कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड १८६
सर्पिणी के समान क्रूर उस कैकेयी की जिह्वा से उत्पन्न अत्यन्त पीडाजनक विष ने ज्यो ही चक्रवर्त्ती को छुआ, त्यो ही वे काँप उठे। उनकी सारी देह जलकर शिथिल हो गई। सर्प-दष्ट होकर निश्शक्त हुए मत्तगज के समान वे पृथ्वी पर गिर पडे।
पृथ्वी पर लोटते हुए चक्रवर्त्ती की उस गंभीर पीडा का वर्णन करने का सामर्थ्य किसमे है ? उनकी पीडा के अधिकाधिक बढ़ जाने से उनका मन बहुत ही शोक-उद्विग्न हुआ। उन्होने लुहार की भट्ठी की भाथी के जैसे उष्ण निःश्वास भरे।
उनकी जिह्वा सूख गई। प्राण निकलने लगे। मन शिथिल हो गया। नयनो से रक्त वह चला। मन की चिन्ता बढ़ गई। उनके शरीर की पाँचो इन्द्रियाँ अपना व्यापार भूलकर अत्यन्त चंचल हो गईं।
प्राण-पीडा से विह्वल चक्रवर्त्ती उठकर पृथ्वी पर खडे होते, रो पड़ते, गिरते, श्वास-हीन हो चित्र के जैसे निष्क्रिय पड़े रहते, पाप-कर्मवाली कैकेयी के सम्मुख जाकर उसे पकड़कर धरती पर पटक देने का विचार करते।
दृढ़ वरछा दारुण छत मे घुसेड़ा जाय, तो उससे उत्पन्न पीडा से जिस प्रकार कोई मत्तगज तड़प उठता है, वैसी ही दशा को प्राप्त हुए चक्रवर्त्ती (कैकेयी को मारने का विचार करते, फिर) यह सोचकर कि स्त्री है, (उसे मारने पर) अपयश होगा, इस विचार से लज्जित होते। वे मन की वेदना से आहे भरकर तड़प उठते। फिर, इस प्रकार शिथिल हो पडे रहते, जैसे उनकी आँखे छिन गई हो।
आलान-स्तंभ मे बँधे हुए मत्तगज के समान चक्रवर्त्ती को शोक-पीड़ित होकर रोते, कलपते देखकर देवता भी भय से काँप उठे। वह समय ऐसा लगता था, जैसे प्रलय-काल आ गया हो। किन्तु, बाण-समान नयनोवाली कैकेयी का मन यथापूर्व (कठोर ही बना) रहा।
'पति की व्यथा को देखकर भी वह (कैकेयी) कातर नही हुई। उसका मन पिघला नही, वह लज्जित भी नही हुई।'-ऐसा कहने में (कहनेवाले को ही) लज्जा होती है। महान् लोग प्राचीन काल से ही यह सोचकर कि छल-कपट ही नारी का वेष लिये रहते हैं, नारियो को कभी अपना अवलंब नही मानते।
इस दशा मे खड़ी हुई कैकेयी की ओर देखकर तैलसिक्त तीक्ष्ण धारवाला वरछा धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती ने कहा-क्या तुम भ्रम मे पड़ी हो ? या किसी वंचक ने तुम्हे दुर्बुद्धि सिखाई है ? तुम्हे मेरी सौगंध है, क्या हुआ ? कहो।
यह सुनकर कैकेयी ने कहा-रासवाले घोडे पर सवार होनेवाले (हे चक्रवर्त्ती)! मै भ्रम मे नहीं हूँ, किसी कपटी ने मुझे कुछ सिखलाया भी नहीं है। यदि आप पूर्व में दिये हुए अपने वरो को अब देगे, तो लूँगी। यदि नही देंगे, तो मै अपने प्राण त्याग दूँगी, जिससे आपको स्थायी अपयश उत्पन्न होगा।
अपने पुत्र (राम) के अतिरिक्त जिनके अन्य कोई प्राण नही हैं, वैसे चक्रवर्त्ती कैकेयी के यह कठोर वचन कहने के पूर्व ही इस प्रकार व्याकुल हुए, जैसे जले हुए घाव मे वरछा घुसेड़ दिया गया हो। स्तब्ध खडे रहे। फिर, मूर्च्छित हो गिर पड़े।