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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

अयोध्याकाण्ड १८७

मे जब घनी विजयमाला से भूषित शंबरासुर मारा गया था, उस युद्ध मे विजयी चक्रवर्त्ती ने तुम्हे दो वर दिये थे ; उनको तुम उनसे अब माँग लो ।

उन दो वरों में से, एक से राज्य को तुम अपना बना लो और दूसरे से, चौदह वर्ष के लिए राम को देश छोड़कर अरण्य में भेजने का उपाय करो । इससे सारी समृद्ध पृथ्वी तुम्हारे पुत्र के अनुकूल हो जायगी ।

इस प्रकार कहनेवाली मंथरा का कैकेयी ने हर्ष से गाढ़ालिंगन किया और नवरत्नों का एक हार तथा अपार द्रव्य उसे दिया । फिर कहा—मेरे अनुपम पुत्र को गरजते समुद्र से आवृत पृथ्वी का राज तुमने दिया । पृथ्वी के पति भरत की माता तुम्हीं हो ।

तुमने अच्छा उपाय बताया । भरत को गरिमामय मुकुट पहनाना और राम को घने अरण्य मे भेजना, ये दोनो कार्य यदि आज पूर्ण नहीं होंगे, तो चक्रवर्त्ती के सामने ही मैं अपने प्राण त्याग दूंगी । अब तुम जाओ ।—इस प्रकार कैकेयी ने मंथरा से कहा ।

कूबरी के जाने के पश्चात् कैकेयी उत्तम पुष्यो के पर्यंक से उतर गई । अपने वर्षाकालिक मेघ के जैसे केशपाश में गुँथी पुष्पमाला के ( उन पुष्पों के ) मधु पर आसक्त भ्रमर-कुल को व्याकुल करते हुए, इस प्रकार निकाल फेंका, मानो आकाश के बादलों में छिपे चन्द्रमा को ही पकड़कर फेंक रही हो ।

उसने अपनी प्रकाशमय मेखला को दूर फेंक दिया, जैसे अपने बढ़नेवाले यशरूपी लता को ही उखाड़ रही हो । मंजीर, कंकण आदि को भी दूर फेंक दिया । यो उसने अपने ललाट पर केशपाश के समीप में स्थित अपूर्व तिलक को पोछ डाला, जैसे चन्द्रमा के कलंक को पोछ रही हो ।

फिर, उत्तम रत्न-जटित आभरणों को एक-एक करके उठाकर फेंक दिया । कस्तूरी-गंध से युक्त अपने केशपाश को ऐसे खोल दिया कि वे लटककर धरती को छूने लगे ; अंजनयुक्त नीलोत्पल-जैसे नयनों के अंजन को पिघलाते हुए वह अश्रु बहाने लगी एवं पुष्पहीन लता के समान धरती पर लोट गई ।

केकय की पुत्री इस प्रकार ( धरती पर ) पड़ी रही, जैसे पीडा की अधिकता से कोई हरिणी पड़ी हो । नाचनेवाला कलापी थककर पड़ा हो, अथवा 'कमलवासिनी ( लक्ष्मी ) सीता, अयोध्या छोड़कर जानेवाली है', यह विचार करके उस लक्ष्मी की बड़ी बहन ज्येष्ठा देवी$^१$ आकर वहाँ पड़ी हो । ( १-८८ )


१. जिस प्रकार लक्ष्मी को मंगल देनेवाली देवी मानते है, उसी प्रकार ज्येष्ठा को अमंगल की देवी मानते हैं ज्येष्ठा लक्ष्मी की बडी बहन मानी गई है । -अनु०