारी पल्लव-सदृश करों से दबाती, कभी अग्नि से जैसे धुआँ उठता हो, वैसा निःश्वास भरती। पुनः उस निःश्वास को निगल जाती। इस प्रकार वह दुःखी हो रही थी।

'चक्रवर्ती की दया भी भली है!'—कहकर हँसती। सामने खड़े पुत्र को देखकर यह कहकर कि तुम्हारा वन-गमन कब होगा ?—उठती। कौशल्या यों दुःखी हुई जैसे उसके शरीर से प्राण ही निकल रहे हों।

वह यह कहकर कि हे पुत्र! तुम्हारे प्रति अपने मन में अत्यधिक प्रेम रखनेवाले चक्रवर्ती के प्रति तुमने क्या अपराध किया ? वह यों रोती, जैसे पूर्वजन्म के पाप के कारण दरिद्रता अनुभव करनेवाला कोई व्यक्ति सम्पत्ति पाकर भी उसे खो बैठा हो और रो रहा हो।

वह कहती—क्या धर्म मेरा सहायक नहीं है ? कभी कहती, हे देवताओ! मैंने कौन-सा पाप किया कि इस प्रकार मुझे विकल-प्राण होना पड़ रहा है ? वह, बछड़े से अलग की गई गाय के समान व्याकुल हुई। इसके अतिरिक्त और क्या कहा जाय ?

इस प्रकार व्याकुल होनेवाली माता को राम ने अपने हाथों से उठाया और यह कहकर सांत्वना देने लगे कि हे अपूर्व पातिव्रत्यवाली माता! सत्य की गरिमा से युक्त हमारे चक्रवर्ती को क्या आप असत्य-युक्त करेंगी ? कहिए तो।