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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

अयोध्याकाण्ड १६६

जब नगरनिवासी इस दशा में थे, तब विजयी प्रभु (राम) अनुपम रथ पर आरूढ होकर, दीर्घ ध्वजाओं से शोभित प्रासादों की पंक्तियों से युक्त वीथियो को पार कर गये और महान् यश से भूषित चक्रवर्त्ती के प्रासाद में जा पहुँचे।

पुष्प-भूषित कुंतलोंवाली सुन्दरियो के द्वारा चामर डुलाये जाते हुए, नूतन हर्ष से उल्लसित मन से, राम वहाँ आये, किन्तु वहाँ अपने अगाध स्नेह को प्रकट करते हुए, उन्नत किरीट धारण किये हुए, सुन्दर कमल-पीठ पर आनन्द के साथ आसीन हुए दशरथ को नही देखा।

वे राम, जो वेदो तथा अन्य शास्त्रो के जाननेवालो के मन मे प्रकाशित (भगवान् के) रूप के साथ एकरूप थे, उस स्वर्णमय सभा-मंडप मे नही गये, जहाँ ऋषियो और नरेशो के संघ बडे आनन्द के साथ यथार्थ प्रशस्तियो का गान कर रहे थे, किन्तु अपनी छोटी माता (कैकेयी) के आवास मे गये।

राम को यों जाते हुए देखकर राजाओं तथा ऋषियो ने सोचा—राम ने उचित ही सोचा है। वह पहले अपने पिता के चरणों को नमस्कार करके, फिर सब दिशाओ में उज्ज्वल भासमान किरणोंवाले सूर्य से प्राप्त अत्युत्तम मुकुट को यथाविधि धारण करनेवाला है। यह बिलकुल ठीक ही है।

जब ऐसा हो रहा था, तब रामचन्द्र मन मे किंचित् शिथिल होकर फिर स्वस्थ हुए और पवित्र दशरथ के रहने के स्थान को ढूँढते हुए आ पहुँचे। यह देखकर, अनुपम क्रूरता से युक्त कैकेयो, यह सोचती हुई कि मेरा पति अपने मुँह से (वरदान की बात) नही कहेगा, अतः मै स्वय इससे कहूँगी—उसको (कैकेयी को) अपनी माता मानकर उसके निकट आये हुए राम के सम्मुख यम के समान वह प्रकट हुई।

गोधूलि-वेला में अपनी माँ को देखनेवाले वत्स के सदृश राम ने अपने सम्मुख आई हुई माता को, धरती पर सिर रख नमस्कार किया। सिंदूर तथा प्रवाल-समान सुगंधयुक्त अपने मुँह को एक अरुण कर से आवृत करके और दूसरे कर से अपने वस्त्रो को सँभाले हुए बड़ी विनम्रता के साथ खडे रहे।

इस प्रकार खड़े हुए राम को देखकर, लौह-हृदय से युक्त होकर, 'प्राणियो का संहार करनेवाला यम'—केवल इस नाम से रहित होकर, कठोर कृत्य करनेवाली उस (कैकेयी) ने कहा—हे तात! तुम्हारे पिता तुमसे एक बात कहना चाहते हैं। यदि उनके अभिप्राय को कहना मुझे उचित हो, तो मै उसे कहूँगी।

आज्ञा देनेवाले मेरे पिता हैं। कहनेवाली आप स्वयं हैं। यह संभव हो तो—(अर्थात्, यदि आप स्वयं उस बात को मुझसे कहें तो) मेरा उद्धार हुआ। मेरे सदृश जन्म लेनेवाला ओर कौन है ? मेरे भाग्य से ऐसा अच्छा फल मुझे मिला है, इससे बढ़कर और क्या अच्छा फल हो सकता है ? आप मेरे माता और पिता दोनो हैं। आपका वचन मेरे लिए शिरोधार्य है। (अतः) आप आज्ञा दें।

तब कैकेयी ने राम से कहा—चक्रवर्त्ती ने यह आज्ञा दी है कि समुद्र से आवृत्त पृथ्वी का शासन भरत करे और तुम जटाधारी होकर तपस्वी के वेष में घने अरण्य में जाकर