भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

अध्याय ३

कैकेयी-(दुष्कार्य) पटल

रात्रि का अर्धभाग व्यतीत हो गया। तब दीर्घ भुजाओवाले सिंह-सदृश चक्रवर्ती (दशरथ), उनकी जय-जयकार करनेवाले राजाओ से घिरे हुए चले और वीणा-नाद को परास्त करनेवाली मधुर बोली से युक्त कैकेयी के प्रासाद में पहुँचे।

राजा लोग (दशरथ को) प्रणाम करके सौध-द्वार पर रुक गये। दासियाँ दौड़-कर आईं और उन (दशरथ) का स्वागत करके उन्हें भीतर ले गईं। यों चलकर चक्रवर्ती पर्यंक से अलग पड़ी हुई, बरछे-जैसे विशाल नयनों तथा मृदुल कंधोंवाली सुन्दरी (कैकेयी) के निकट गये।

चक्रवर्ती ने वहाँ जाकर (कैकेयी की दशा) देखी यह सोचते हुए कि न जाने इसे कौन-सा दुःख प्राप्त हुआ है, व्याकुलचित्त हुए। फिर, जैसे हाथी, हरिणी को उठा रहा हो, वैसे ही अपनी विशाल भुजाओ मे उसको आलिंगन-बद्ध करके उठाने लगे।

सुगंधित पुष्पमालाधारी चक्रवर्ती के प्राण-तुल्य उस (कैकेयी) ने उसका आलिंगन करनेवाले (चक्रवर्ती के) विशाल हाथों को झटककर हटा दिया और विद्युत् के समान तड़पकर धरती पर गिर पड़ी। फिर, कुछ कहे बिना दीर्घ श्वास भरती हुई पड़ी रही।

पुष्पमाला-भूषित चक्रवर्ती ने पृथ्वी पर गिरकर निःश्वास भरती हुई उसको देखा और भयभीत हुए। फिर, उससे कहा—क्या हुआ है ? इन सप्त लोकों के रहनेवालो मे से जिसने तुम्हारा अपमान किया हो, वह अपने प्राण खो बैठेगा। सारा वृत्तांत मुझे कह सुनाओ। फिर देखो कि मै क्या करता हूँ। सब बातें मुझे बताओ।

भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमालाधारी चक्रवर्ती के वचन सुनकर कैकेयी ने सजल मेघ-जैसे अपने विशाल नयनों से अपने स्तनों पर अश्रु गिराती हुई कहा—क्या आपको मुझ पर दया है ? यदि है तो अपने पूर्व में जो वर मुझे दिये थे, उन्हें अब पूर्ण कीजिए।

मधुवर्षी (पुष्पों से अलंकृत) केशोंवाली कैकेयी का मनोभाव नहीं जानते हुए चक्रवर्ती ने अति उज्ज्वल बिजली के समान हँसकर कहा—तुम्हारा मनोरथ पूरा करूँगा। किंचित् भी कमी नहीं करूँगा। तुम्हारे पुत्र उदार राम की शपथ खाकर कहता हूँ।

यह वचन कहते ही हंसिनी-तुल्य कैकेयी ने कहा—यदि आपको मेरी बड़ी पीड़ा दूर करने का विचार है, तो हे राजन् ! देवता आपकी शपथ के साक्षी हों। आपने उस दिन जो दो वर मुझे दिये थे, उन्हें अब पूरा कीजिए।

उस निष्ठुर हृदयवाली की वंचना को नहीं जानते हुए चक्रवर्ती ने कहा—लो, अपना वर लो। तुम्हे इतना व्याकुल तथा दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है। अभी तुम्हारे वर देकर मैं अपना भार दूर कर लूँगा। कहो (तुम्हारी क्या इच्छा है)।

सब कठोर वस्तुओ से भी अधिक कठोर उस क्रूर (कैकेयी) ने कहा—आपके दिये दो वरों में से एक से मेरे पुत्र को इस समस्त राज्य का अधिपति बनाइए और दूसरे से रामचन्द्र को (चौदह वर्षों के लिए) अरण्यवास के लिए भेजिए—यह कहकर वह (दृढ़) पड़ी रही।